लोकतंत्र में कौन जीतता है—जिसकी माँग न्यायपूर्ण है, या जिसके पास संघर्ष को लंबा खींचने की क्षमता है?

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने और अपनी माँग सरकार के समक्ष रखने का अधिकार देता है। सिद्धांततः छात्र, किसान, मजदूर, कर्मचारी, महिला, युवा और समाज का प्रत्येक वर्ग इस अधिकार का समान रूप से अधिकारी है।

किंतु पिछले कुछ वर्षों के प्रमुख आंदोलनों का तुलनात्मक अध्ययन एक असहज प्रश्न खड़ा करता है—क्या लोकतंत्र में हर आवाज़ समान शक्ति रखती है, या फिर किसी आंदोलन की सफलता उसके पीछे उपलब्ध आर्थिक संसाधनों, सामाजिक पूंजी, संगठन, मीडिया की पहुँच, राजनीतिक समर्थन और लंबे समय तक संघर्ष करने की क्षमता पर भी निर्भर करती है?

नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के आरोपों ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों को आंदोलित कर दिया। यह केवल एक परीक्षा का प्रश्न नहीं था, बल्कि वर्षों की मेहनत, सपनों और भविष्य का प्रश्न था। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीमित सीटें और निजी मेडिकल शिक्षा की अत्यधिक लागत इस परीक्षा को करोड़ों परिवारों के लिए जीवन बदल देने वाली परीक्षा बना देती है। इसलिए जब परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठे, तो छात्रों का आक्रोश स्वाभाविक था।

इस आंदोलन को समाज के अनेक वर्गों, शिक्षकों, अभिभावकों, मीडिया, विपक्षी दलों और सार्वजनिक जीवन की अनेक हस्तियों का समर्थन मिला। परिणामस्वरूप यह एक राष्ट्रीय बहस बन गया।

इस आंदोलन ने यह भी सिद्ध किया कि जब किसी वर्ग के पास अपनी बात को देशव्यापी विमर्श में बदल देने की क्षमता होती है, तब शासन पर नैतिक और राजनीतिक दबाव तेजी से बढ़ता है। लोकतंत्र में यह एक सकारात्मक संकेत है कि युवाओं ने अपने भविष्य के प्रश्न पर आवाज़ उठाई और पूरे देश का ध्यान उस ओर आकर्षित किया। ऐसे सभी छात्रों को बधाई दी जानी चाहिए जिन्होंने शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता की माँग उठाई।

परंतु यही वह बिंदु है जहाँ एक दूसरा भारत दिखाई देता है—वह भारत जो मेडिकल कॉलेजों की तैयारी नहीं कर रहा, बल्कि रोज़ सुबह काम की तलाश में निकलता है। वह भारत जो असंगठित क्षेत्र का मजदूर है, रिक्शा चलाता है, निर्माण स्थल पर काम करता है, फैक्टरी में ठेका श्रमिक है या दिहाड़ी मजदूरी पर अपने परिवार का जीवन चलाता है। उसके लिए आंदोलन करना केवल साहस का प्रश्न नहीं, बल्कि जीवित रहने का प्रश्न है।

यदि वह एक दिन काम पर नहीं जाएगा तो उसी दिन उसके घर का चूल्हा ठंडा पड़ सकता है। इसलिए उसके सामने लोकतांत्रिक अधिकार और आर्थिक विवशता आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।

यही कारण है कि भारत के अधिकांश मजदूर आंदोलन बहुत कठिन परिस्थितियों में लड़े जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन तथा भारत के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के आँकड़े लगातार यह संकेत देते हैं कि भारत की बड़ी श्रमिक आबादी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जहाँ आय अनिश्चित, सामाजिक सुरक्षा सीमित और नौकरी की स्थिरता कमजोर है। ऐसे व्यक्ति के लिए महीनों तक आंदोलन चलाना लगभग असंभव हो जाता है। संसाधनों का यह असंतुलन लोकतांत्रिक भागीदारी को भी प्रभावित करता है।

सामाजिक आंदोलन के अध्ययन में “रिसोर्स मोबिलाइज़ेशन थ्योरी” इसी तथ्य पर बल देती है कि किसी आंदोलन की सफलता केवल उसकी नैतिक शक्ति से निर्धारित नहीं होती। आर्थिक संसाधन, संगठनात्मक क्षमता, नेतृत्व, मीडिया तक पहुँच, कानूनी सहायता, जनसंपर्क और लंबी अवधि तक संघर्ष करने की क्षमता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसलिए कई बार न्यायपूर्ण माँग रखने वाला वर्ग भी उतना प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाता, जितना संगठित और संसाधन-संपन्न वर्ग कर लेता है।

किसान आंदोलन का अनुभव भी इसी संदर्भ में अध्ययन योग्य है। इस आंदोलन में विभिन्न किसान संगठनों की मजबूत संरचना, सामुदायिक सहयोग, भोजन, चिकित्सा, परिवहन और आर्थिक सहयोग ने उसे लंबे समय तक बनाए रखने में सहायता की। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों में संगठन और संसाधनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

इसे केवल किसी एक आर्थिक वर्ग का आंदोलन कहना उचित नहीं होगा, किंतु यह अवश्य कहा जा सकता है कि संगठित सामाजिक शक्ति किसी भी आंदोलन की प्रभावशीलता को बढ़ाती है।

इसके विपरीत जब न्यूनतम मजदूरी, श्रम अधिकार, ठेका प्रथा, सामाजिक सुरक्षा या कार्यस्थल की गरिमा जैसे मुद्दों पर मजदूर आंदोलन होते हैं, तो वे अक्सर उतनी राष्ट्रीय संवेदना प्राप्त नहीं कर पाते। अनेक स्थानों पर श्रमिक संगठनों ने यह आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण आंदोलनों पर कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की गई, जबकि प्रशासन का पक्ष यह रहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।

ऐसे विवादों का अंतिम मूल्यांकन न्यायालयों और निष्पक्ष जांच के आधार पर ही होना चाहिए। फिर भी लोकतंत्र में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि शांतिपूर्ण विरोध को अपराध की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा।

यदि किसी भी छात्र, किसान या मजदूर आंदोलन के दौरान केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन, धरना, सभा या संवैधानिक असहमति व्यक्त करने के कारण लोगों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए हैं, तो ऐसे सभी मामलों की स्वतंत्र और निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। जिन मामलों में हिंसा या अन्य गंभीर अपराधों के विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ ऐसे मुकदमों को बिना शर्त वापस लेने पर सरकारों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

लोकतंत्र में भय नहीं, विश्वास होना चाहिए; दमन नहीं, संवाद होना चाहिए; और असहमति को राष्ट्र-विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का स्वाभाविक स्वर माना जाना चाहिए।

आज भारत का सबसे बड़ा प्रश्न केवल परीक्षा प्रणाली या कृषि नीति नहीं है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस देश का गरीब, मजदूर, बेरोज़गार युवा और असंगठित श्रमिक भी उतनी ही प्रभावी आवाज़ उठा सकता है, जितनी प्रभावी आवाज़ संसाधन-संपन्न और संगठित वर्ग उठा पाता है? यदि उत्तर “नहीं” है, तो यह केवल आर्थिक असमानता का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की असमानता का भी प्रश्न है।

लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा चुनावों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह सबसे कमजोर नागरिक की आवाज़ कितनी गंभीरता से सुनता है। जिस दिन इस देश का मजदूर, किसान, छात्र, बेरोज़गार युवा और हाशिए पर खड़ा नागरिक बिना भय, बिना आर्थिक विनाश और बिना दमन की आशंका के अपनी बात कह सकेगा, उसी दिन संविधान में निहित “सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय” का सपना वास्तव में साकार होने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

लोकतंत्र की गरिमा तभी पूर्ण होगी जब न्याय केवल शक्तिशाली की पहुँच में नहीं, बल्कि सबसे कमजोर व्यक्ति के अधिकार के रूप में स्थापित होगा।

(फोटो साभार : नौजवान भारत सभा, महाराष्ट्र)

(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।)

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