जीत का “उन्माद” बहुत महंगा पड़ेगा

पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के नतीजे चार मई को आये थे। जिसमें भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की थी। 15 साल से शासन कर रही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस 100 से भी कम (80) सीटों पर सिमट गई। भारतीय जनता पार्टी को 208 सीटें मिलीं। इस बंपर जीत से उत्साहित बीजेपी कार्यकर्ताओं ने तृणमूल के नेताओं और कार्यकर्ताओं का जीना मुहाल कर दिया। इसकी शुरुआत मतगणना के दौरान ही हो गई।

जैसे ही तय हुआ कि बीजेपी ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रही है, उनके कार्यकर्ताओं ने मतगणना स्थल पर ही उपद्रव मचाना शुरू कर दिया। अगर किसी विपक्षी दल के कार्यकर्ता ने किसी बात पर आपत्ति जताई तो उसके साथ वहीं दुर्व्यवहार किया जाने लगा। कुछ विपक्षी पोलिंग एजेंट की पिटाई करते हुए भी बीजेपी कार्यकर्ता दिखे।

लेकिन यह तो कुछ भी नहीं था। नंगा नाच तो उसके बाद शुरू हुआ। जैसे ही घोषणा हुई कि बीजेपी दो सौ से ज्यादा सीटों पर जीत गई है, बीजेपी कार्यकर्ता तृणमूल कार्यकर्ताओं और नेताओं पर हमले करने लगे। उन्होंने उनके घरों और दफ्तरों पर हमले किये। इस समय प्रशासन चुनाव आयोग के हाथ में होता है। लेकिन प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। शांति व्यवस्था कायम करने के लिए केंद्रीय बल लगाये गये थे। वे भी दूर बैठे मजा लेते रहे। जैसे उन्हें आदेश दिया गया हो कि कुछ नहीं करना है। जो हो रहा है, होने दो।

गुजरात दंगों की याद ताजा होने लगी। वहां भी गोधरा कांड के बाद लोगों को कुछ भी करने की खुली छूट दे दी गई। तीन दिन तक कत्लेआम होता रहा। कोई न देखने वाला, न रोकने वाला। वैसा ही माहौल यहां भी दिखा। हत्या तो नहीं हुई लेकिन मार-कुटाई और आगजनी बड़े पैमाने पर हुई। न तो प्रधानमंत्री ने कहा कि ये गलत हो रहा है न केंद्रीय गृह मंत्री ने। चुनाव आयोग को, जिसके हाथ में प्रशासन था, उसे तो कुछ करना ही नहीं था। तब बीजेपी की ओर से कहा गया कि तृणमूल के गुंडों की पिटाई की जा रही है।

पिछले 15 साल से ये यही सब कर रहे थे। जीतने के बाद इसी तरह से सीपीएम और दूसरे विपक्षी दलों के नेताओं-कार्यकर्ताओं को पीट रहे थे। उनके घर-दुकान-दफ्तर जला रहे थे। अब इनके साथ भी वैसा ही सलूक किया जा रहा था।

लग रहा था कि कुछ दिन बाद यह सब शांत हो जाएगा, लेकिन नहीं। बीजेपी का उन्माद जारी रहा। जिस तरह से तृणमूल ने सीपीएम और लेफ्ट के कार्यकर्ताओं को पीटा था और उन्हें या तो तृणमूल में शांमिल होने या राजनीति छोड़ने को मजबूर किया था, उसी तरह से ये भी करना चाहते हैं। तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के बाद नंबर दो और लोक सभा में पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी जब अपने एक कार्यकर्ता के घर पहुंचे तो वहां उन पर हमला किया गया।

अभिषेक बनर्जी जिस कार्यकर्ता के यहां गये थे, हाल ही में बीजेपी के लोगों ने उस पर हमला किया था। जिस तरह से अभिषेक बनर्जी पर हमला किया गया उससे लगता है कि यह योजना पहले से ही बनाई गई थी। हमलावरों ने अभिषेक बनर्जी के सिर पर पत्थर बरसाए। अगर वह हेलमेट न पहने होते तो पता नहीं क्या हुआ होता। इतना ही नहीं जब उन्हें घायल अवस्था में अस्पताल ले जाया गया तो एक अस्पताल ने उन्हें भर्ती करने से भी मना कर दिया।

बाद में जिस अस्पताल में भर्ती हुए वहां भी उन्हें जल्दी डिस्चार्ज कर दिया गया। आरोप है कि वहां भी बीजेपी नेताओं ने अस्पताल पर उन्हें जल्दी डिस्चार्ज करने का दबाव बनाया। अभिषेक बनर्जी पर हमले के अगले दिन ही तृणमूल के एक दूसरे सांसद कल्याण बनर्जी पर भी हमला किया गया। इसके विरोध में कल्याण बनर्जी ने पुलिस थाने के सामने धरना भी दिया। बीजेपी कहती है कि इसमें उसका कोई हाथ नहीं है। जबकि इन घटनाओं में उसके नेता साफ-साफ दिख रहे हैं।

