2014 में भाजपा की जीत का मूल्यांकन करते हुए भाकपा माले ने कहा था कि भारतीय लोकतंत्र की गाड़ी दुर्घटना ग्रस्त हो गई है। इतिहास के साथ छल करते हुए कहा जा रहा है कि मोदी ने चुने हुए प्रधानमंत्री के बतौर नेहरू को पीछे छोड़ कर नया रिकॉर्ड बना दिया है। इस समय देश शताब्दी के सबसे बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा है। जिसे नजर अंदाज करते हुए मोदी के निर्देशनं में कृत्रिम उपलब्धि के नाम पर आयोजन की तैयारी पहले से चल रही थी।
वैश्विक संकट के दौर में आश्चर्य होता है कि एक चुनी हुई सरकार की प्राथमिकताएं क्या है। जैसी खबर मिल रही है सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से नेहरू से महान दिखाने के लिए मुकम्मल प्रचार की योजना तैयार की गई थी। जिसकी शुरुआत संघ के बदनाम विचारक राम माधव द्वारा इंडियन एक्सप्रेस में लिखे गए लेख से होती है।
इसके बाद अप्रासंगिक हो चुके एक-एक करके उन नेताओं के नाम से इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबारों में लेख आने लगे। जो या तो गुमनामी में जिंदगी काट रहे हैं या जिनकी सरकार मोदी की मर्जी पर चल रही है। जिनमें कुछ ईडी सीबीआई के राडार पर पहले से थे। मरा-डरा बिका ‘गुलाम’ नेताओं, पत्रकारों और तथाकथित विचारकों का समूह मोदी के महिमा मंडल पर उतर आया है। लगता है भारत में अब किसी और समस्या पर विमर्श की जरूरत नहीं है। यानी सब कुछ चंगा सी।
समय का पलटवार
जिस समय उत्सव चल रहा था। ठीक उसी समय समय तीन बड़ी घटनाएं हुई। एक- थी राम मंदिर के चढ़ावे के पैसे की चोरी। संघ-नीत मोदी सरकार जिस एक प्रोजेक्ट पर टिकी है, वह है “अयोध्या में राम मंदिर निर्माण।” कालचक्र ने वहीं से पाखंड और षड्यंत्र का जवाब दिया।” चढ़ावे के माल की चोरी।” यह खबर बाहर से नहीं, राम मंदिर व्यवस्था के लिए बनाए गए ट्रस्ट के अंदर से फूट निकली है।
यहां याद रखना चाहिए कि ट्रस्ट के प्रबंधन की जिम्मेदारी संघ से जुड़े स्वयंसेवकों और विश्वस्त नौकरशाहों के हाथ में है। इस लौह ढांचे से जुड़े कुछ भोले और आदर्शवादी कार्यकर्ताओं ने अनजाने में भ्रष्टाचार पर से पर्दा उठा दिया। चोरी और षड्यंत्र का खेल नया नहीं है। इसका प्रारंभ आंदोलन के जन्म के साथ से ही गया है। असत्य अपराध के सम्मिश्रण से गढ़ी गई कहानियों दृष्टांतों और सामाजिक विभाजन तथा नफरत के क्रूर शस्त्रों द्वारा सुसज्जित इस आंदोलन को अंतोगत्वा “माल “के इर्द-गिर्द केंद्रित होना ही था।
पूंजीवादी सभ्यता में समाज के सभी क्रियाकलाप और जीवन व्यवहार आना-पाई-कौड़ी के इर्द गिर्द ही संचालित होते हैं। लंबे समय से आंदोलन के नेताओं के क्रियाकलापों को लेकर सिस्टम के अंदर से सवाल उठ रहे थे। लेकिन क्रूर संघी नेतृत्व में वीएचपी के ढीठ दबंग षड्यंत्रकारी पदाधिकारियों द्वारा सवाल उठाए जाने वालों को रामद्रोही, देशद्रोही, हिंदू द्रोही कहकर हाशिये पर ठेल दिया गया।
आप को याद होगा कि जब पहली बार राम मंदिर के नाम पर बने ट्रस्ट और अधिग्रहित भूमि के लूट की खबरें आई थी तो वीएचपी और राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने ढिठाई के साथ कहा था, “हमारे ऊपर तो गांधी की हत्या का भी आरोप लगा था। लेकिन उससे हमारा क्या बिगड़ा।” सच है अगर गांधी की हत्या के समर्थक आज सत्ता के शिखर पर बिराजमान हैं। तो यह ढीठपना आ ही जाना चाहिए।
