बेदिया आदिवासी समुदाय: एक अवलोकन 

2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में बेदिया आदिवासियों की कुल जनसंख्या 1,00,161 है। लगभग 49 हजार लोग रामगढ़ में रहते हैं। यानी 50 % बेदिया समुदाय के लोग रामगढ़ में रहते हैं। रामगढ़ के अलावा रांची, हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, गिरीडीह, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम व दुमका में भी बेदिया आदिवासियों का निवास है। जबकि पश्चिम बंगाल में इसकी जनसंख्या 88,772 है। 

झारखंड के रामगढ़ से सुरेंद्र कुमार बेदिया द्वारा प्रकाशित बेदिया समुदाय की एक सामाजिक पत्रिका “बेदिया अनुसूचित जनजाति का एक संक्षिप्त परिचय” के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार बेदिया समुदाय देश के मुख्य रूप से 3 राज्यों, झारखण्ड, बंगाल और असम के 14 जिलों में निवास करता है, जिसमें झारखण्ड के रांची, हजारीबाग, रामगढ़, बोकारो, धनबाद, गिरीडीह, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम व दुमका है। वहीं पश्चिम बंगाल के पुरूलिया, मेदनीपुर, दिनाजपुर व 24 परगना सहित असम का डिब्रूगढ़ शामिल है।

झारखंड में ये 13 प्रखण्डों के बड़कागांव, डाड़ी, मांडू, पतरातू, रामगढ़, दुलमी, गोला, पेटरवार, कसमार, कांके, ओरमांझी, अनगड़ा, सिल्ली तथा पश्चिम बंगाल के झालदा में निवास करते हैं।

वे छोटानागपुर मध्य पठार के निश्चित भू-भाग, दामोदर नदी, स्वर्णरखा नदी के दोनों किनारे, हजारीबाग, रांची, बोकारो और पुरूलिया के पहाड़ी क्षेत्रों में करीब 200 से अधिक गांवों-टोलों में बसे हुए हैं। 

वहीं रांची जिला के उत्तर दिशा पिठौरिया (कांके), हेसातू (ओरमांझी), रांची जिला के पूर्व दिशा राजा बेड़ा, गेतलसूद (अनगड़ा-सिल्ली), हजारीबाग जिला के पश्चिम-दक्षिण दिशा लुरंगा, जरजरा, गरसुल्ला (बड़कागांव), रामगढ़ जिला के पश्चिम दिशा पतरातू, भुरकुण्डा इसी जिला के उत्तर दिशा तिलैया, ओरला, कारीमाटी, बोकारो जिला के दक्षिण-पश्चिम दिशा खूँटयगढ़ ओरदाना, चड़गी, तिरला, पेटरवार-कसमार और पुरुलिया जिला के पश्चिम दिशा कोलमा, महतोमारा, झालदा, किरीबेड़ा में इनका निवास है। 

बेदिया के प्रत्येक गांव में “अखरा होता है जहां युवक-युवतियों नाचते-गाते हैं और अपना मनोरंजन करते हैं। इनका घर बहुत साधारण होता है। मकान में प्राय: एक ही बड़ा, लंबा कमरा होता है जिसमें सोते हैं और जिसके एक कोने में बने चूल्हे पर खाना पकाते हैं तथा उसी में मुर्गी -बकरी को भी रखते हैं। बेदिया बकरी को घर के बाहर नहीं रखते।

पत्रिका के अनुसार एक हजार वर्ष पूर्व से बेदिया समुदाय के बेदिया कबिलाई राजा महोदी पहाड़ में रहते थे। जो कालान्तर में महोदीगढ़ के नाम में परिणत हो गया जिसके अंतिम राजा का नाम सम्पत बेदिया था।

बेदिया समुदाय की पारंपरिक दन्तकथा के अनुसार रामगढ़ राजा के पूर्वजों एवं अन्य प्रतिद्वंदी राजाओं के आक्रमण में बेदिया सम्पत राजा अपने समुदाय के लड़ाकों के साथ युद्ध में मारे गये। 

कई दिनों तक महोदीगढ़ व पहाड़ों-जंगलों में जारी युद्ध के बाद उरीमारी में राजा सम्पत मारे गये। यह स्थल पूर्व में उरेमारी के नाम से जाना जाता था। उरीमारी का नाम उरेमारी था, क्योंकि उरे का मतलब शत्रु और मारी का मतलब मारा होता था। ऐसा अनुमान है कि बेदिया राजा सम्पत और उनके सिपाहियों के मारे जाने के इस स्थल को उरेमारी कहा गया जो कालांतर में उरीमारी हो गया। जो आज भी रामगढ़ जिला के अंतर्गत आता है। 