कोई लोगों को भ़ड़काते हुए तो कोई पत्थर और अंडे मारते हुए। इतना सब कुछ हो रहा है लेकिन न तो प्रधानमंत्री, न केंद्रीय गृहमंत्री और न ही मुख्यमंत्री ने इसकी निंदा की है। विपक्षी नेताओं की आलोचना और प्रशासन पर दबाव बढ़ने के बाद करीब पांच हमलावरों की पहचान करके गिरफ्तारी की गई है। अपने, महासचिव और सांसद एक दूसरे सांसद पर हुए हमले के खिलाफ ममता बनर्जी ने पूरे राज्य में सोमवार को प्रदर्शन आयोजित किया।

इस प्रदर्शन को टकराव की शुरूआत के रूप में भी देखा जा सकता है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी जीत भले गई हो पर विपक्ष समेत कई दूसरे लोगों का भी मानना है कि बीजेपी की यह जीत चुनाव आयोग के सहयोग से हुई है। वहां निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सके हैं। इसी आधार पर ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से इन्कार भी कर दिया था। आजादी के बाद देश में यह पहला मौका था जब किसी मुख्यमंत्री ने हारने के बाद इस्तीफा देने से मना कर दिया। यह सब देश और प्रदेश के लिए अच्छा नहीं है।

बीजेपी जीती जरूर है लेकिन ऐसा नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस बिल्कुल साफ हो गई है। उसके 80 विधायक तो जीते ही हैं साथ ही दोनों के वोटों में कोई बहुत बडा अंतर नहीं है। बीजेपी को जहां 45.85 प्रतिशत वोट मिले हैं वहीं तृणमूल कांग्रेस को 40.80 प्रतिशत। यानी आप कह सकते हैं कि 46 लोग 41 लोगों को जगह-जगह घेरकर मार रहे हैं। अभी वे 41 लोग खामोश हैं। अगर कहीं वे 41 लोग भी मुकाबले में उतर गये तो क्या होगा?

लेकिन बीजेपी जानती है कि फिलहाल केंद्र और अब राज्य दोनों में ही उसकी सत्ता है। अगर ये 41 लोग बगावत पर उतरेंगे तो उनके मुकाबले राज्य की पुलिस और केंद्रीय बलों को खड़ा कर दिया जाएगा। तब उन्हें कुचलना और आसान हो जाएगा। लेकिन वह इस बात की कल्पना नहीं कर पा रही है कि इतनी बड़ी तादाद में लोग जब सड़कों पर उतरेंगे तो उन्हें सम्हालना सुरक्षा बलों के लिए भी बहुत मुश्किल हो जाएगा।

शायद इसीलिए बीजेपी इन लोगों में डर का माहौल पैदा कर रही है। उनके सांसदों और विधायकों को डरा-धमका कर तोड़ने की कोशिश कर रही है ताकि वे टूटकर खुद ही कमजोर हो जाएं। इसकी झलक भी दिखने लगी है। तृणमूल की एक महिला सांसद ने लोक सभा में अपने ही सांसद कल्याण बनर्जी के खिलाफ अध्यक्ष से शिकायत की है। यह भी कहा जा रहा है कि सांसदों पर हमले के खिलाफ ममता बनर्जी ने जब अपने विधायकों की बैठक बुलाई तो उसमें सिर्फ 20 विधायक ही पहुंचे।

हालांकि तृणमूल ने खुद ही कहा कि बाकी विधायक सांसदों और राज्य में कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों के कारण ही अपने-अपने क्षेत्रों में व्यस्त थे। इसलिए वे नहीं आ पाए।

कुल मिलाकर देखें तो पश्चिम बंगाल में स्थिति बहुत खराब है। कानून व्यवस्था नाम की वहां कोई चीज नहीं रह गई है। पिछले करीब 25 सालों में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिला जब किसी राज्य के सांसदों पर हमला किया गया हो। वह भी चुनाव हारने के बाद। बात यहां तक चल रही है कि इन सांसदों और विधायकों को तेलंगाना या किसी दूसरे सुरक्षित राज्य में रहने के लिए भेजा जाए जहां विपक्ष की सरकार हो। इससे कम हालात बिगड़ने पर बीजेपी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की बात करने लगती थी।

उसी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के शासन में राज्यपाल तक कहते नहीं थकते थे कि कानून व्यवस्था की स्थिति खराब है। लेकिन तब भी वहां किसी बीजेपी के सांसद या विधायक पर हमला नहीं हुआ। ममता बनर्जी चाहतीं तो तब वहां भी तृणमूल के कार्यकर्ता बीजेपी के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ ऐसा ही व्यवहार कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। बीजेपी, प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री, मुख्यमंत्री को यह बात खुद देखनी चाहिए।

कहीं ऐसा न हो कि स्थिति विकट हो जाए और पश्चिम बंगाल भी मणिपुर बन जाए। लोक सभा के दो सांसदों पर हमला हुआ है। लोक सभा अध्यक्ष को भी इस बारे में सोचना चाहिए। खास बात यह है कि इन दोनों सांसदों की सुरक्षा भी राज्य सरकार ने हटा ली है। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट को भी इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो बात हाथ से निकल जाए।

(अमरेन्द्र कुमार राय का लेख)

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