लेकिन यह तो “माल का ही कमाल है”। जिसने उतर प्रदेश में संघ के सर्वेसर्वा और विश्वस्त बंसल परिवार के हाथ राम मंदिर ट्रस्ट की लौह व्यवस्थाओं की कमान होने के बाद भी भांडा फूट गया। राम मंदिर उद्घाटन के बाद पहली बरसात में ही छत टपकने लगी थी। तो उस समय दबी-जुबान से निर्माण में हुए भ्रष्टाचार की चर्चा उठी थी।(यहां याद रखें कि नयी संसद का छत भी पहली बरसात में टपकने लगा था। क्या शानदार समानता है।)
राम मंदिर आंदोलन के एक नेता और अयोध्या से भाजपा सांसद रह चुके विनय कटिहार ने चंपत राय पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। लेकिन पवित्रता, शुचिता, संस्कार, चरित्र का जाप करने वाले संघ परिवार ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया और विनय कटिहार को हाशिये पर ढकेल दिया गया। यह संघ की संस्कृति का हिस्सा है कि संघ से जुड़ा सदस्य अगर सत्य के साथ खड़ा होता है तो उसे बुरे अंजाम भुगतने होते हैं।
कर्नाटक सरकार के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे द्वारा आरएसएस पर सवाल उठाए गए हैं। इस पर भाजपा के राज्यसभा सांसद ने खड़गे को चेतावनी देते हुए कहा है कि एक दलित को आरएसएस के खिलाफ आवाज नहीं उठानी थी। क्योंकि जिसने आरएसएस के खिलाफ आवाज उठाई। वह सुरक्षित नहीं रहा। एक दलित को इस झंझट में पड़ने से बेहतर था कि आराम से वह सत्ता सुख भोगता। शायद इसी सीख पर अमल करते हुए विपक्ष के अनेकों सांसद, मंत्री, विधायक और नेता भाजपाई बाड़े की तरफ दौड़ पड़े हैं।
फिर भी खबर है कि ट्रस्ट में लेखाकार के बतौर काम कर चुके स्वयंसेवक द्वारा हेराफेरी की खबर सामने आई। जिसे सवाल उठाने पर घर जाने के लिए मजबूर कर दिया गया। (दुआ है संघ के रामजी से महिपालसिंह को सुरक्षित रखें।) ख़बरें आ रही है कि कुछ लोग गिरफ्तार किए गए हैं। सवाल है इस विशाल आक्टोपसी जाल पर कार्रवाई कौन करेगा। जिसने आंदोलन की भौतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों को निगल लिया है।
जिस राम मंदिर आंदोलन की पूंछ पकड़कर संघ परिवार ने भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को तहस-नहस करते हुए भारतीय राज्य पर कब्जा किया। आज उसी राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वार दान किए गए पैसे और गहनों के हिसाब में “बड़े भाई साहब” द्वारा किए गए गोलमाल ने मोदी के 12 वर्ष सत्ता में रहकर नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ने पर हो रहे पाखंडी उत्सव की चमक को फीका कर दिया है। यानी संघी कारनामे ने ही पलटवार किया। यह दिन तब देखना पड़ा जब सेकुलर नेहरू से कथित राम भक्त मोदी आगे निकल रहे थे।
दूसरा, विगत सौ वर्षों से गुब्बारा फुलाया गया था कि आरएसएस और भाजपा राष्ट्र भक्तों के संगठन हैं। जो 100% झूठ था। हुर्मुज की खाड़ी में उसी समय यह गुब्बारा फूट गया जब मोदी और भक्तगण उत्सव में डूबे थे। विश्व गुरु, विश्व नेता और अमेरिका को झुका देने वाले मोदी मीडिया के दावे के विपरीत अमेरिका ने लगातार तीन भारतीय तेल जहाज़ों पर हमला कर भारतीयों की हत्या कर दी। दर्जनों घायल हैं। अब तक तीन भारतीय कर्मचारी मारे गये है।