बताना जरूरी हो जाता है कि बेदिया समुदाय की अपनी मातृत्व भाषा नष्ट हो गई है। यह कैसे और क्यों हुआ, खोज व शोध का विषय है।

बताया जाता है कि प्रतिद्वंदी राजाओं ने हमला कर बेदिया समुदाय सहित बेदिया सम्पत राजा का सम्पूर्ण भौतिक सम्पदा, सांस्कृतिक, धार्मिक, वेद-ग्रंथ, भाषा को नष्ट कर दिया। 

संभावना जताई जाती है कि महोदीगढ़ से भागने के बाद अपनी जान बचाने एवं पहचाने जाने के भयवश बेदिया समुदाय ने अपनी मातृ भाषा को बोलना बंद कर दिया और जहां जिस समाज व क्षेत्र में रहे होंगे उनकी ही भाषा अख्तियार कर ली।

यह मनोवैज्ञानिक रूप से सत्य प्रतीत लगता है।

बेदिया समुदाय क्षेत्रीय एवं मिश्रित भाषा बोलते हैं जैसे खोरठा, नागपुरी, कुरमाली, पंचपरगनिया (सदानी हेठगडिया) बंगला व हिन्दी भाषा बोलते हैं।

वे जिस क्षेत्र में निवास करते हैं वह क्षेत्र प्रसिद्ध एवं दर्शनीय स्थल के रूप मे जाना जाता है।

■ दामोदर नदी व भेड़ा (भैरवी) नदी का संगम जहां का जलप्रपात 23 फीट की ऊंचाई से गिरता है। रजरप्पा जहां छिन्नमस्तिके मन्दिर काफी चर्चित है।

■ स्वर्ण रेखा जलप्रपात (हुण्डरू फॉल) 243 फीट की ऊँचाई से गिरता है।

■ जोन्हा गौतम धारा जलप्रपात 150 फीट की ऊंचाई से गिरता है। जो तीन शिवानी के नाम से भी जाना जाता है। 

■ ओरमांझी का चाय बगान।

बेदिया समुदाय की शादी-विवाह में सांस्कृतिक परम्परा की बात करें तो इनकी इस परंपरा में स्थापित शादी-विवाह में बनाये गये नियम में जीवन से जुड़ी हुई सारे क्रिया-कलाप मौजूद हैं।

शादी के प्रथम प्रक्रिया में लड़का-लड़की दोनों की ओर से अगुवा के द्वारा बात होती है। अधिकांशतः लड़का की ओर से प्रथम पहल की जाती है।

लड़का-लड़‌की का एक गोत्र नहीं होना चाहिए। एक गोत्र में विवाह नहीं होता है। एक गोत्र में विवाह को अशुभ माना जाता है।

लड़का-लड़की का योग चावल, उड़द, तिल अन्य अनाज से मिलाया जाता है।

छेका का प्रचलन (बन्धनु) है। लड़की के यहां पानी हेराना और लड़‌का के यहां घर-बोर देखना।

गोत्र कुटुम्ब और पाइल कुटुम्ब शादी में पूरी तरह से शामिल रहते हैं। यह सामाजिक संचालन व्यवस्था है।

शादी के सप्ताह पूर्व से महिलाएं डमकच, नृत्य व गीत गाती है।

शादी के पूर्व घर की सफाई करना यथासम्भव नया कपड़ा, खरीदना-पहनना वैगरह भी इनकी इस परंपरा में शामिल है।

शादी-विवाह में दहेज प्रथा वर्जित है। शादी में लड़का पक्ष द्वारा ही लड़की को स्वेच्छा से यथासम्भव आभूषण वगैरह दिए जाते हैं।

इस समुदाय में शादी-विवाह की कई परंपराएं हैं, जिसके आलोक में – 

■ व्यंकड़ी विवाह:

इस परंपरा के तहत लड़‌की के घर बरात जाना और लड़की को लड़का के घर लाकर विवाह का रस्म पूरा करना होता है।

■ चढ़ विवाह:

फिलहाल कुछ वर्षों से लड़‌का को बरात के साथ लड़‌की के घर जाकर विवाह की रस्म को पूरा करना होता है।

■ बाल विवाह:

फिलहाल बाल विवाह कमजोर हुआ है परन्तु प्रचलन जारी है।

■ दोवा बोर विवाह:

लड़का का पूर्व पत्नी किसी कारणवश छुट गयी या मर गयी हो, तब उस लड़के के साथ किसी कुंवारी लड़की का विवाह किया जा सकता है।

 ■ विधवा विवाह:

बड़े भाई के मृत्यु के उपरांत देवर के साथ उम्र की समकक्षता में विवाह करने का प्रचलन है, या अन्य किसी के साथ भी विवाह कर सकती है।

 ■ सांघा विवाहः 

विधवा व सधवा के साथ विवाह के रस्म को पूरा करना।

■ तलाक : 

सामाजिक तौर पर पात-पानी फारने के रस्म को पूरा कर तलाक लिया और दिया जाता है।

बेदिया जनजाति की महिलाएं प्रायः नाक नहीं छेदती हैं।

महिलाएं प्रायः गोदना गोदाती हैं।

■ बेदिया समुदाय का जन्म व मृत्यु में क्रिया कलाप: (संस्कार)

बच्चों के जन्म के दिन से 3 दिनों तक अशुद्ध मानते हैं। 6 ठा दिन नहाना-धोना, नया कपड़ा पहनना, परिवार व गोत्र कुटुम्ब मिलकर खुशी मनाते हैं।

मृत्यु के बाद नदी-नाला को किनारे दफनाया जाता है तथा सुविधानुसार जलाया भी जाता है।

चेचक बिमारी से हुई मौत और बच्चे की मौत में सिर्फ दफनाया जाता है।

हर एक गोत्र कुटुम्ब को दफनाने के लिए अपना सामूहिक शमशान घाट (कब्रिस्तान) होता है।

जलायी गयी लाश के 3 हड्‌डी रूपी फूल को चुनकर परिवार कुटुम्ब के लोग रस्म अदायगी कर नहीं-नाला में पराह करते हैं।

दफनाने व जलाने के बाद प्रायः तीन दिन में छुतका मिटाते हैं और सात या दस दिनों में परमेशरी पूजा-पाठ कर गोत्र-पाइल कुटुम्ब को भोजन कराते हैं।

बेदिया समुदाय के सात गोत्र और छः उपगोत्र होते हैं-

गोत्र:-

1 – चिडरा (गिलहरी) उपगोत्र (क) सेंगा (ख) साइठ (ग) नेवला।

2 – सूइया (काले रंग की एक प्रकार की छोटी चिड़िया)

3 – बाम्बी, बाई (सांप की तरह लम्बी एक प्रकार की मछली)

4 – महुआ (महुआ पेड़ जो महुआ के फूल व फल पोत्रों उपयोगी है)

5 – डाडी डिबडा (कुएं में रहने वाली एक प्रकार की मछली)

6 – बिहा (एक प्रकार की छोटी मछली)

7 – फेचा (उल्लू पक्षी जिसे सिर्फ दिन को दिखाई देता है और रात्रि को नहीं।)

उपगोत्र- जिसका अर्थ होता है – खोढ़र में रहने वाला, बाहर रहने वाला और वृक्ष पर रहने वाला।

उपगोत्र- 

1 – काछिम, होरो (कछुआ)

2 – बोर-बड़ या बड़‌वार-बरवार (वटवृक्ष-पेड़)

3 – महुकल (एक तरह की चिड़ियां)

4 – सुंडी (एक प्रकार की चिड़िया)

5 – शेरहार (एक प्रकार की चिड़िया)

6 – दीयां (छोटी सफेद जीव जो मिट्टी का टिल्या बनाता है)

बेदिया जनजाति में अपने गोत्र को पवित्र व पुज्यनीय मानते हैं।

एक गोत्र यानी एक खून में विवाह नहीं करते हैं। 

परगोत्री यानी दूसरे गोत्र के साथ विवाह करने की प्रथा है। 

एक गोत्र में विवाह को अशुभ माना जाता है। 

क्योंकि इनके गोत्र किसी पक्षी, मछली, जीव-जन्तु, पेड़, फूल-फल आदि के नाम से है।

अपने गोत्र वाले जीव-जन्तु व फल-फूल को मारते-पीटते-काटते-खाते नहीं हैं, बाकी कोई भी जीव-जन्तु फल-फूल को खा सकते हैं।

झारखंड में बेदिया समुदाय का पूजा स्थल लुगु पहाड़ है जो ललपनिया (गोमिया) में अवस्थित है, जो आज सभी आदिवासियों का पूजा स्थल केन्द्र बन गया है।

