थप्पड़ कांड : हथेली पर लोकतंत्र 

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती रही है कि यहाँ हर नागरिक को बोलने का अधिकार है। लेकिन लगता है कि समय के साथ इस सिद्धांत में एक छोटा-सा संशोधन कर दिया गया है। अब कुछ लोगों का विश्वास है कि बोलने से पहले हाथ चलना चाहिए, क्योंकि शब्दों की पहुँच सीमित होती है, जबकि थप्पड़ का वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों दर्शकों तक पहुँच जाता है।

एक समय था जब असहमति प्रकट करने के लिए लोग लेख लिखते थे, पुस्तकें प्रकाशित करते थे, सभाएँ करते थे, जुलूस निकालते थे और बहसों में भाग लेते थे। अब यह सब मेहनत का काम लगता है। पाँच सौ शब्द लिखने से आसान पाँच उँगलियाँ चलाना समझा जाने लगा है। तर्क जुटाने की आवश्यकता नहीं, बस कैमरा चालू होना चाहिए।

हमारे समय की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह है कि हर घटना के साथ उसका तत्काल नैतिक औचित्य भी तैयार मिलता है। जिसने हाथ उठाया, वह बताता है कि उसने किसी महान उद्देश्य की रक्षा की। जिसने जवाब दिया, वह भी किसी और महान उद्देश्य का प्रतिनिधि बन जाता है। इस प्रकार हथेली और आदर्श का गठबंधन इतना मजबूत हो चुका है कि देखने वाले को भ्रम होने लगता है कि शायद संविधान की प्रस्तावना में “हम भारत के लोग” के बाद “और आवश्यकता पड़ने पर हम भारत के थप्पड़” भी लिखा होगा।

यह नया युग अत्यंत सुविधाजनक है। पहले किसी विचार का विरोध करने के लिए उसे पढ़ना पड़ता था। अब पढ़ने की आवश्यकता नहीं। शीर्षक देखिए, किसी मित्र का संदेश पढ़िए, सोशल मीडिया पर दो टिप्पणियाँ देखिए और निर्णय कर लीजिए कि सामने वाला राष्ट्र-विरोधी है, संस्कृति-विरोधी है, आधुनिकता-विरोधी है, परंपरा-विरोधी है या फिर किसी अन्य सुविधाजनक श्रेणी में रखा जा सकता है। श्रेणी तय होते ही संवाद अनावश्यक हो जाता है।

कभी-कभी लगता है कि हम बहस की संस्कृति से नहीं, बहस के धैर्य से थक गए हैं। तर्क समय माँगता है। पढ़ना पड़ता है, सुनना पड़ता है, उत्तर देना पड़ता है। थप्पड़ इन सब औपचारिकताओं से मुक्ति दिला देता है। वह घोषणा करता है—“मैंने तुम्हें सुना नहीं, समझा नहीं, परंतु असहमत अवश्य हूँ।”

विडंबना यह है कि हर विचारधारा अपने विरोधी के हिंसक व्यवहार की निंदा करती है और अपने समर्थकों की आक्रामकता में परिस्थितियों का दबाव खोज लेती है। यदि विरोधी ने हाथ उठाया तो लोकतंत्र खतरे में है; यदि अपने पक्ष के व्यक्ति ने वही किया तो भावनाएँ आहत थीं। इस अद्भुत लचीलेपन पर कोई शोध होना चाहिए। संभव है भविष्य में राजनीतिक विज्ञान की नई शाखा खुले—“स्थितिजन्य नैतिकता एवं चयनात्मक आक्रोश अध्ययन”।

समाज भी कम दिलचस्प नहीं है। घटना के अगले ही क्षण दो शिविर बन जाते हैं। एक पूछता है—“थप्पड़ क्यों मारा?” दूसरा पूछता है—“पहले यह बताओ कि सामने वाले ने ऐसा क्या कहा था?” जैसे हिंसा की समीक्षा नहीं, उसकी पटकथा लिखी जा रही हो। कुछ लोग वीडियो को बार-बार देखकर कोणों का विश्लेषण करते हैं, मानो किसी महान खेल प्रतियोगिता का स्लो मोशन चल रहा हो।

मीडिया को भी इसमें अपना अवसर दिखाई देता है। स्क्रीन पर चमकता है—“देखिए, वह क्षण जब इतिहास बदल गया।” फिर पाँच विशेषज्ञ बैठते हैं, जिनमें से दो कहते हैं कि यह लोकतंत्र का अंत है, दो कहते हैं कि यह जनभावना की अभिव्यक्ति है और पाँचवाँ कहता है कि दोनों पक्षों में संवाद होना चाहिए, लेकिन उसकी बात विज्ञापन के कारण पूरी सुनाई नहीं देती।

सोशल मीडिया पर तो और भी अद्भुत दृश्य उपस्थित होता है। वहाँ न्यायालय भी है, पुलिस भी है, गवाह भी हैं और जल्लाद भी। किसी ने वीडियो साझा किया, किसी ने मीम बना दिया, किसी ने कविता लिख दी, किसी ने राष्ट्र बचा लिया और किसी ने सभ्यता। शाम तक नया विषय आ जाता है और पुराना थप्पड़ डिजिटल इतिहास में सुरक्षित रख दिया जाता है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर फिर से उपयोग हो सके।

सबसे अधिक नुकसान उस संस्कृति का होता है जिसे लोकतंत्र कहते हैं। लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं है। उसका अर्थ है यह स्वीकार करना कि दूसरा व्यक्ति वह बात कह सकता है जो आपको पसंद न हो। वह आपके विश्वासों को चुनौती दे सकता है। आप उसके विचारों का प्रतिवाद कर सकते हैं, उसका उपहास कर सकते हैं, उसके तर्कों को खारिज कर सकते हैं, पर यदि आपकी अंतिम दलील हथेली है, तो संभव है आपके पास तर्कों का भंडार कम पड़ गया हो।

किसी समाज की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि वहाँ कितने लोग एक जैसा सोचते हैं। वह इस बात से मापी जाती है कि वहाँ कितने लोग अलग-अलग सोचते हुए भी एक-दूसरे को बोलने देते हैं। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसका ईंधन है। जो समाज असहमति से डरता है, वह अंततः प्रश्नों से भी डरने लगता है।

हमारे यहाँ अक्सर कहा जाता है कि युवाओं में ऊर्जा बहुत है। यह बिल्कुल सही है। लेकिन ऊर्जा का सर्वोत्तम उपयोग पुस्तकालय बनाने, प्रयोगशालाएँ खड़ी करने, नए विचार विकसित करने और समाज के कठिन प्रश्नों का समाधान खोजने में होता है। यदि वही ऊर्जा केवल विरोधी के गाल तक पहुँचने में खर्च हो जाए, तो इतिहास इसे उपलब्धि नहीं मानेगा।

यह भी विचित्र है कि हम महान सभ्यता के उत्तराधिकारी होने का गर्व करते हैं। हम उन दार्शनिक परंपराओं का स्मरण करते हैं जहाँ शास्त्रार्थ होते थे, जहाँ मतभेदों पर घंटों नहीं, दिनों तक चर्चा चलती थी, जहाँ पराजित विद्वान भी सम्मान पाता था। किंतु आज कभी-कभी लगता है कि हमने उस विशाल परंपरा का सार पाँच उँगलियों में समेट लिया है।

यदि यही प्रवृत्ति बढ़ी, तो भविष्य की कल्पना कीजिए। विश्वविद्यालयों में वाद-विवाद प्रतियोगिता की जगह “त्वरित प्रतिक्रिया स्पर्धा” होगी। शोध-प्रबंध का मूल्यांकन इस आधार पर होगा कि लेखक ने कितने लोगों को नाराज़ किया। संसद में प्रश्नकाल के स्थान पर “हथेली काल” चलेगा। पुस्तक मेलों में लेखक अपनी नई किताब के साथ हेलमेट भी बेचेंगे। और शायद किसी दिन नागरिक शास्त्र की पाठ्यपुस्तक में नया अध्याय जोड़ा जाएगा—“लोकतांत्रिक थप्पड़ : इतिहास, सिद्धांत और व्यवहार।”

लेकिन व्यंग्य की सीमा यहीं समाप्त हो जाती है और वास्तविकता सामने आ खड़ी होती है। किसी भी समाज को अंततः शब्द ही आगे ले जाते हैं, प्रहार नहीं। विचारों की लड़ाई विचारों से जीती जाती है। जो बात तर्क से सिद्ध नहीं हो सकती, वह हिंसा से भी स्थायी रूप से सिद्ध नहीं होती। थप्पड़ केवल क्षणिक शोर पैदा करता है; विचार पीढ़ियों तक यात्रा करते हैं।

इसलिए शायद समय आ गया है कि हम अपनी हथेलियों से अपेक्षा कम करें और अपने मस्तिष्क से अधिक। हाथ मिलाने के लिए बने हैं, पुस्तक उठाने के लिए बने हैं, मतदान करने के लिए बने हैं, किसी ज़रूरतमंद को सहारा देने के लिए बने हैं। यदि वे हर असहमति का उत्तर बनने लगें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे संवाद से नहीं, प्रतिक्रियाओं से संचालित होने लगेगा।

राष्ट्र की शक्ति नारों की ऊँचाई से नहीं, नागरिक विवेक की गहराई से बनती है। और लोकतंत्र की सबसे विश्वसनीय पहचान यह नहीं कि लोग कितनी ज़ोर से चिल्ला सकते हैं, बल्कि यह है कि वे कितनी गहरी असहमति के बावजूद एक-दूसरे को सुन सकते हैं।

किसी दिन जब इतिहासकार हमारे समय का वृत्तांत लिखेंगे, तो आशा है कि उन्हें यह नहीं लिखना पड़ेगा कि यह वह युग था जिसमें तर्क पराजित हुआ और हथेली विजयी हुई। बेहतर होगा कि वे लिखें—यह वह समय था जब समाज ने क्षणिक उत्तेजना से ऊपर उठकर संवाद, शालीनता और वैचारिक साहस को फिर से अपना सबसे बड़ा लोकतांत्रिक औज़ार बनाया।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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