मुझे लगता है कि मित्र ट्रम्प को ऐसा उस दिन नहीं करना चाहिए था। जिस दिन संघ के भक्तगण नेहरू को पछाड़ कर उत्सव में लीन थे। मित्र ट्रंप भी बड़ा बेरहम है। वह बार-बार ऐसा ही दिन चुनता है। जब मोदी अपनी ‘महानता’ के जश्न में डूबे होते हैं।
आश्चर्य है विभाजनकारी राष्ट्रवाद का झंडा उठाएं संघी गिरोह न सड़क पर उतर रहा है, न ट्रम्प का पुतला फूंक रहा। मोदी तो अमेरिका का नाम सुनते ही उस चौकीदार की तरह मौन हो जाते हैं, जिसे भेड़िया देखते ही काठ मार जाता है। खैर, पाखंड तो पाखंड ही होता है। चाहे राम के नाम पर या राष्ट्र के।
यही कारण है कि इतिहास के हर जटिल मोड़ पर साम्राज्यवाद के समक्ष समर्पण करने वाला संघी राष्ट्रवाद भारत के स्वाभिमान के खिलाफ खड़ा हो जाता है। यही संघ के सौ साल के इतिहास का सबक है। इस बार भी वही हुआ। 72 घंटे बीत चुके हैं। लेकिन कुछ राजनयिक औपचारिकता के अलावा ठोस प्रतिवाद नजर नहीं आया।” मूंदहु आंख कतहुं कुछ नाहीं।”
जबकि ईरान ने भारतीय मालवाहक जलयान के कर्मचारियों की अमेरिकी सैनिकों द्वारा मिसाइली हमले में हत्या की निंदा करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करार दिया । इसी कड़ी में 11 जून को एक भारतीय जलयान के कर्मचारियों ने वीडियो जारी कर ओमान की खाड़ी में फंसे जलयान कर्मचारी की मृत्यु पर भारत सरकार से मदद की गुहार लगाई। तीन दिन पहले हुई मौत के बाद शव के सड़ने का हवाला देते हुए कर्मचारियों ने तत्काल सहायता की मांग की।
लेकिन ओमान के भारतीय दूतावास से लेकर विदेश मंत्रालय तक सब तो मोदी के इतिहास रचने के जश्न में डूबे थे। उन्हें नागरिकों की मृत्यु और सुरक्षा की चिंता कैसे होगी।(मृत्यु तो नश्वर जग का सत्य है। होनी को कौन टाल सकता है।) ऐतिहासिक उपलब्धि के जश्न को कुछ भारतीयों की मृत्यु के कारण फीका क्यों किया जाए।
तीसरा वज्रपात
मध्य प्रदेश में राज्यसभा के कांग्रेस प्रत्याशी के नामांकन को जिस तरह से रद्द किया गया। उसने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के द्वारा भारत के जनतंत्र के बारे में की जा रही टिप्पणी को ही सच साबित किया है ।जब स्वीडन की संस्था वी- डेम ने भारत को चुनावी निरंकुश्ता वाले राज्य के रूप में वर्गीकृत किया है। वहीं इकानॉमिक इंटेलीजेंस यूनिट नामक एक संस्था ने भारत के लोकतंत्र को प्रदूषित लोकतंत्र की श्रेणी में रख दिया है। डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत को 40 वां स्थान दिया गया है।
गजब का परसेप्शन है। जबकि” मदर आफ डेमोक्रेसी” का प्रधान अपने ही एक प्रधानमंत्री के कथित कार्यकाल से ज्यादा समय तक रहने का जश्न मना रहा है। वही विदेशी षड्यंत्र। भक्त लोग अभी जार्ज सोरोस को खोज रहे हैं। क्या यह नहीं माना जा सकता कि भारत की प्रगति से दुखी लोग पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार चला रहे हैं। जैसे-जैसे संघ नीत बीजेपी सरकार भारत के एक-एक राज्यों पर कब्जा करती जा रही है। वैसे-वैसे भारत के जनतंत्र की साख धूल में मिल रही है।
एक हफ्ते के अंदर अमेरिका में एक कार्यक्रम के दौरान नाईजीरियाई मूल की अमेरिकी सीनेटर ने भारत में नरसंहार की संभावना व्यक्त की है। भारत के हिंदुत्ववादियों के पवित्र तीर्थ स्थल अमेरिका से भारत के बारे में अनेक डरावनी रिपोर्ट आ रही हैं। कुछ दिन पहले एक खबर के अनुसार अमेरिकी सरकार ने अमेरिकी नागरिकों को भारत यात्रा का कार्यक्रम तय करने के पहले सावधान रहने का निर्देश जारी किया था।
भारत सबसे असुरक्षित देश में एक
भारतीय उपमहाद्वीप में भारत सबसे असुरक्षित देश की श्रेणी में गिना जा रहा है। इंस्टिट्यूट ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पीस (आईईपी) के अनुसार सुरक्षित देशों के मानक में मोदी का भारत भूटान, नेपाल और बांग्लादेश से भी नीचे की श्रेणी हैं। ग्लोबल पीस इंडेक्स -2026 के अनुसार -शांति के स्तर पर भारत अपने पड़ोसी देशों की तुलना में तेजी से नीचे गिर रहा है।(13 -14 जून 2026 नवभारत टाइम्स ऑनलाइन के अनुसार)। यह सभी ताजा रिपोर्ट है। जब मोदी 12 वर्ष से ज्यादा समय तक सत्ता में टिके रहने का उत्सव मना रहे हैं।
प्रेस स्वतंत्रता
हिंदुत्ववादी उस समय आग बबूला हो गए थे। जब नार्वे में एक महिला पत्रकार ने पीएम मोदी से यह कहते हुए कि आप दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस वाले देश में “क्या पत्रकारों के सवाल लेंगे” संकट में डाल दिया था। मोदी तेजी से मंच छोड़ कर भाग निकले थे। इस समय भारत प्रेस स्वतंत्रता के पैमाने पर दुनिया में 157 नंबर पर था और नार्वे पहले नंबर पर।
ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रेस स्वतंत्रता की रैंकिंग में भारत और नीचे गिर कर 159 वें पायदान पर पहुंच गया है।( काश मोदी का मित्र डोनाल्ड ट्रंप 16 से लेकर 18 जून के दरम्यान मुख्य धारा के भारतीय मीडिया के कार्यक्रमों को देख और समझ पाता।) हम जानते हैं कि उस समय स्वीडिश पत्रकार को जॉर्ज सोरोस का एजेंट पाकिस्तानी और न जाने क्या-क्या कहा गया था।
डूबती अर्थव्यवस्था और बढ़ता महिमा मंडन
भारत की अर्थ व्यवस्था फ्रेजाइल कंडीशन में पहुंच गई है। यानी हम एक अस्थिर अर्थव्यवस्था वाले देश में रह रहे हैं। जब लोगों की आमदनी, सेवा सुरक्षा, रोजगार कुछ भी सुनिश्चित नहीं है। यही कारण है कि फॉरेन इन्वेस्टमेंट भारत से बाहर भाग रहा है। कॉर्पोरेट पूंजी किसी भी देश के भविष्य को उस देश के नागरिकों की तुलना पहले ही भांप लेती है। इसलिए वह सुरक्षित ठिकानों की तरफ पलायन करने लगती है।
प्रो. अरुण कुमार के साथ बातचीत में पत्रकार आशुतोष ने कहा कि 1 जनवरी से मई तक भारत से लगभग पौने दो लाख करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा बाहर जा चुकी है। भारत के कारपोरेट घराने 30 हजार करोड़ डॉलर अमेरिका में निवेश करने जा रहे हैं। अरबपतियों में भारत छोड़ने की हो लगी है। वे भारत छोड़कर गुमनाम देश में ठिकाने तलाश रहे हैं। अरबपतियों, उच्च पदों पर बैठे राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों ने विदेशों में संपत्ति और महल बना लिया है। क्या यह किसी भावी संकट का संकेत तो नहीं है?
लगातार असुरक्षित होते जा रहे देश में कोई कैसे सुरक्षित महसूस कर सकता है। लेकिन जनता के टैक्स के पैसे से मोदीजी के प्रचारक और प्रशंसक तथा भक्तगण उन्हें महामानव और सुपरमैन बनाने की बेशर्म कोशिश रहे हैं। क्या एक गरीब, भूखे, बेरोजगार, लोकतांत्रिक देश की जनता अपने प्रधानमंत्री की शाही फिजूलखर्ची बर्दाश्त करने की स्थिति में है?
