सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को फ़ैसला सुनाया कि पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से पहले कोर्ट को पति द्वारा लगाए गए व्यभिचार के आरोप पर फ़ैसला करना होगा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि अदालतों का यह मानना गलत होगा कि ऐसे सवाल पर सिर्फ़ अंतिम फ़ैसले के चरण में ही विचार किया जा सकता है।
बेंच ने कहा, “चूंकि धारा 125 (4) (सीआरपीसी) में यह प्रावधान है कि अगर व्यभिचार साबित हो जाता है, तो पत्नी न तो अंतरिम और न ही अंतिम गुज़ारा-भत्ते की हकदार होगी, इसलिए हमारा मानना है कि अगर पति धारा 125(4) के तहत अर्ज़ी दायर करता है और शुरुआती तौर पर सबूतों के ज़रिए आरोप को साबित कर देता है, तभी अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने पर रोक लगाई जा सकती है।”
कोर्ट ने पारिवारिक विवादों में प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर्स पर बढ़ती निर्भरता पर चिंता जताई। कोर्ट ने केंद्र और लॉ कमीशन से कहा कि वे ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करने के लिए प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों को रेगुलेट करने पर विचार करें।
रिकॉर्ड के मुताबिक, दोनों की शादी जुलाई 2014 में हुई थी। विवादों के बाद, पत्नी मई 2020 में अपने नाबालिग बेटे के साथ ससुराल छोड़कर चली गई। इसके बाद उसने उदयपुर के स्पेशल एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास धारा 125 के तहत अपने और बच्चे के लिए गुज़ारा-भत्ते की मांग करते हुए अर्ज़ी दायर की।
तब पति ने यह दावा करते हुए अर्ज़ी दायर की कि पत्नी व्यभिचार के रिश्ते में है, इसलिए वह गुज़ारा-भत्ते की हकदार नहीं है। उसने सबूत भी पेश किए। ट्रायल कोर्ट ने इस पर फ़ैसला करने से इनकार कर दिया और कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मटीरियल की प्रमाणिकता की जांच सिर्फ़ ट्रायल के दौरान ही की जा सकती है। कोर्ट ने दोहराया कि आश्रितों की गरिमा सुनिश्चित करने के सामाजिक न्याय के उद्देश्य को बनाए रखने के लिए गुज़ारा-भत्ते के प्रावधानों की उदारतापूर्वक व्याख्या की जानी चाहिए।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और क़ानूनी मामलों के जानकार हैं।)