शायद यह 2002 का कोई दिन था जब शायर बशीर बद्र के साथ दोपहर में कुछ घंटे बिताने का मौक़ा हासिल हुआ था। उन्हें करनाल में एकल-पाठ के लिए बुलाया गया था। उन दिनों टीवी चैनलों की धूम तो थी लेकिन शहर-शहर, क़स्बों-क़स्बों में उनकी आईडी वाले रिपोर्टर नहीं हुआ करते थे। चैनलों का प्रसारण केबल नेटवर्क के ज़रिये हुआ करता था और केबल संचालक अपना लोकल चैनल भी प्रसारित किया करते थे जिन पर फ़िल्मों, फ़िल्मी गानों, स्थानीय विज्ञापनों के साथ लोकल ख़बरों का भी एक स्लॉट हुआ करता था।
तो शहर के कार्यक्रमों के टीवी पर प्रसारण के लिए सिटी केबल की ठीक-ठाक पूछ हुआ करती थी। गो, उस वक़्त तक असल जलवा अख़बारों का ही था। करनाल सिटी केबल की रिपोर्टर सिमर (शायद उनका पूरा नाम सिमरजीत सिंह था) ने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं बशीर बद्र के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उनके साथ बैठ जाऊँ। बैठ जाऊं क्या, सवाल ही मैं पूछँ।
मैं वहाँ `अमर उजाला` देखता था और प्रिंट में हमारा कम्पीटीशन दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण से था। संसाधनों के लिहाज़ से इन दोनों अख़बारों की स्थिति मज़बूत थी और सर्कुलेशन में भास्कर काफ़ी आगे था। लेकिन अपने बूते, ख़बरों के स्तर और ख़ासकर तेवर के ज़रिये हम अपनी एक ख़ास जगह बना कर रखे हुए थे। साहित्य में दिलचस्पी हमारे लोकल पन्ने पर झलक जाया करती थी और शायद इसी कारण सिमर ने मुझे इस मशहूर शायर से बातचीत के लायक़ समझा था।
एक पत्रकार के नाते मेरे लिए एक्सक्लूसिव हासिल होने का रोमांच था, नामचीन शायर के साथ के उजाले को यादों में संजोने के अवसर की ख़ुशी तो थी ही।
बशीर बद्र करनाल के उस समय के सबसे इलीट तीन-सितारा होटल ज्वैल्स में ठहरे थे। इसी होटल में शाम के वक़्त उनका कार्यक्रम था। मैं सिटी केबल की टीम के पहुँचने से पहले ही उनके कमरे की डोर-बेल दबा चुका था। मैंने मुज़फ़्फ़रनगर के मुशायरों में साल दर साल उन्हें कवर करते रहने की और वहाँ की उनकी मन-लगती बातें दोहरा कर उनकी तवज्जोह हासिल करने की कोशिश की लेकिन वे फैशन टीवी पर ‘कैट-वॉक’ में उलझे रहे।
उनकी संजीदा शायरी और मंच के उनके कई चंचल वाक़िओं को मन ही मन याद करते हुए मैं बैठा रहा। फिर छतरी-वतरी और कैमरे सजाकर इंटरव्यू का माहौल बना। न शायरी की कोई आलोचनात्मक समझ, न अध्ययन; पर उनके शेर याद थे, देश के हालात की ख़बर थी और पुराने बड़े शायरों के बारे में भी मोटी-मोटी जानकारी थी। फिर नामवर सिंह का जाने किस पिनक में बोला गया जुमला – कबीर-मीर-बशीर – याद था। कुल मिलाकर मामला इस तरह निपटा कि वे ख़ुश थे और उन्होंने साथ लंच के लिए भी रोक लिया था।