बढ़ता व्यापार घाटा
भारत का व्यापार घाटा सर्वोच्च ऊँचाई छू रहा है। हम लगभग साढ़े चार सौ से 5 सौ डॉलर के व्यापार घाटे का बोझ सहन कर रहे हैं। मैन्युफैक्चरिंग डूब रही है और भारत असेंबलिंग कंट्री के रूप में बदल गया है। रिसर्च और डेवलपमेंट पर निवेश इतना कम है कि हम किसी बड़े इन्वेंशन की उम्मीद नहीं कर सकते। उच्च तकनीक वाले सामानों से लेकर गणेश मूर्ति, दीपक और मोमबत्ती तक निर्यात कर रहे हैं।
यही कारण है कि डालर के मुकाबले रुपया डूब रहा है और आरबीआई को रुपए को बचाने के लिए कई तरह की क़वायद करनी पड़ रही है। जिसके दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे। रुपए के कमजोर होने से व्यापार घाटा और बढ़ गया। जिस कारण से हमारी जीडीपी का बड़ा हिस्सा इसी में खप जा रहा है। अकेले “शत्रु” चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा 100 बिलियन डॉलर से ऊपर पहुंच गया है। हिन्दुत्व राष्ट्रवादी सरकार के बारह वर्षों में आधुनिक तकनीक, चिप्स, सेमी कंडक्टर और एआई के क्षेत्र में पिछड़ता हुआ भारत अंततोगत्वा विकसित देशों का कूड़ाघर बनकर रह जाएगा।
बदहाल शिक्षा, बढ़ती बेरोजगारी और रिवर्स पलायन
बेरोजगारी रिकॉर्ड ऊंचाई छू रही है। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार 5.5 % वार्षिक बेरोजगारी दर वस्तुस्थिति का आकलन करने के लिए नाकाफी है। 35 से 40% प्रतिशत से ज्यादा शिक्षित युवा बेरोजगार है।आईटी क्षेत्र में 56 लाख से ज़्यादा लोग काम कर रहे थे, जो भारत का सबसे बड़ा मध्य मवर्ग है। एक खबर के अनुसार इस वर्ष जून तक 92 हजार नौकरियां सिर्फ आईटी सेक्टर में खत्म हो रही हैं। अकेले टीसीएस 12 हजार पेशेवरों की छंटनी कर रहा है।
मोदीराज में ज्ञान, अनुसंधान, तर्क-विज्ञान और शिक्षण संस्थाओं के खिलाफ अभियान चल रहा है। विश्व के शीर्ष ढाई सौ शिक्षण संस्थानों से भारत गायब है। जो कुछ बच्चे-खुचे हैं, उनके खिलाफ हिंदुत्ववादी युद्ध चल रहा है। बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी ने जादवपुर विश्वविद्यालय के खिलाफ मुहिम छेड़ दी।
अर्थशास्त्री प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा के अनुसार 15 से 29 आय वर्ग के 12.1 करोड़ युवा है, जो रोजगार क्षेत्र से बाहर जा चुके हैं। पिछले 10 वर्षों में युवा बेरोजगारी तीन गुनी हुई है। 8 करोड़ लोग मजबूरी में खेती या अन्य रोजगार की तरफ लौटे हैं। हर कैटेगरी की बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। कृषि आश्रितों की संख्या 2019-20 में 20 करोड़ से बढ़कर 28 करोड़ हो गई है। यह दुनिया की सबसे अभूतपूर्व गिरावट है। बेरोजगारों ने रोजगार ढूंढना बंद कर दिया है।
यही नहीं प्रो. मेहरोत्रा ने सरकार की गणना पद्धति पर भी सवाल खड़ा किया है। पीएलएफएस बिना वेतन वाले परिवारों के श्रम को रोजगार में शामिल कर लेता है। जबकि आईएलओ इसे रोजगार नहीं मानता। इस सूरतेहाल में एक चेतावनी छिपी है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कभी कहा था कि “तीन बुलावें तेरह धावै, निज निज बिपदा रोई सुनावै” से आगे बढ़कर अब “तीन बुलावैं, 13 सौ धावै ” वाली स्थिति पैदा हो गई है।
