शिक्षा, परीक्षा और रोजगार का सवाल आज नौजवानों के लिए गहरी पीड़ा, असुरक्षा और विक्षोभ का कारण बना है। सोशल मीडिया और सड़क पर नौजवानों का आक्रोश दिख रहा है। 6 जून 2026 को नौजवानों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आवाहन किया है। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके भारत लौट रहे हैं और उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से सभी नौजवानों से जंतर मंतर स्थित पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने पहुंचने को कहा है। उसी दिन रोजगार अधिकार अभियान ने एक्स पर नेशनल कैंपेन चलाने की घोषणा की है।
लोगों की मांग है कि नीट पेपर लीक तथा सीबीएसई कॉपी चेक में हुई धांधली की जबावदेही तय की जाए और इसके जिम्मेदार देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए। यदि वह इस्तीफा न दें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त करना चाहिए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत देश के अन्य छात्र युवा संगठनों और आंदोलनरत छात्रों की तरफ से भी इस मांग को उठाया गया है।
इस लोकप्रिय और न्यूनतम मांग पर विचार करने की जगह पूरी भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शिक्षा मंत्री के बचाव में उतर पड़े हैं।
आखिर जब धर्मेंद्र प्रधान खुद ही इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि चूक हुई है और वह एक हद तक जिम्मेदारी भी ले रहे हैं। तो भी उन्हें पद से क्यों नहीं हटाया जा रहा और उनका इस्तीफा नहीं लिया जा रहा है। दरअसल इसका कारण है कि पिछले 12 सालों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय शिक्षा प्रणाली पर डीप स्टेट कंट्रोल स्थापित कर रखा है।
2014 जबसे भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार केंद्र में सत्ता में आई है तब से आरएसएस ने निचले स्तरों से लेकर उच्च शिक्षा स्तर तक अपनी हिंदुत्व की फासीवादी विचारधारा के अनुरूप भारी बदलाव को अंजाम दिया है। पाठ्यक्रमों में बदलाव किया गया। इतिहास की पुनर्व्याख्या करते हुए अंग्रेजों के जमाने के सांप्रदायिकता आधारित इतिहास की थिथिस को स्थापित किया गया। पाठ्यक्रमों में सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक का इतिहास पढ़ाना ही बंद कर दिया गया।
संविधान के अनुच्छेद 51 ए (एच) में दिए नागरिक के कर्तव्यों में वैज्ञानिक विचारों को बढ़ावा देने की जगह हर जगह दकियानूसी और पोंगापंथी विचारों को बढ़ावा दिया जाने लगा। विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को नियंत्रित करके उसे एकरूपता प्रदान करने के नाम पर अपने सांचे में बदल दिया गया।
आरएसएस ने अपने लोगों की मनमानी ढंग से उच्च शिक्षा में कुलपति और अध्यापक के रूप में नियुक्ति की। हर नियुक्ति में एबीवीपी की पृष्ठभूमि की तलाश की जाने लगी। परिणाम यह हुआ कि योग्य लोग नियुक्तियों से बाहर हो गए और अयोग्य और असक्षम लोगों का बोलबाला हो गया। शिक्षा में वैज्ञानिक और गुणवत्ता पूर्ण पाठ्य पुस्तकों के लिए बनाई गई एनसीईआरटी को बर्बाद कर दिया गया और यूजीसी जैसी संवैधानिक संस्था को कमजोर कर दिया गया।
यदि अभी उठ रहे नौजवानों की पीड़ा और असंतोष पर गौर करें तो यह भी भाजपा-आरएसएस की इन्हीं कार्रवाइयों का परिणाम है। नीट के पेपर लीक को ही ले। यह परीक्षा नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) जैसी गैर संवैधानिक संस्था द्वारा कराई जा रही है। जबकि नीट का गठन 2013 में इस उद्देश्य किया गया था कि मेडिकल के देश में अलग-अलग संस्थान होने के नाते छात्रों को कई परीक्षाएं देनी पड़ती है और इसके लिए अलग-अलग फॉर्म भरने से उन पर आर्थिक बोझ भी पड़ता है। इसलिए एक एग्जाम से यह दिक्कत दूर की जाएगी।