उस रात बशीर बद्र का कलाम सुनने के लिए करनाल के और दूसरे शहरों के भी ज़्यादातर इलीट इकट्ठा थे। कभी उर्दू अदब की ज़रख़ेज़ रही ज़मीन का अवामी मुशायरों से जमना पार के मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, मेरठ आदि जिलों जैसा नाता तो जाने कब टूट गया होगा लेकिन इस तरह की ख़ास महफ़िलें कभी-कभार सजा करती थीं। आयोजन हिफा नाम की संस्था ने कराया था और अफ़सर, डॉक्टर, प्रफेसर, कलावंत, सचमुच के गुणग्राही और स्नॉब आदि प्राणी तो थे ही, छात्र संस्कृतिकर्मी भी वहाँ पहुँचे थे।
स्वागत और शुक्रिया में तारीफ़ों के ऐसे-ऐसे जुमले गढ़े गए थे कि बशीर बद्र बेहद मुतमइन नज़र आ रहे थे। फिर लॉन में डिनर शुरू हुआ। देखा कि कुछ देर पहले महफ़िल में जो सितारा चमक रहा था किसी गर्दिश में परेशान घूम रहा है। मैंने उनसे वजह दरयाफ़्त की तो बताया कि अभी पेमेंट नहीं किया गया है जबकि वे जल्दी निकलना चाहते हैं। एकाध ज़िम्मेदार शख़्स से मैंने भी उनके साथ बात की तो उन्हें रूम में वेट करने के लिए कहा गया। मैं भी उनके साथ हो लिया और मुझे तलाशते हुए मेरे कलीग ज़हीन पत्रकार सुधाकर भट्ट व नौजवान साथी रिपोर्टर अश्वनी शर्मा भी आ पहुँचे।
जिस रूम में बशीर बद्र मेहनताने के इंतज़ार में एक सिंगल बेड पर बेकल बैठे हुए थे, उसमें उनके वे क़द्रदान भी बैठे हुए थे जो महफ़िल में उन पर क़ुर्बान हुए जाते थे। अब स्थिति यह थी कि बशीर बद्र से ज़्यादा केंद्र में चेयर पर बैठा शख़्स था, आसपास कुर्सियों पर उनके मित्र-परिचित थे। एक महिला ने अपनी प्रशंसा करते हुए बशीर बद्र से कहा कि वे भी लिखती हैं। उन्होंने अपनी डायरी बद्र साहब की तरफ़ बढ़ाई लेकिन उनकी इस सब में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
फिर महिला ने हमशीरा जैसा कोई लफ़्ज़ उछाला जिसके मानी पर बशीर बद्र ने अनमने भाव से कुछ बताया। आख़िर मेरा सब्र छलक पड़ा। मैंने कहा कि ये आपकी इस्लाह के लिए इस बेड पर घिचपिच में सिमटे हुए हैं क्या? अभी इतनी बड़ी-बड़ी बातें हो रही थीं और अब न उन्हें अदब से बैठाया जा रहा है और न उनसे सलीक़ा बरता जा रहा है। जिसे अपना अदबी हुनर दिखाना है, वह दिखाता रहे, जिसे कश खींचने है, वह खींचता रहे, शायर को उसका पैसा देकर विदा किया जाए।
जो शख़्स केंद्र में थे, उन्हें भी गुस्सा आया और तनातनी का माहौल हो गया। उन्होंने अंग्रेजी में कहा कि जानते हो किससे बात कर रहे हो। वे हरियाणा के तत्कालीन आईजी (जेल) रविकांत शर्मा थे जिनका नाम कुछ दिनों बाद ही 1999 के पत्रकार शिवानी भट्नागर के बहुचर्चित हत्याकांड में आ गया था । मैंने कहा कि मैं `अमर उजाला` का डिस्ट्रिक्ट ब्यूरो चीफ हूँ और एक बड़े शायर के साथ किया जा रहा व्यवहार एक बड़ी ख़बर भी है।
बशीर बद्र ने धीरे से अनुरोध किया कि मैं और मेरे साथी उनके पास रहें। आयोजन के कर्ता-धर्ताओं में शामिल एक परिचित तल्ख़ी के माहौल में आए और बोले कि आप माहौल क्यों ख़राब कर रहे हैं। मैंने कहा कि आप बद्र साहब का भुगतान तुंरत क्यों नहीं कर देते। मैं परेशान भी था कि आख़िर न चाहते हुए भी ऐसा क्यों हो जाता है कि संभ्रात जन से रिश्ते बिगड़ जाते हैं।