वहीं खूंटागढ़ स्थल बोकारो जिला का ओरदाना पेटरवार में अवस्थित है। जो स्थल बेदिया राजा जितला का निवास गढ़ था।

जंगल के रास्ते किनारे में, मोड़ पर, पेड़ या पत्थर पर सैंकड़ों जगह वन देवी के नाम डाल-पता-पत्थर देकर प्रणाम करते हैं कि आगे मेरा रक्षा करना, जंगल में कुछ न हो, सकुशल रहने की कामना करते हैं।

पहाड़ के गुफाओं में, ऊंचे स्थानों में, नदी-गाढ़ा-नाला के स्थलों व दो पहाड़ के जुड़ाव स्थलों में पूजा-पाठ करते हैं।

गांव की रक्षा हेतु देवी के मडय में और देवता का भोक्ता-देवठान, देशवाली स्थल में पूजा करते हैं।

घर में, परिवार व कुल खानदान की रक्षा के लिए भूत पूजा करते हैं। (अलग-अलग भूतों का नाम होता है।)

खेती के पूर्व अषाढ़ी पूजा, घर में, खेत स्थल में और खासकर जब मुख्य फसल धान कट जाता है तो खलिहान में बनबोहली पूजा करते हैं।

अपने-अपने गोत्र परिवार की नयी पीढ़ी व ज्येष्ठ पुत्र के अवसर पर प्रत्येक 12 वर्ष में सूर्याही पूजा की जाती है।

बेदिया समुदाय के धार्मिक त्यौहार व सांस्कृति

सरना धर्म मानते हैं और सरना, सरहुल, जहेरा पूजा (रूसा पूजा) करते हैं।

गोहाल में गोरैया पूजा, लक्ष्मी स्वरूप जानवरों की पूजा। गाजे-बाजे के साथ नृत्य-गान होता है। अमावस्या की रात्रि में दीपक जलाते हैं।

करम पेड़ की डाली लाकर अखरा में गाड़ा जाता है और लड़कियां उपवास कर पूजा करती हैं। गाजा बाजा के साथ महिला-पुरूष नृत्य एवं गान करते हैं।

करम त्यौहार की भांति करम पेड़ की डाली लाकर अखरा-अंगना में गाड़ते हैं और और बच्चों की मांएं उपवास करके पूजा करती हैं।

जानवर के पागुर की पूजा महिलाएं पूर्णिमा के दिन रात्रि में उपवास कर गीत गाते हुए पूजा करती हैं।

मकर सक्राति के दिन लड़कियां (टुसू लड़की के प्रतीक के रूप में बनाकर गीत गाते हुए नदी में जाकर विसर्जन करती है। यह क्रिया मुख्यतः झालदा, गोला और सिल्ली में प्रचलित है।

फागुन की पूर्णिमा की रात्रि लकड़ी जलाकर साल-मास काटते हैं और उसके दूसरे दिन से नया साल शुरू करने की घोषणा करते हैं। लकड़ी की राख को माथा में, चंदन को गाल में लेप लगाकर नये साल के अवसर पर खुशी मनाते हैं।

जतरा मेला में डायर मेला के उत्सव में गीत गाया जाता है।

मनसा पूजा के अवसर पर नाग को देवता तुल्य पूजते हैं। खास कर यह प्रचलन बंगाल क्षेत्र के झालदा व झारखंड के गोला, सिल्ली में है।

मंडा पर्व (बिसु पर्व) मनाते हैं जिसके तहत निराकार शंकर-पार्वती को प्रतीक मानकर पूजा करते हैं।

जिस तरह से इनकी भाषा का लोप होता चला गया और वे जिस क्षेत्र में अपना निवास स्थान बना लिया वहीं की भाषा को अख्तियार कर लिया, उसी तरह इन्होंने अपनी संस्कृति व पर्व त्यौहारों सहित वहां की संस्कृति व पर्व त्यौहारों में भी अपनी भागीदारी निभाई।

