स्कूलों में तीसरी भाषा लागू करने के समय को सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि 9वीं कक्षा में जाकर किसी नई या तीसरी भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल करना छात्रों पर बेवजह का तनाव बढ़ाता है, क्योंकि इस समय छात्र पहले से ही बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के दबाव में होते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि तीसरी भाषा सिखानी ही है, तो इसकी शुरुआत 6ठी कक्षा (मिडिल स्कूल) से की जानी चाहिए।
जस्टिस बी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ के सामने जब इस मामले की सुनवाई चल रही थी, तब जज ने अपने स्कूली दिनों (1976 के समय) का अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि 9वीं कक्षा बहुत तनावपूर्ण होती है। आप 9वीं में नई भाषा क्यों पेश कर रहे हैं? इसे छठी कक्षा में शुरू करें। 8वीं कक्षा के अंत से ही बच्चों पर बोर्ड परीक्षा का दबाव शुरू हो जाता है।
हमारे समय में भी 10वीं की तैयारी 8वीं-9वीं से शुरू हो जाती थी, तो आज के छात्रों की स्थिति की कल्पना कीजिए। केंद्र सरकार, सीबीएसई, आईसीएसई और राज्य बोर्डों को 9वीं कक्षा में तीसरी भाषा लागू करने से बचना चाहिए। भाषा जितनी जल्दी सीखी जाए, उतना बेहतर होता है।”
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार की उस अपील पर सुनवाई के दौरान आई, जो मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के खिलाफ दायर की गई है। मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को राज्य के हर जिले में केंद्र सरकार के ‘जवाहर नवोदय विद्यालय’ स्थापित करने की अनुमति देने का निर्देश दिया था।
तमिलनाडु ने हमेशा जेएनवी खोलने का विरोध किया है क्योंकि उसे इन स्कूलों में अपनाई जाने वाली तीन-भाषा नीति को लेकर चिंता है।
हालांकि, इस मामले में सीबीएसई की भाषा नीति की वैधता सीधे तौर पर विवाद का विषय नहीं थी फिर भी जस्टिस नागरत्ना ने तीसरी भाषा को लागू करने के समय के बारे में कई टिप्पणियां कीं।
सुनवाई के दौरान जब तमिलनाडु के वकील ने त्रि-भाषा नीति पर आपत्ति जताई, तो जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि इस नीति में कहीं भी हिंदी को अनिवार्य तीसरी भाषा के रूप में थोपने की बात नहीं है। उन्होंने कहा, “इसमें राज्य की भाषा पढ़ानी है, अंग्रेजी पढ़ानी है और कोई भी तीसरी भाषा चुननी है। यह कहीं नहीं कहता कि वह भाषा हिंदी ही हो।”
केंद्र सरकार के वकील ने भी कोर्ट में स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। इस पर कोर्ट ने तमिलनाडु से पूछा, “यदि आप हिंदी नहीं चाहते, लेकिन अगर वह संस्कृत है, तो क्या समस्या है?”
इस पर राज्य के वकील ने कहा कि समस्या यह है कि यह तीसरी भाषा 9वीं कक्षा से अनिवार्य हो जाती है, जिसके बाद जस्टिस नागरत्ना ने 9वीं में भाषा थोपने को गलत बताया।
कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई योजना केंद्र सरकार की है, उसे खारिज करने का रवैया नहीं अपनाना चाहिए। कोर्ट ने कहा, “आपकी अपनी शिक्षा प्रणाली हो सकती है, लेकिन केंद्र सरकार के स्कूलों को (राज्य में आने से) न रोकें।”
सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करने को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच बातचीत अभी चल रही है। कोर्ट ने कहा कि जब तक यह बातचीत किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंचती, तब तक गुण-दोष पर फैसला नहीं सुनाया जाएगा।
चूंकि तमिलनाडु में हाल ही में विधानसभा चुनाव हुए हैं और सत्ता में बदलाव हुआ है (डीएमके की जगह टीवीके सत्ता में आई है), जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि अब यह देखना होगा कि नई सरकार इस मुद्दे पर क्या नीतिगत रुख अपनाती है। राज्य सरकार ने मामले में निर्देश लेने के लिए 6 सप्ताह का समय मांगा है।
मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला दिया था कि नवोदय विद्यालयों को रोकने से बच्चों के शिक्षा के अधिकार का हनन होता है। दिसंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस आदेश पर रोक लगा दी थी।
केंद्र सरकार के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा देने के लिए देश के 666 जिलों में 689 जेएनवी स्वीकृत हैं, लेकिन तमिलनाडु ने इस योजना को स्वीकार नहीं किया है।
तमिलनाडु सरकार का कहना है कि 1968 के विधानसभा प्रस्ताव और तमिलनाडु तमिल शिक्षण अधिनियम, 2006 के तहत राज्य में सिर्फ तमिल और अंग्रेजी ही अनिवार्य हैं। तीसरी भाषा केवल वैकल्पिक हो सकती है। राज्य ने यह भी बताया कि वह अपने खर्च पर हर जिले में ‘मॉडल आवासीय स्कूल’ चला रहा है, इसलिए जेएनवी की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही राज्य ने केंद्र द्वारा ‘समग्र शिक्षा योजना’ के तहत रोके गए ₹3,548 करोड़ के फंड का मुद्दा भी उठाया।
सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले पर अगली सुनवाई 11 अगस्त 2026 को करेगा। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के समक्ष लंबित अन्य याचिकाओं से अलग है, जहां सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति को चुनौती दी गई है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)