ख़ैर बद्र साहब का भुगतान हुआ और उन्हें होटल से बाहर गाड़ी में बिठाकर विदा करने वाले मैं, सुधाकर और अश्विनी तीन लोग थे। वे बेहद कृतज्ञ महसूस कर रहे थे और इस बात का अहसास करा रहे थे। उन्होंने भोपाल आने की दावत दी लेकिन मुझे उन पर गुस्सा आ गया कि वे क्यों इतनी शोहरत के बावजूद इस तरह के कार्यक्रमों में जाते हैं जहाँ अदब की सच्ची क़द्र न हो। वे ख़ामोश रहे। बहरहाल, अगली सुबह हमारे यहाँ उनका शानदार इंटरव्यू भी छपकर आया और उस झिकझिक की ख़बर भी दर्ज हुई।
बशीर बद्र से पहला परिचय अख़बार के पन्ने पर किसी मुशायरे की कवरेज के हेडिंग से ही हुआ होगा। सालों-साल मुशायरों की ख़बर के शीर्षक उनके इस शेर से बनते रहे – `लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में\तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में`। यह एक पीड़ादायी क़ामयाबी थी जो और भी ज़्यादा ख़राब इस तरह हुई कि वे बस्तियाँ जलाने की सियासत से नज़्र हासिल करने में भी अपनी ज़बान खर्च करने लगे। वे ख़ुद मेरठ के दंगों में घर और शायरी के पन्ने जला दिए जाने के बाद भोपाल पहुँचे थे।
वे अंतत: समृतिलोप के शिकार होकर चुप हो गए। उन्होंने शोहरत की बुलंदी पर जाने वाले लोगों के लिए हिदायत दी थी कि `जिस डाल पर बैठे हो, वह टूट भी सकती है`। लेकिन, ख़ुद उनकी शोहरत उनके डिमेंशिया के लम्बे चले सालों के बावजूद शिखर पर बनी रही।
मैंने बशीर बद्र के नाम को सबसे ज़्यादा गंभीरता से कब लिया था, यह भी याद आ रहा है। जनसत्ता या जाने किस अख़बार में, शायद इतवार के परिशिष्ट में एक पन्ने की कवर स्टोरी का शीर्षक था – `तिरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सज्दा हराम है`। यह स्टोरी बशीर बद्र पर थी और शीर्षक उनके शेर से ही लिया गया था। जहाँ तक मुझे याद आ रहा है, इसमें यह भी बताया गया था कि बतौर स्टूडेंट उनका जो कोर्स था, उसमें ख़ुद उनका कलाम शामिल था।
पत्र-पत्रिकाओं के साहित्य के पन्ने उन दिनों मेरे जैसे लड़कों के लिए बड़ी अहमियत रखते थे तो इस नाम का महत्व भी मेरे मन में बन गया था। बाद में तो उन्हें साल में एक बार और कभी ज़्यादा बार सुनना और नोट करना काम का हिस्सा ही हो गया था। उनकी मुहब्बत की शायरी और उनकी ख़ूबसूरत नये प्रयोग की शैली, साम्प्रदायिक पसमंज़र में उनकी हिदायतें-नसीहतें सब याद आती हैं।
वो जाफ़रानी पुलोवर, वो बड़ा गिलास और कम शराब, शहर के नये मिज़ाज..सब। लेकिन, फ़िलहाल जिस माहौल में वे गए, उस अख़बार के शीर्षक वाली लाइन से जुड़ा शेर –
एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें
तिरा कीर्तन अभी पाप है अभी मेरा सज्दा हराम है
(धीरेश सैनी के फेसबुक पेज से)