ग़ज़ब स्थिति है देश में। मुद्दा यह नहीं बन रहा है कि भविष्य बनाने की उम्र में बच्चे एक दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हैं। मुद्दा यह नहीं बन रहा कि बच्चों में जाति धर्म के नाम पर इतनी नफरत पैदा कर दी गई है कि एक दूसरे की हत्या तक कर दे रहे हैं। मुद्दा यह नहीं बन रहा कि भाईचारा समाप्ति की ओर है। मुद्दा यह नहीं बन रहा है कि पुलिस प्रशासन की विफलता की वजह से दिन दहाड़े हत्या कर दी जा रही है।
रेप, गैंगरेप की घटना हो रही है। मुद्दा यह नहीं बन रहा है कि किसी समय समाज सेवा के रूप में जाने जाने वाले शिक्षा और चिकित्सा पेशे आज की तारीख में लूट केंद्र बनते जा रहे हैं। मुद्दा महंगाई, बेरोजगारी और कानून व्यवस्था का नहीं बन रहा है। मुद्दा किसान, मजदूर, युवा, महिला बच्चों की समस्याओं का नहीं बन रहा है। मुद्दा मोदी सरकार के अमेरिका के दबाव में निर्णय लेने का नहीं बन रहा है। मुद्दा गैस सिलेंडर के 3000 रुपए में मिलने का नहीं बन रहा है।
मुद्दा यह बन रहा है कि एक मुसलमान ने एक हिंदू को मार दिया। मुद्दा पुलिस को शाबाशी देते हुए आरोपी के एनकाउंटर का बन रहा है। मुद्दा आरोपी के घर पर बुलडोजर चलने का बन रहा है। मुद्दा गाय माता का बन रहा है। मुद्दा यूटूबर शिक्षकों का बन रहा है। मुद्दा मंदिर, मस्जिद का बन रहा है। मुद्दा सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज का बन रहा है। जहां पुलिस प्रशासन बेलगाम है वहीं एनकाउंटर की एक नई परिपाटी चल निकली है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि एनकाउंटर तो रोज हो रहे हैं पर अपराध क्यों नहीं रुक रहे हैं ? अब तक तो हिन्दू मुस्लिम को लेकर नफरत फैलाई जाती थी अब सामान्य, ओबीसी, एससी एससी एसटी को लेकर भी नफरत फैलाई जा रही है। यह बात समझने की है कि यदि यही हिंदू मुस्लिम होता रहा तो वह दिन दूर नहीं की इन राजनीतिक दलों की वोटबैंक की फसल के लिए खाद हमारे बच्चों की बनेगी।
एनकाउंटर और बुलडोजर के पक्षधर यह भी तो बताएं कि मर्डर तो ग्रेटर नोएडा में भी हुआ है। कुकर्म भी हुआ है। खोड़ा से अधिक ही घिनौना काम किया गया है। क्या आरोपी का एनकाउंटर हुआ? क्या आरोपी के घर पर बुलडोजर चल गया ? निश्चित रूप से पीड़ित को कोर्ट से न्याय नहीं मिल पाता है। निश्चित रूप से अपराधी को सख्त से सख्त सजा मिले। पर व्यवस्था ऐसी हो कि अपराध हो ही न। लोग प्यार मोहब्बत से रहें।
जमीनी हकीकत यह है कि देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनाए गए सभी तंत्र सरकार के लिए काम कर रहे हैं। और सरकार पूंजीपतियों और अमेरिका के लिए। जिस तरह से केंद्र सरकार अमेरिका के दबाव में निर्णय ले रही है ऐसे में देश के फिर से गुलाम होने की आशंका हो गई है। इसकी शुरुआत होगी अमेरिका के साथ कृषि ट्रेड डील से होगी। यदि इस बार देश गुलाम हुआ तो हम आजादी की लड़ाई भी न लड़ पाएंगे। क्योंकि इन राजनीतिक दलों ने जाति और धर्म के नाम पर इतनी नफरत पैदा कर दी है कि हम एकजुट भी न हो पाएंगे। इन राजनीतिक दलों की वोटबैंक की राजनीति से बाहर निकलिए और देश और अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचिए।