शुक्रवार को दिल्ली में “जॉली एलएलबी 4” और रविवार को आगरा में “सिंघम 3” : फ्लॉप सिस्टम की दो रियल फिल्में

पिछले शुक्रवार और रविवार को देश में दो अत्यंत गंभीर घटनाएँ हुईं, जिन्हें गुजराती मीडिया में सबसे कम कवरेज मिला। 2014 के बाद देश किस दिशा में आगे बढ़ चुका है, यह देखकर तो शासकों की आँखें खुल जानी चाहिए थीं, लेकिन इसके विपरीत गुजराती गोदी मीडिया ने मानो कुछ हुआ ही नहीं, ऐसा रवैया अपनाया।

पहली घटना शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में घटित हुई। प्रबल प्रताप ने डबल बेंच के दो न्यायाधीशों को “ज्यूडिशियल सर्वेंट” अर्थात न्यायिक नौकर कहा, न्यायाधीशों के सामने कागज़ फेंके और भारत के मुख्य न्यायाधीश के लिए गाली का प्रयोग किया। मीडिया ने इस घटना की रिपोर्टिंग करते हुए प्रबल प्रताप की पूरी पृष्ठभूमि खंगाल डाली। सामने आया कि वह अपनी नौकरी से निकाले जाने के कारण संबंधित कंपनी से बदला लेना चाहता था और बिना पर्याप्त साक्ष्यों के केवल आरोपों के आधार पर कंपनी के विरुद्ध पुलिस में मामला दर्ज करवाना चाहता था।

पुलिस ने उसे हिरासत में लिया, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से सुप्रीम कोर्ट ने उसे रिहा करने का निर्देश दे दिया। सामान्यतः यदि ऐसी घटना किसी बेंच या एकल न्यायाधीश के समक्ष घटित होती है, तो ऐसे मामलों में “नॉट बिफोर मी” का सिद्धांत अपनाया जाता है। अर्थात, घटना के संबंध में अपराध दर्ज किया जाता है और मामला किसी अन्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।

प्रबल प्रताप ने तीन अपराध किए। पहला—अनुचित भाषा का प्रयोग। दूसरा—अदालत के समक्ष कागज़ फेंककर न्यायालय की अवमानना करना। और तीसरा—भारत के मुख्य न्यायाधीश का सार्वजनिक रूप से अपमान करना।

आश्चर्यजनक रूप से अदालत ने उसे रिहा करने का निर्देश दिया। यहाँ मुख्य न्यायाधीश स्वयं तीसरे पक्ष के पीड़ित (थर्ड पार्टी विक्टिम) भी थे और साथ ही न्यायपालिका के सर्वोच्च प्रमुख भी। फिर अदालत को प्रबल प्रताप को रिहा करने की आवश्यकता या मजबूरी क्यों आन पड़ी? यदि इतना गंभीर अपराध करने के बाद भी अदालत आरोपी को छोड़ देती है, तो क्या भविष्य में कोई अधिवक्ता भी सुप्रीम कोर्ट में मर्यादा से बाहर आचरण करने के लिए प्रेरित नहीं होगा?

या फिर प्रबल प्रताप को मुकदमे के दौरान न्यायपालिका की कमियों (लूपहोल्स) को और अधिक उजागर करने का अवसर मिल सकता था? अथवा यदि यह घटना अधिक समय तक चर्चा में रहती, तो मीडिया में निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों की कार्यप्रणाली पर भी व्यापक समीक्षा और आलोचना होने की संभावना थी, जिसे देखते हुए सरकार की ओर से कोई संकेत दिया गया?

आख़िर इतनी गंभीर घटना को स्वयं सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से ही इतनी शीघ्रता से क्यों समाप्त कर दिया गया? “जॉली एलएलबी” का चौथा भाग मानो वास्तविक अदालत में घटित हो चुका था। इसलिए इस वास्तविक फिल्म का शीघ्र “द एंड” करने के पीछे कहीं सरकार का कोई अप्रत्यक्ष संकेत तो नहीं था? इसकी जाँच होना अभी बाकी है, क्योंकि अंततः व्यवस्था की विफलता सरकार की ही विफलता मानी जाती है।

दूसरी घटना रविवार की सुबह आगरा रेलवे स्टेशन पर हुई। यहाँ आगरा रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स (आरपीएफ) की पुलिस मानो “सिंघम 3” बन गई। और वह भी किसके सामने? स्वयं डिप्टी स्टेशन सुपरिंटेंडेंट नरेंद्र सिंह चाहर के सामने।

घटना यह थी कि सुबह 10:51 बजे आई ट्रेन संख्या 20808 अमृतसर–विशाखापट्टनम हीराकुड एक्सप्रेस प्लेटफ़ॉर्म नंबर 1 से रवाना हो रही थी। उसी समय नरेंद्र सिंह चाहर ने देखा कि एक महिला, रंजीत राव, चलती ट्रेन में चढ़ने का प्रयास कर रही थीं। ट्रेन लंबी दूरी की होने के कारण महिला की सहायता करने के उद्देश्य से नरेंद्र सिंह ने वॉकी-टॉकी के माध्यम से ट्रेन के गार्ड को ट्रेन रोकने का निर्देश दिया। महिला का पति पहले से ही ट्रेन में सवार था।

ट्रेन रुकने के बाद जब महिला ट्रेन में चढ़ गईं, तब आरपीएफ के जवानों ने यह दृश्य देखा। उन्हें लगा कि चेन पुलिंग का मामला हुआ है, इसलिए उन्होंने महिला और उनके पति को हिरासत में लेने का प्रयास किया। इस दौरान नरेंद्र सिंह चाहर बीच में आए और स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की, लेकिन किसी गलतफ़हमी के कारण मामला बिगड़ गया। इसके बाद जो हुआ, वह पूरी दुनिया ने देखा। आपने भी वह वीडियो देखा होगा। आरपीएफ के जवान और रेलवे का परिचालन तंत्र आमने-सामने आ गए।

पुलिस का एक दल अत्यंत क्रूर तरीके से एक वरिष्ठ रेलवे अधिकारी नरेंद्र सिंह को घसीटते हुए पुलिस चौकी ले गया। रेल संचालन प्रभावित हो गया। पूरी व्यवस्था हिल गई। तत्काल चार पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया। उच्चस्तरीय जाँच समिति गठित की गई। रेलवे कर्मचारी संगठनों ने धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिए। 

आगरा के भाजपा सांसद राजकुमार रेलवे स्टेशन पहुँचे। वीडियो में वे पुलिसकर्मियों को फटकार लगाते हुए दिखाई देते हैं। गुस्से में राजकुमार के मुँह से एक सच्ची बात निकल गई—

“आप लोग बदतमीज़ी करेंगे तो आपके साथ-साथ सरकार की भी बदनामी होगी, कुछ तो ख़याल करो।”

असल मुद्दा यही है। जो करना है कीजिए, लेकिन ऐसा कुछ मत कीजिए जिससे सरकार की बदनामी हो।

आज पुलिस में इतनी हिम्मत कैसे आ गई कि वह भीड़ के बीच एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ इस प्रकार का व्यवहार करने लगे? इसका कारण यह है कि पिछले बारह वर्षों से भाजपा सरकारों ने पुलिस को जो चाहे करने की खुली छूट दे रखी है। आज भाजपा शासित राज्यों में पुलिस राज स्थापित हो चुका है। न्यायालय की दृष्टि में अवैध माने जाने वाले आरोपियों के जुलूसों को स्वयं गुजरात के गृह मंत्री प्रोत्साहित कर रहे हैं।

“कानून में रहोगे तो फ़ायदे में रहोगे” जैसी भाषा क्या किसी जिम्मेदार गृह मंत्री की हो सकती है? धमकी की भाषा और दृढ़ संकल्प की भाषा एक जैसी नहीं हो सकती।

क्या गृह मंत्री में यह कहने का साहस है कि—

“गुजरात पुलिस के लिए कानून के उल्लंघन के दायरे में आने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध, बिना किसी धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक भेदभाव के समान कार्रवाई की जाएगी, चाहे वह सत्तारूढ़ दल से जुड़ा कोई पदाधिकारी ही क्यों न हो।”

क्या मुख्यमंत्री को भी ऐसी बात कहने की स्वतंत्रता है?

“जॉली एलएलबी” पर अब तक तीन फ़िल्में बन चुकी हैं, जिन्होंने न्यायिक व्यवस्था की अनेक कमियों को उजागर किया है। तीनों फ़िल्में अत्यंत सफल रहीं। ऐसा लगता है कि चौथी फ़िल्म के लिए कथानक अब वास्तविक घटना से मिल गया है। उधर आगरा में घटी घटना दर्शाती है कि “पुलिसवाला गुंडा” जैसी फ़िल्मों की तरह यदि पुलिस को गुंडागर्दी करने की खुली छूट दी जाएगी, तो एक दिन वह अपने ही वरिष्ठ अधिकारी पर हाथ उठा देगी। जिस प्रकार खून का स्वाद चख लेने के बाद बाघ अपने प्रशिक्षक को भी नहीं छोड़ता, उसी प्रकार घर में छोटे से बच्चे के रूप में पाले गए डोबरमैन कुत्तों द्वारा बड़े होकर घर की महिलाओं या बच्चों पर हमला करने की घटनाएँ भी सामने आई हैं।

भाजपा सरकारों ने व्यवस्था में जो ज़हर घोला है, वह एक दिन मंत्रालय और सरकार तक भी पहुँचेगा। सत्ता की भूख में जनता के एक बड़े वर्ग को तो मानो ज़ॉम्बी बना दिया गया है, लेकिन यदि उसी ज़ॉम्बी भीड़ को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी निभाने वाला पुलिस तंत्र ही ज़ॉम्बी बन जाए, तो क्या होगा—आगरा की घटना ने इसकी एक झलक दिखा दी है।

अभी भी समय है। देश की जनता को जागने की आवश्यकता है। यदि अब भी आप नहीं बोलेंगे और चुप रहेंगे, तो यह ज़ॉम्बी भीड़ बहुत जल्द हमारे घर-आँगन में खड़ी दिखाई देगी। और उस समय यदि आपकी रक्षा के लिए आने वाली पुलिस स्वयं ही ज़ॉम्बी बन चुकी होगी, तो आप क्या करेंगे?

(अहमदाबाद से वरिष्ठ पत्रकार सलीम हाफ़ेज़ी की टिप्पणी)

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