सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को साफ किया कि उसके पहले के फैसले में सभी बुलडोजर एक्शन पर रोक नहीं लगाई गई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि तोड़-फोड़ की कार्रवाई का इस्तेमाल चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट में मनमाने ढंग से बुलडोजर एक्शन के आरोपों वाली अवमानना याचिका दायर हुई थी। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर बुलडोजर एक्शन की वैधता की जांच उसके अपने तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए। हाईकोर्ट ही इसके लिए सही जगह हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि अवैध निर्माण और सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, मगर किसी आरोपी या उसके परिवार को चुन-चुनकर निशाना नहीं बनाया जा सकता।
यह देखते हुए कि “जब नगर निगम अधिकारियों और अवैध कब्ज़ा करने वालों के बीच मिलीभगत कानून के शासन को चुनौती देती है”, तो बुलडोज़र चलाने ही पड़ेंगे, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उन याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया जिनमें “बुलडोज़र जस्टिस” के खिलाफ शीर्ष अदालत के 2024 के फैसले की व्यापक अवमानना का आरोप लगाया गया था। कोर्ट ने पीड़ित पक्षों से अपने-अपने संबंधित हाई कोर्ट में जाने को कहा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना वाली तीन जजों की बेंच ने उन याचिकाकर्ताओं की बात सुनी जो विभिन्न राज्य अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही चाहते थे। इन अधिकारियों पर शीर्ष अदालत के 13 नवंबर, 2024 के फैसले का उल्लंघन करने का आरोप था। उस फैसले में कहा गया था कि सिर्फ़ इसलिए लोगों के घर बुलडोज़र से गिराना क्योंकि वे कुछ मामलों में आरोपी हैं, कानून के शासन के खिलाफ है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को बताया कि उनकी याचिकाओं में तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल शामिल हैं, जिनका निपटारा किसी को करना होगा। इस बात से सहमत होते हुए, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि याचिकाएं देश भर से आई हैं और हर मामले में तथ्यों की जांच की ज़रूरत होगी।
सीजेआई ने कहा, “और तथ्य हर मामले में अलग-अलग हो सकते हैं। कोर्ट को रिकॉर्ड मंगाकर उसकी जांच करनी पड़ सकती है।” उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने पहले ही मोटे तौर पर सिद्धांत तय कर दिए हैं, और अब हाई कोर्ट और उनके नीचे की अदालतों को यह सुनिश्चित करना है कि उनका पालन हो।
जब सीनियर वकील संजय हेगड़े, सी.यू. सिंह और हुज़ेफ़ा अहमदी ने बेंच से आग्रह किया कि वे मामले को हाई कोर्ट पर छोड़ने के बजाय 13 नवंबर के फ़ैसले के आधार पर तय करें, तो जस्टिस बागची ने कहा, “फ़ैसले की पृष्ठभूमि ने असल में इस कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर दिया, क्योंकि इसमें म्युनिसिपल कानूनों का नहीं, बल्कि ‘निर्दोष होने की धारणा’ की नींव का उल्लंघन हुआ था, जहाँ अपराध के आरोपी कुछ खास लोगों की संपत्तियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए उन्हें चुन-चुनकर निशाना बनाया गया…”
जस्टिस बागची ने ज़ोर देकर कहा, “हाँ, बुलडोज़र का इस्तेमाल तब ज़रूरी हो जाता है जब म्युनिसिपल अधिकारियों और अवैध कब्ज़ेदारों के बीच मिलीभगत से कानून के शासन को रोका जाता है। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि कानून लागू करने के नाम पर लोगों में डर न फैलाया जाए या किसी के साथ खास बर्ताव न हो। यह असल में उन बुनियादी सिद्धांतों में से एक के ख़िलाफ़ है कि क्या कोई व्यक्ति नकारात्मक समानता का दावा कर सकता है…”
जस्टिस बागची ने कहा, “किसी भी फ़ैसले को तथ्यों की स्थिति से अलग हटकर नहीं देखा जा सकता।”
