रांची। विभिन्न आदिवासी संगठनों ने कहा है कि परिसीमन के नाम पर अनुसूचित जनजाति (एसटी) आरक्षित सीटों में संभावित कटौती की साजिश का पुरजोर विरोध किया जाएगा।
शुक्रवार, 3जुलाई को प्रेस क्लब में आदिवासी संगठनों और आदिवासी सामाजिक – राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने एक संवाददाता सम्मेलन में यह घोषणा की। संवाददाता सम्मेलन में मुख्य प्रवक्ता लक्ष्मीनारायण मुंडा, केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की, रमा खलखो, गलैडशन डूंगडूग तथा शशी पन्ना मौजूद थे।
आदिवासी नेताओं ने कहा कि हम आदिवासी सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता आदिवासी समुदाय की ओर से स्पष्ट कहना चाहते हैं कि 75 वर्षों से पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में अनुच्छेद 244 के तहत आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की जानबूझकर उपेक्षा की गई है और छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट तथा संथाल परगना टेनेंसी एक्ट जैसे कानूनों के उल्लंघन और विकास के नाम पर लाखों आदिवासियों के विस्थापन का हिसाब-किताब पूरे होने तक परिसीमन की कोई प्रक्रिया आदिवासी हितों के विरुद्ध नही होनी चाहिए।
प्रेस वार्ता में कहा गया कि हमारा कहना है कि पांचवीं अनुसूची स्पष्ट रुप से राज्यपाल को विशेष शक्तियां प्रदान करती है, जिसमें अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण पर रोक,गैर-आदिवासियों के प्रवेश को नियंत्रित करना और आदिवासी हितों की रक्षा शामिल है। फिर भी दशकों से इन प्रावधानों को कागजी बाघ बना दिया गया है। झारखंड में उक्त अधिनियमों का खुलेआम उल्लंघन हुआ।
प्रेस वार्ता में बताया गया कि फर्जी दस्तावेज, जालसाजी, अवैध कब्जा और राजस्व-पुलिस प्रशासन की मिलीभगत से लाखों एकड़ आदिवासी जमीन हड़पी गई। 1951 से 1960 के बीच विकास परियोजनाओं से करीब 85 लाख आदिवासी विस्थापित हुए, जो कुल विस्थापितों का 40-60 % है, जबकि आदिवासी आबादी देश की कुल आबादी का मात्र 8.6% है। पेसा, 1996 और एफआरए, 2006 जैसे कानून भी कागजों तक सीमित रहे। ग्राम सभाओं की सहमति को लगातार नजरअंदाज किया गया।
प्रेस वार्ता में कहा गया कि हम स्पष्ट कहना चाहते हैं कि जनसंख्या परिवर्तन के कारण एसटी आरक्षित सीटों के अनुपात में कमी की आशंका वाजिब है, लेकिन इसके पहले 75 वर्षों के संवैधानिक अपराधों की जांच और भरपाई जरुरी है। संवैधानिक प्रावधानों, जमीन कानूनों का उल्लंघन कर बसी आबादी के कारण आदिवासियों की संख्या घटी है। भूमि लूट, जबरन विस्थापन और जनसांख्यिकीय बदलाव के अपराधियों को जवाबदेह ठहराए बिना परिसीमन आदिवासियों के साथ दूसरा बड़ा विश्वासघात होगा।
प्रेस कांफ्रेंस में निम्नलिखित मांगें की गईं:
1. परिसीमन में आदिवासी आरक्षित सीटें किसी भी हालत में न घटाई जाएं। बल्कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में सीटें बढ़ाई जाएं और आदिवासी सीटों को फ्रीज किया जाए।
2. सीएनटी/एसपीटी एक्ट का सख्ती से पालन हो।
3. पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में गैर-आदिवासी बसावट पर पूर्ण रोक लगाई जाए।
4. राज्यपाल अपने संवैधानिक शक्तियों का पूर्ण उपयोग करें।
5. 75 वर्षों के विस्थापन, भूमि लूट और सांस्कृतिक विनाश की जांच के लिए संसदीय समिति व न्यायिक आयोग गठित किया जाए। इसके लिए उचित मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार की गारंटी दी जाए।
प्रेस वार्ता ने आह्वान किया गया कि आदिवासी संगठनों/ आदिवासी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा आगामी 30 अगस्त 2026 को दोपहर 12 बजे मोरहाबादी मैदान, रांची में आयोजित आदिवासी एकता का महाजुटान महारैली रैली की जायेगी।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)