भारत का डेमोग्राफिक डिवीजन 2030 तक खत्म हो जाएगा। हमारे पास सिर्फ 4 साल बचे हैं, जो बुलडोजर, दंगा, एसआईआर, एनकाउंटर विरोधियों के दमन, इस्लाम, पाकिस्तान करने और वोट तथा विधायक सांसद खरीदने में चला जाएगा। यानी भारत के आधुनिक, विकसित, औद्योगिक देश बनने की गाड़ी छूट चुकी है।
हालिया 50 वर्षों के ज्ञात इतिहास में कोई दक्षिणपंथी, मध्ययुगीन, धार्मिक तानाशाही कभी भी अपने देश को आधुनिक विकसित औद्योगिक राष्ट्र नहीं बना सकी है। हम सिर्फ एक और तुर्की, हंगरी या पाकिस्तान ही बन सकते हैं।
भूख, कुपोषण और बढ़ती दरिद्रता-हंगर इंडेक्स में भारत लगातार नीचे भाग रहा है। हम सोमालिया, घाना और माले की श्रेणी में पहुंच गए हैं। दुनिया की सबसे ज़्यादा भूखी ‘प्रजा’ संघ के हिंदू राष्ट्र के अधीन रह रही हैं। 45% महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं और 53% बच्चे कुपोषण के। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार 85 करोड लोगों 5 किलो राशन मुफ्त दिया जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में एक लाख से ज्यादा विद्यालय बंद कर दिए गए हैं। बच्चों के विद्यालयों में ड्रॉप आउट की गिरावट रुक नहीं रही। किसान आत्महत्या बहुत दस्तूर जारी है। छात्रों युवाओं की आत्महत्या में शहरी और ग्रामीण मजदूर सपरिवार शामिल हो गए हैं। कर्जदारी बढ़ी है और गोल्ड लोन लेने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है जो स्थिति की भयावहता को दिखाती है।
देशी-विदेशी कर्ज और कारपोरेट राईट आफ
पिछले 12 वर्षों में भारत पर देसी विदेशी कर्ज 220 लाख करोड़ के करीब पहुंच गया है। जो कुल जीडीपी का 80 से 81% है। इसी अवधि में साढ़े 9 लाख करोड़ के बड़े उद्योगपतियों के कर्ज माफ किए गए हैं। जो कुल बट्टे खाते में डाले गए कर्ज का 56% है।
इस तरह चौतरफा संकट में फंसा हुआ भारत मोदी सरकार की इजरायल-अमेरिका केंद्रित विदेश नीति के चलते ऐसी जगह पहुंच गया है, जहां से हम वैश्विक अलगाव झेल रहे है। अब ब्रिक्स, एससीओ जैसे मंचों में कोई भी विकासशील देश हम पर विश्वास नहीं करता। ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत जिस तरह से भारत अकेला पड़ गया था, वह संघ-नीत मोदी सरकार की विभाजनकारी और समर्पणवादी नीतियों का स्वाभाविक परिणाम था।
रही-सही कसर संघ के इजरायली प्रेम ने पूरी कर दी है। नेहरू से आगे निकलने की होड़ में जिस तरह से संघ परिवार और मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार के पाखंडी उत्सव में शामिल है वह मध्यकाल के पतनशील राजाओं-महाराजाओं के भवितव्य का संकेत दे रहा है। बार-बार अतीत के गौरव के नाम पर राजाओं-महाराजाओं का महिमा मंडल करने वाले संघ परिवार का भविष्य उससे बेहतर क्या हो सकता है।
लेकिन’ हम भारत के लोग ‘ फासीवादी कॉर्पोरेट हिंदुत्व गठजोड़ के हाथ में भारत के 150 करोड़ जन-गण के भविष्य का फैसला लिखने की इजाजत नहीं दे सकते। बदहाल शिक्षा व्यवस्था और अंधकारमय भविष्य के खिलाफ लाखों युवाओं का लहरों की तरह उठ रहा सैलाब इसी दृढ़ संकल्प की घोषणा कर रहा है।
(जयप्रकाश नारायण लेखक, विचारक और एक्टिविस्ट हैं।)