हेगड़े ने कहा कि उनके मुवक्किल गणेश गुप्ता का फलों के जूस का स्टॉल था, जिस पर बुलडोज़र चलाया गया था। जस्टिस बागची ने कहा, “इसका इस्तेमाल किया जा सकता है… सवाल यह है कि क्या इस व्यक्ति के पास अधिकार था या कानून की प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं।”
हेगड़े ने कहा कि उनके मामले में, एक टीवी एंकर बुलडोज़र पर बैठकर वहां आया था। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इन सभी तथ्यों पर किसी न किसी को गौर करना होगा।
अहमदी ने कहा कि उनके मामले में, जिसमें एक मस्जिद को गिराया गया था, अदालत के आदेश का गंभीर उल्लंघन हुआ था।
“हाई कोर्ट ने मुझे सुरक्षा दी थी और कहा था कि जवाब वगैरह दाखिल करने के लिए समय दिया जाएगा और तब तक कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया जाएगा। मुझे अंतिम आदेश मिलने से पहले ही, वे आए और मस्जिद गिरा दी, और फिर मुझे इस अदालत में अवमानना की कार्यवाही के लिए जाना पड़ा और आप लोगों ने मुझे यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।”
उन्होंने कहा, “जहां तक मेरी बात है, 1999 से 2024 तक अधिकारियों की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। यह कार्रवाई केवल एक स्थानीय राजनेता द्वारा जारी किए गए पत्र के कारण शुरू हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि आप इस राज्य में एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद कैसे बना सकते हैं… इसलिए, यह उन सामान्य मामलों में से नहीं है, यह चुनिंदा कार्रवाई का मामला है… मेरे मामले में, सार्वजनिक संपत्ति पर अतिक्रमण का भी कोई आरोप नहीं था…”
सीनियर एडवोकेट सिंह ने दलील दी कि अगर सुप्रीम कोर्ट अपने ही फ़ैसले के पक्ष में खड़ा नहीं होगा, तो कौन होगा?
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “किसने कहा कि हम ऐसा नहीं करेंगे? हम अपने फ़ैसलों के पक्ष में खड़े रहेंगे। हम हाई कोर्ट्स को निर्देश देंगे कि वे हमारे फ़ैसले का पालन सुनिश्चित करें।”
जस्टिस बागची ने कहा कि बेंच यह कहना चाहती है कि फ़ैसले को “किसी कानून की तरह नहीं पढ़ा जा सकता। फ़ैसले को संदर्भ के साथ पढ़ा जाना चाहिए…” खासकर तब, जब उसमें यह शर्त जुड़ी हो कि अगर सड़क, गली, फ़ुटपाथ, रेलवे लाइन के पास या किसी नदी या जलाशय जैसी सार्वजनिक जगह पर कोई अनधिकृत ढांचा हो, तो ये निर्देश लागू नहीं होंगे।
याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अवैध कब्जों के मामलों में बुलडोजर का इस्तेमाल सही हो सकता है, लेकिन उन्होंने भेदभावपूर्ण तरीके से इसके इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी।
उन्होंने कहा, ‘हां, जब अधिकारियों और अवैध कब्जा करने वालों की मिलीभगत से कानून के शासन का गला घोंटा जा रहा हो, तब बुलडोजर का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है। लेकिन कानून लागू करने के नाम पर लोगों की छवि खराब नहीं की जानी चाहिए। यह बुनियादी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है… सवाल यह है कि क्या उस व्यक्ति के पास मंजूरी थी और क्या कानून की प्रक्रिया का पालन किया गया था?
सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुलडोजर एक्शन’ की आलोचना करते हुए 13 नवंबर 2024 को संपत्तियों को गिराने के मामले में देशभर के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कार्यपालिका जज की भूमिका नहीं निभा सकती, किसी आरोपी को दोषी घोषित नहीं कर सकती और उसका घर नहीं गिरा सकती।
पीठ ने कई निर्देश जारी करते हुए कहा था, ‘किसी भी संपत्ति को गिराने की कार्रवाई कारण बताओ नोटिस जारी किए बिना नहीं की जानी चाहिए।’ यह नोटिस संबंधित स्थानीय नगर निकाय कानूनों में निर्धारित अवधि के अनुसार या नोटिस की तामील की तारीख से 15 दिन के भीतर इनमें से जो अवधि बाद में समाप्त हो, उस समय तक प्रभावी होना चाहिए।