हिंदुत्व और सामाजिक न्याय की सीमाएं

उत्तर भारत की राजनीति ने वहां के समाज को त्रिशंकु की तरह अधर में लटका दिया है। यह राजनीति अपने लिए बहुमत भले हासिल कर ले जाती हो और संसाधनों पर लूट की खातिर अपनी सत्ता को स्थिर कर ले जाती हो लेकिन उसने समाज को घायल कर दिया है। उस राजनीति से कुछ व्यक्तियों और एकाध दलों के आगे बढ़ने का परिणाम जरूर निकल रहा हो लेकिन समाज तो निरंतर पीछे जा रहा है। और सामाजिक क्रांति प्रतिक्रांति में बदल रही है।

ऐसी ही परिघटनाओं का परिणाम है गोंडा जिले के परसपुर क्षेत्र में हुई विनोद कुमार साहनी की लिंचिंग द्वारा हत्या। विडंबना यह है कि समाज का बौद्धिक वर्ग इन सवालों की गंभीरता में जाने के बजाय उसे या तो समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की निषाद राजनीति की होड़ के रूप में देख रहा है या फिर संजय निषाद और राजपाल निषाद के धरने और पुलिस अधिकारियों के निलंबन के रूप में। कुछ लोग इसे कानून और व्यवस्था के बड़े-बड़े दावों का खोखलापन मानकर अपनी खबर बनाकर संतुष्ट हैं।

विनोद साहनी की सोशल मीडिया पोस्ट और एक कार्यकर्ता के तौर पर राजनीतिक अस्थिरता इस बात का प्रमाण है कि समाज की अति पिछड़ी जातियां इन दोनों धाराओं से ऊब चुकी हैं। लेकिन उनकी मजबूरी यह है कि उन्हें इसका कोई विकल्प मिल नहीं रहा है। इसीलिए वे इन्हीं के शिकंजे में टकरा-टकराकर अपने सपनों का गला घोंट रही हैं। विनोद ने एक ओर हिंदू देवी देवताओं को लक्ष्य करते हुए कुछ पोस्ट लिखी थीं जिससे सवर्ण समाज के लोग नाराज थे। वे उसे अपने धर्म का अपमान समझ रहे थे।

इसीलिए सवर्णों ने उसकी पीट पीट कर हत्या की। हालांकि मुख्यधारा का सवर्ण प्रधान मीडिया अब उन पोस्टों को दरकिनार कर रहा है और कह रहा है कि दरअसल विनोद साहनी अपने समाज के नेताओं को गद्दार बताकर लक्ष्य कर रहा था इसलिए यह सारा विवाद निषाद समाज का आंतरिक मामला है।

वह डॉ धर्मात्मा निषाद और फिर डॉ अखिलेश निषाद की हत्याओं से कुंठित था और यह मान रहा था कि उसके समाज की लड़ाई तथाकथित रहनुमा लड़ नहीं पा रहे हैं। इसीलिए वह पहले निषाद समाज पार्टी में था, उसके बाद आजाद समाज पार्टी में गया। फिर वह विकासशील इंसान पार्टी में गया। कुछ लोगों का दावा है कि आजकल वह समाजवादी पार्टी की ओर चला गया था।

आमतौर पर पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक इसे कानून और व्यवस्था की कमी या फिर वोट और सत्ता की राजनीति में होने वाली हत्या की सामान्य परिघटना मानकर कुछ धरने प्रदर्शन से इसे भुला देने में लगे हैं। लेकिन ध्यान से देखिए तो डॉ संजय निषाद की वह बात कुछ और कहती है जिसमें उन्होंने कहा कि पहले अंग्रेजों ने निषाद जाति को जरायम पेशा जाति की श्रेणी में रखा था लेकिन क्या आज भी आप उसे इस श्रेणी में डालना चाहते हैं।

दरअसल जरायम पेशा तो एक ऐसी श्रेणी थी जो अंग्रेजों ने उन तमाम जातिगत समूहों को प्रदान किया था जिन्होंने किसी न किसी रूप में अंग्रेजों के उपनिवेशवाद और आधुनिकता का विरोध किया था और जिनका पुस्तैनी व्यवसाय अंग्रेजों के कारण छिना था। आज भी वही आधुनिकता की प्रक्रिया चल रही है। जिस आर्थिक अधिकार का वादा करके निषाद समाज को भाजपा से जोड़ा गया था वह आज तक उन्हें हासिल नहीं हो पाया है।

लेकिन सवाल इससे भी अधिक गहरा है और वह समस्या का ऐसा आयाम है जिस ओर गुलाम भारत में जितना ध्यान दिया गया उतना आजाद भारत में ध्यान नहीं दिया गया। अंग्रेज सरकार ने 1871 क्रिमिनल ट्राइब का जो अधिनियम बनाया था उसे आजाद भारत की सरकार ने 1949 में समाप्त करके 1952 में विमुक्त जातियों की एक सूची जारी की। लेकिन समाज और सत्ता में उन जातियों के लिए अभी भी वह भाव बना रहा।

आज निषाद जातियां जिनमें मल्लाह, कश्यप, बिंद, साहनी, केवट, तुरैहा जैसी उपजातियां हैं अपने लिए अनुसूचित जनजाति का दर्जा मांग रही हैं ताकि उन्हें पिछड़ा वर्ग से निकालकर इस श्रेणी में डाला जा सके। वे मुफ्त नावें मांग रही हैं ताकि किसी हद तक अपने पारंपरिक व्यवसाय को प्राप्त कर सकें। वे नदियों और तालाबों में मछली मारने का अधिकार भी मांग रही हैं।

यह सारे अधिकार जरूरी हैं और यह नहीं कह जा सकता कि जब तक समाज में पूरी तरह बराबरी नहीं हासिल हो जाती तब तक इन अधिकारों को दिए जाने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि जब तक समाज में धर्म से मिली हुई शास्ति के माध्यम से कुछ विशेष जातियों और संस्कृतियों का वर्चस्व कायम है तब तक वह अधिकार उन्हें मिलेंगे कैसे। कहने के लिए आरक्षण ने दलित और पिछड़ी जातियों का एक मध्यवर्ग पैदा किया है।

वे शहरों में एक साथ बैठते उठते और वर्चस्ववादी ब्राह्मण संस्कृति में कभी लठैती करके तो कभी वोट देकर अपने लिए थोड़ी बहुत जगह बना लिए हैं। लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और मध्यवर्ती उत्तर प्रदेश में अभी भी उन्हीं जातियों का वर्चस्व है जिन्हें धर्म और संस्कृति ने श्रेष्ठ बता रखा है। गांवों में वही जातियां इलीट हैं और आने वाली तमाम योजनाओं को अपने भ्रष्टाचार की बलि चढ़ा देती हैं।

लेकिन उन्हें तब बहुत बुरा लगता है जब दलित पिछड़ी जातियों के लोग कभी कभी हिंदू देवी देवताओं की श्रेष्ठता पर सवाल उठाते हैं। और वर्ण व्यवस्था पर को भी प्रश्नांकित करते हैं।

दुर्भाग्य है कि आज राजनीति करने का जज्बा जितना प्रबल है उतना प्रबल सामाजिक परिवर्तन का जज्बा नहीं है। कभी उत्तर भारत में डॉ राम मनोहर लोहिया और उसके बाद कांशीराम ने समाज परिवर्तन करने का प्रयास किया था। लेकिन समाजवादियों और आंबेडकरवादियों के इस प्रयास को हिंदुत्व की राजनीति ने निगल लिया। उसने दलित पिछड़ी जातियों को महज सत्ता में भागीदारी तक सीमित कर दिया और उनसे समाज बदलने की ऊर्जा निकाल दी।

उसी का परिणाम है कि जातिगत जनगणना की बात करने वाली समाजवादी पार्टी के लोग भी वही काम कर रहे हैं जो काम हिंदुत्ववादी लोग कर रहे थे। हिंदुत्ववादी लोगों की योजना हर जाति के भीतर श्रेष्ठ होने का गौरव भरने की रही है और इसीलिए वे लंबे समय से जातियों के सम्मेलन कर रहे हैं। उन्हें उन सम्मेलनों में समाज की सांस्कृतिक भागीदारी हासिल होती है और हासिल होते हैं राजभर जैसे कुछ ऐसे नेता जिन्हें आसानी से खरीदा और बेचा जा सके। जिनकी चुनाव जिताऊ क्षमता का लाभ उठाकर पार्टी और हिंदुत्व के आख्यान को ताकत दी जा सके और फिर किसी भी प्रकार के मौलिक सामाजिक बदलाव को मुल्तवी किया जा सके।

संयोग से समाजवादी पार्टी भी हिंदुतववादियों के ढर्रे पर ही चलकर कहीं महर्षि कश्यप की जयंती मनवा रही है तो कहीं महाराज गुह्यराज निषाद की जयंती का आयोजन कर रही है। उसने भी हर जिले में जातिगत समितियां बनवा रखी हैं और उनके माध्यम से निषाद समाज के पांच प्रतिशत वोटों को साधने में लगी है। लेकिन इस रणनीति में समाज में व्यापक बदलाव का सामाजिक एजेंडा कहीं बहुत पीछे रह गया है बल्कि भुला दिया गया है।

हिंदुत्व ने फिर से सवर्णों की श्रेष्ठता साबित करने वाली संस्कृति को उत्तर भारत पर स्थापित कर दिया है। अगर ऐसा न होता तो स्वयं पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री जादवपुर विश्वविद्यालय से वामपंथी प्रभाव खत्म करने के लिए नगाओं के जुलूस का आयोजन न करवाते।

विनोद साहनी की हत्या समाज में बढ़ती असहिष्णुता और अभिव्यक्ति के अधिकार पर हमले का उदाहरण है। वह संवादहीनता का उदाहरण है। वह उदाहरण है मंडल आयोग और आंबेडकरवाद के उभार की प्रतिक्रिया में उत्तर भारत में 1992 में हुई प्रतिक्रांति का। इस प्रतिक्रांति के दौरान सवर्णों ने सरकारें अपने हाथ में लेकर जातिगत श्रेष्ठता और हिंदू श्रेष्ठता वाले अपराधों को करना शुरू किया है फिर भी उनका दावा अपराधियों और अपराध को समाप्त करने का है।

जबकि सबसे बड़े अपराध यानी संसाधनों पर अधिकतम कब्जा करने की होड़ में सवर्ण जातियां शामिल हैं। वे अन्य धर्म और जाति के लोगों को अपराधी बताकर उन पर अपना वर्चस्व कायम करना चाहती हैं।

सवाल महत्त्वपूर्ण है कि क्या लोकतांत्रिक संवाद और व्यापक सामाजिक परिवर्तन के अभियान से इस आख्यान और स्थिति को पलटा जा सकता है? क्योंकि हिंदुत्व यानी सवर्ण के नेतृत्व में हिंदू एकता और सामाजिक न्याय यानी पीडीए दोनों की राजनीति के होते हुए लिंचिंग जैसे अपराध बढ़ रहे हैं। इसलिए समाधान के लिए इस दायरे से बाहर सोचने की आवश्यकता है।    

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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