नीट की परीक्षा पहले सीबीएसई कराता था जो देश की संसद द्वारा बनी संस्था थी और सीधे तौर पर सरकार के अधीन थी। इसी तरह इंजीनियरिंग के जेईई की परीक्षा आईआईटी कराते थे, वे भी सरकारी संवैधानिक संस्थान थे। इसकी जगह 2017 में सरकार ने एनटीए का गठन किया जो सोसाइटी एक्ट में पंजीकृत संस्था है। जिस पर सरकार का सीधा नियंत्रण नहीं है। बार-बार पूछने के बावजूद आज तक एनटीए ने अपना बाईलॉज अपनी वेबसाइट पर नहीं लगाया। जबकि इसके जिम्में न सिर्फ नीट का एग्जाम है बल्कि अति प्रतिष्ठित जेईई, यूजीसी नेट, सीयूटी, सीमैट, जीपैट आदि प्रवेश परीक्षाएं भी हैं।
सभी को मालूम है कि 2024 में इसी संस्था द्वारा कराए नीट एग्जाम में पेपर लीक हुआ था और देश में चले लंबे आंदोलन के बाद कुछ केंद्रों पर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पुन: परीक्षा भी कराई गई थी। इस बार भी जब मामला सुप्रीम कोर्ट में गया तो कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि पेपर लीक में जवाबदेही तय की गई होती तो इस तरह की घटना ना होती। लेकिन कोर्ट की इस महत्वपूर्ण टिप्पणी का भाजपा सरकार के लिए कोई महत्व नहीं है।
इनके शासन की हालत देखिए 2024 में नीट पेपर लीक के समय एनटीए के महानिदेशक रहे सुबोध कुमार सिंह इस समय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव है। 2024 में एनटीए के चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी जो इस समय भी चेयरमैन हैं। ये 2006-2011 तक मध्य प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन के अध्यक्ष रहे थे। जिसके अंतर्गत मेडिकल प्रवेश परीक्षा भी आती है। इस परीक्षा में धांधली, साल्वर गैंग, फर्जी अभ्यर्थी और ओएमआर हेरफेर के आरोप है, जिसे व्यापम घोटाले के रूप में जाना जाता है।
इसकी आंच प्रदीप जोशी तक जाती है। इतना ही नहीं पेपर लीक में पुणे से गिरफ्तार अध्यापकों के साथ धर्मेंद्र प्रधान और भाजपा नेताओं की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल है।
ऐसे ही यदि सीबीएसई के पेपर मूल्यांकन में ऑनलाइन स्क्रीनिंग मार्किंग की प्रणाली को देखें तो इसमें खामियों और निहित स्वार्थ स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है। छात्र वेदांत श्रीवास्तव ने उत्तर पुस्तिका की स्कैनिंग की गड़बड़ियों को उजागर किया। 19 वर्षीय छात्र निशरगा अधिकारी ने इडूटेक की बेवसाइट की लाक को तोड़कर और सुरक्षा में सेंध लगाकर सच दुनिया के सामने लाया। झारखंड के 12वीं के छात्र सार्थक सिद्धांत ने पूरी टेंडर प्रक्रिया में बरती गई अनियमिताओं को उजागर किया है।
जिस कोइंपैक्ट इडूटेक प्राइवेट लिमिटेड को टेंडर दिया गया उसके भी भाजपा की चहेती महिपाल यूनिवर्सिटी से रिश्ते सोशल मीडिया पर सामने लाए जा रहे हैं। ज्यादा सक्षम टाटा कंसलटेंसी सर्विस सेंटर को टेंडर ना देकर इडूटेक को टेंडर देने में भी निहित स्वार्थ की बात लोगों की जुबान पर है।
सब मिला जुलाकर कहा जाए तो तत्कालिक लाभ के लिए लाखों छात्रों के भविष्य के साथ खेला गया। यही हाल देश में प्रतियोगी परीक्षाओं का भी हो गया। उत्तर प्रदेश में तो चर्चित कहावत बन गई है कि हर प्रतियोगी परीक्षा को प्री, मेंस, इंटरव्यू, पेपर लीक, सीबीआई जांच, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट जैसे कई चरणों से गुजरना पड़ता है। भर्ती आयोग की निष्पक्षता खत्म हो गई।
करोड़ों पद सरकारी विभागों में रिक्त है जिन्हें भरा नहीं जा रहा है। इस पर गौर करने की जगह सरकार छात्रों की पीड़ा व्यक्त करने वाले आंदोलनों के दमन पर उतर आई है। प्रयागराज से लेकर देश के विभिन्न जगह छात्र नौजवानों का लगातार दमन हो रहा है।
बहरहाल इस सबके खिलाफ नौजवान पीढ़ी आंदोलन की राह पर है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक इसका प्रतिवाद दिख रहा है और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा से शुरू हुआ यह आंदोलन आरएसएस के शिक्षा प्रणाली में डीप स्टेट कंट्रोल के खिलाफ तक जाएगा। यही कारण है कि धर्मेंद्र प्रधान को बचाने में पूरा सरकारी तंत्र लगा है।
(लेखक ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट, उत्तर प्रदेश के प्रदेश महासचिव है।)