जैसे अप्रवासी त्यौहारों के रामनवमी में सामाजिक तौर पर शामिल होते हैं। 

दशहरा पूजा (दूर्गापूजा) में शामिल होते हैं।

हाल के वर्षों से इनकी महिलाएं छठ पूजा में भी शरीक होने लगी हैं।

रथ मेला में शामिल होते हैं।

काली पूजा में देवी के नाम से बलि करते हैं।

सरस्वती पूजा में भी आशिक रूप से शामिल होते हैं।

रक्षा बन्धन त्यौहार में सामाजिक रूप से शामिल होते हैं।

बेदिया समुदाय अपनी प्रमुख समस्याओं को लेकर आन्दोलनरत रहा है। 

बेदिया समुदाय के रामगढ़ जिला के फूलसराय गांव निवासी किस्टो बेदिया बताते हैं कि – तत्कालीन बिहार राज्य के समय सिल्ली प्रखण्ड के 18 गांवों के बेदिया समुदाय की मांझी टाइटिल पर हुए विवाद को लेकर सरकार ने बेदिया को आदिवासी मानने से इन्कार कर दिया था। क्योंकि मांझी उपनाम संतालों का था और उनकी भाषा संताली थी, लेकिन बेदिया की भाषा स्थानीय थी। उसी आधार पर विवाद पैदा हुआ और बेदिया अनुसूचित जाति की मान्यता पर रोक लगा दी गई थी और इनका जाति प्रमाणपत्र में आदिवासी की मान्यता रद्द कर दी गई।

लेकिन जब 1978-79 में बिहार विधानसभा में दो दिन तक बहस चली तब जाकर इनके जनजाति प्रमाण-पत्र में आदिवासी की मान्यता निर्गत की गई।

1991 ई में बोकारो जिला में रह रहे बेदिया जनजाति को आदिवासी प्रमाण-पत्र पर रोक लगा दिया था जिसके विरूद्ध संघर्ष हुआ तब लागू हुआ।

1997 ई में हजारीबाग जिला भू-बन्दोबस्ती सर्वे में बेदिया को पिछड़ी सूची में जारी की गई थी जिसके विरुद्ध संघर्ष हुआ, तब से जनजाति के तहत भू-बन्दोबस्ती सर्वे जारी है।

झारखंड अलग राज्य होने के बाद 2001 ई में महेन्द्र सिंह ने झारखण्ड विधानसभा में याचिका दायर व बहस कर बेदिया-मांझी उपाधि एवं खतियान में लिखा हुआ कौम, मांझी को सुधार कर कौम बेदिया करने का निर्णय पारित कर लागू करवाया था।

एक बार पुनः सरकार कॉरपोरेट घरानों को जमीन मुहैया कराने के लिए। मार्च 2012 को झारखण्ड राज्य सरकार के भू-राजस्व सचिव ने बेदिया जनजाति को पिछड़ी जाति की सूची में जारी किया है, जबकि बेदिया 1950 के संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश और छोटानगर टेनेंसी लॉस के के 675-76 पृष्ठ में दर्ज है।

बेदिया अनुसूचित जनजाति विकास परिषद के नेतृत्व में मार्च से 31 मार्च 2012 तक बेदिया समुदाय आंदोलित रहा और सरकार को आवेदन देकर समस्या को हल करने की मांग की गई।

जारी संघर्ष के दौरान विधानसभा सत्र में कई राजनीतिक दल के विधायक बन्धु तिर्की, विनोद सिंह, प्रदीप यादव, अरूण मंडल व अन्य ने बहस उठाये। पुनः विधानसभा सत्र में बंधु तिर्की ने प्रश्नावली भी डाला। इसके बाद सरकार के द्वारा बेदिया को अनुसूचित जनजाति मानती है। लेकिन मार्च 2012 के जारी सूची पर खण्डन कर कोई आदेश नहीं दी गई।

अंग्रेजों के खिलाफ किए गए विद्रोह व लड़ाई में बेदिया समुदाय की भी भागीदारी रही है। 

अंग्रेजी हुकुमत के जुल्म और विदेशी गुलामी के खिलाफ अनेकों लोगों ने लड़ाइयां लड़ी थीं लेकिन दुखद यह रहा कि कई अमर शहीदों का इतिहास में न उनका लेखन हुआ और न ही आज तक उनकी सुधी ली गई। ऐसे ही एक गुमनाम शहीद जीतराम बेदिया थे। जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ यहां के लोगों को संगठित किया था और स्वयं कई लड़ाईयों का कुशलता पूर्वक नेतृत्व किया था।

शहीद जीतराम बेदिया का जन्म रांची जिला अन्तर्गत ओरमांझी प्रखण्ड के गगारी गांव में 30 दिसम्बर 1802 को पिता जगतनाथ बेदिया और माता महेश्वरी के घर में हुआ था। 

इनके पिता भी अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफत होने वाली लड़ाइयों में सक्रिय थे। अपने पिता की मृत्यु के बाद जीतराम बेदिया ने घुम-घुमकर लोगों को संगठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ लोगों जागरूकता पैदा की और लड़ाई छेड़ दी। 

उनकी बहादुरी, सुझबुझ और सांगठनिक क्षमता से यहां की जनता काफी प्रभावित थी। इससे अंग्रेज शासक भी घबराने लगे थे। 

अंग्रेज के खिलाफ 1955-56 के संथाल विद्रोह के बाद जब 1857 ई० को जब देश में सिपाही विद्रोह हुआ था उस वक्त इस विद्रोह की मशाल इस क्षेत्र में अमर शहिद जीतराम बेदिया, अमर शहिद टिकैत उमराव सिंह, और शेख भिखारी ने ही संभाल रखी थी। इस विद्रोह को दबाने के लिए आंग्रेज शासक ने मेजर मेकडोनाल्ड और मद्रासी फौज को भेज दिया था। मेजर मेकडोनाल्ड और उनकी मद्रासी फौज इसके लिए रामगढ़ में कैम्प किए हुई थी।

अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जंग छेड़ने के कारण ही टिकैत उमरांव सिंह, शेख भिखारी और जीतराम बेदिया की एकता बनी थी। मद्रासी फौज के मेजर मेकडोनाल्ड ने इन तीनों योद्धाओं जीतराम बेदिया, टिकैत उमरांव सिंह, शेख भिखारी को हर हाल मे पकड़ कर जनता के बीच फांसी पर लटकाने की योजना बनाई थी। जब टिकैत उमरांव सिंह और शेख भिखारी को गिरफ्तार करके 8 जनवरी 1858 ई० को चुटुपालू घाटी में बरगद के पेड़ पर लटका दिया था। इस समय भी जीतराम बेदिया अंग्रेजों की पकड़ से बाहर थे।

अमर शहीद टिकैत उमरांव सिंह और शेख भिखारी को मुकदमा चलाये बगैर बिना गवाही और दलील सुने फांसी पर लटका दिया गया तो यहां के लोगों का आक्रोश फूट पड़ा। हिन्दु-मुस्लिम और अन्य समुदाय के लोग इसे देखने के लिए हजारों-हजार की संख्या में चुटुपालू घाटी पहुंच गये। उस वक्त भी जीतराम बेदिया ने अपनी हाथों में तलवार लहराकर मद्रासी फौज मेजर मेकडोनाल्ड और अंग्रेजों को यहां से मार भगाने का आ‌ह्वान किया था।

वहीं मेजर मेकडोनाल्ड किसी भी तरह जीतराम बंदिया को गिरफ्तार करने अथवा मार डालने की ताक में था। अपनी छापामार युद्धकला संगठनिक क्षकता के और स्पष्ट वक्ता के कारण जनता जीतराम बेदिया के साथ खड़ी थी। जीतराम बेदिया और उनके लड़ाकू साथियों ने कई बार अंग्रेज सिपाहियों पर हमला बोला था। और घुटने टेकने को मजबूर कर दिया था। अमर शहीद जीतराम बेदिया ने गांव में घुम घुमकर यहां के लोगों को अंग्रेजी हुकुमत को नहीं मानने और अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम दम तक लड़ने का ऐलान किया था।

23 अप्रैल 1858 ई को गगारी और खटंगा गांव के बीच मेजर मेकडोनाल्ड और उनकी मद्रासी फौज ने जीतराम बेदिया सहित उनके लड़ाकू साथियों को घेर लिया था। लेकिन जोतराम बंदिया ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया। दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ। कई मद्रासी फौज भी मारे गए। इसी दौरान मेजर मेकडोनाल्ड के आदेश से जीतराम बेदिया को उनके घोड़ा सहित मद्रासी फौज द्वारा गोली मार दिया गया।

वहीं जीतराम बंदिया को उनके शव और मृत घोड़ा का बांसैरगढ़ा (जहाँ उस वक्त काफी गड्ढ़ा था) में गिराकर मि‌ट्टी भर दिया था। इस कारण गड्‌ढ़ा का नाम बांसैरगड्ढ़ा से घोड़ागड्‌ढ़ा कहा जाता है। बेदिया समुदाय से आनेवाले इस स्वतंत्रता संग्रामी जीतराम बेदिया को इतिहास में आज तक जगह नहीं दी गयी। राज्य सरकार, भारत सरकार और इतिहासकारों सहित केन्द्र व राज्य सरकार ने भी इस अमर योद्धा के साथ न्याय नहीं किया है। 

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply