जेन-ज़ी : अपने फक्कड़पन में बेहद संजीदा एक पीढ़ी

जेन ज़ी के जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन ने निराशा की धुंध के छँटने में काफी मदद की है। शुरुआत भले ही एक पेपर लीक के खिलाफ हुई थी। लेकिन आक्रोश उतना ही नहीं था। केवल एक धाँधली के खिलाफ नहीं था। आक्रोश संचित था। गुबार भरा हुआ था। बस एक बहाना मिलने की देर थी। जो दिखा वह झलक भर थी।

आक्रोश सरकार पर तो था ही। उसके लोगों के अहंकार, तानाशाही तेवर, देश को अपने बाप की जागीर समझने की भावना, हर प्रश्न के दमन, हर आवाज पर ताले लगाने, हर मांग को आपराधिक बनाने, हर विरोध को देशद्रोह बताने के रवैये के खिलाफ काफी दिनों से ग़ुस्सा पनप रहा था।

लेकिन इससे भी ज्यादा अपने बाप-दादों, अपनी पुरानी पीढ़ी की अंधभक्ति के खिलाफ यह ग़ुस्सा था; जिन लोगों ने आज़ादी की लड़ाई की भावना को तिलांजलि दे दी थी, सांवैधानिक निष्ठा को पार्टी निष्ठा में के गंदे डबरे में फेंक दिया था, एक धर्मनिरपेक्ष देश को सांप्रदायिकता के गटर में फेंकने की कोशिश का समर्थन किया था, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, समाजवाद जैसे महान मूल्यों को गाली बना देने को बर्दाश्त किया था, नागरिकता को प्रजा भावना में और स्वतंत्र लोकतंत्र को राजतंत्र में बदलने की कोशिशों को प्रोत्साहित किया था।

जिन लोगों ने सत्ता को चलाने वाले पूंजीपतियों के खरीदे हुए चैनलों के बेशर्म पालतू ऐंकरों को पत्रकार समझने, सरकारी प्रचार-पत्रों को अखबार समझने और पार्टी दफ्तरों से भेजी गयी विज्ञप्तियों को खबर समझने की गलती की थी, दरअसल उन लोगों ने न केवल आजादी की लड़ाई लड़ने वाली अपनी पुरानी पीढ़ियों के साथ गद्दारी की थी, बल्कि अपनी भावी पीढ़ियों के अधिकारों, सपनों और भविष्य को तार-तार करने का भी अपराध किया था। उन लोगों ने आज की पीढ़ी को कई दशक पीछे हो जाने को मजबूर कर दिया था। यही वजह है कि आज की पीढ़ी को वह लड़ाई फिर से लड़नी पड़ रही है जो अस्सी साल पहले लड़ी और जीती जा चुकी थी।

आज जेन ज़ी अपने लोकतंत्र को रिक्लेम करने, फिर से हासिल करने की लड़ाई में सड़कों पर उतरी है। उसका सड़क पर उतरना केवल अपने चारों तरफ लोकतंत्र को फिर से बहाल करने का उद्यम नहीं है, बल्कि अपने घर-परिवार, गांव-मुहल्ले और उसके ह्वाट्सऐप ग्रुपों में व्याप्त अंधत्व, तोता-रटंत, राजनेताओं की मूर्तिपूजा, सांप्रादायिक नफरत और उच्चजातीय अहंकार की बजबजाहट और सड़ांध से एक विद्रोह है।

यह उन सबके लिए एक चेतावनी है कि हर विरोध पर शिकारी कुत्तों की तरह से टूट पड़ने के डर से अपनायी गयी रणनीतिक चुप्पी को सहमति समझने की भूल मत करो। कि तुम लोगों ने अपनी मूर्खता और संकीर्णता में पूरे देश का काफी नुकसान कर दिया है, लेकिन अब और नहीं। ‘एनफ इज एनफ’। देश एक स्वतंत्र सांवैधानिक लोकतंत्र है, इसे पूर्वजों के बेहिसाब संघर्षों और बेपनाह क़ुर्बानियों से हासिल किया गया है। इसे तानाशाही या राजशाही नहीं बनने देंगे। इस लोकतंत्र के सेवकों को अपना मालिक नहीं बनने देंगे। मालिक तो जनता ही रहेगी।

लोकतंत्र की यह लड़ाई अब घर-परिवार, गली-मुहल्ला हर जगह लड़नी पड़ेगी। वरना लोकतंत्र को अपहृत होने से बचाना संभव नहीं है। लोकतंत्र कोई मंजिल नहीं है। यह हर पल चला जाने वाला एक अनवरत रास्ता है, सतत संघर्ष है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। जो सोवत है, सो खोवत है; जो जागत है, सो पावत है। लोकतंत्र की हिफाजत करनी पड़ेगी। वोट डालकर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता। लोकतंत्र का मतलब केवल वोट डालना नहीं है।

राजनीतिक लोकतंत्र का मतलब है कि आम मतदाता के चुने हुए प्रतिनिधि ही सभी नागरिकों के हित में, संविधान के दायरे में रहते हुए नीति निर्माण करेंगे और प्रशासन चलाएंगे। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का पृथक्करण शक्ति संतुलन को बनाये रखेगा। लेकिन धनतंत्र ने जनतंत्र को निरंतर कमजोर करने का काम किया है। सत्ता के लोभ ने लोकतंत्र को थोड़े से ताकतवर लोगों के हाथों की कठपुतली बना कर रख दिया है। लोकतंत्र की सीढ़ियां चढ़कर एक अल्पतंत्र कायम हो चुका है।

इनके हाथों से सत्ता न फिसले, इसके लिए सारी तिकड़में की जा रही हैं। अपने लिए अस्वीकार्य लोगों को बड़े पैमाने पर मताधिकार और नागरिकता से महरूम किया जा रहा है। लोकतंत्र की हिफाजत करने के लिए बनायी गयी सारी संस्थाओं में अपनी विचारधारा के लोगों को फिट किया जा रहा है। एक दीर्घकालिक रणनीति के तहत पुलिस, अर्धसैनिक बलों और सेना में अपने लोगों को भरा जा रहा है और अपनी विचारधारा की जड़ें गहरी की जा रही हैं। दरअसल यह एक तख्ता पलट जैसा है।

लैंगिक स्तर पर लोकतंत्र का मतलब स्त्री-पुरुष की बराबरी है। न, न ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते’ मत सुनाइए। किसी की, किसी के द्वारा पूजा नहीं। केवल बराबरी। राजनीति में नैतिकता इतनी गिर चुकी है कि बलात्कारियों को उनके वोट बैंक के आधार पर धड़ल्ले से पेरोल दिलायी जा रही है और उन पर से मुक़दमे भी वापस लिये जा रहे हैं। इसी ‘नार्यस्तु पूज्यंते’ वाले देश में बलात्कारियों को जमानत दिलवाने के लिए सत्ताएं एड़ी-चोटी एक कर देती हैं और उनके जेल से बाहर आने पर पार्टी संगठन उनके अभिनंदन समारोह आयोजित करवाते हैं।

सामाजिक स्तर पर लोकतंत्र का मतलब जातिभेद का खात्मा, सांप्रदायिक नजरिये का खात्मा। लेकिन सांप्रदायिक जहर इस तरह फैल चुका है कि धर्म के नाम से किसी आदमी के देशभक्त या देशद्रोही होने का ठप्पा लगा दिया जा रहा है। घरों पर बुलडोजर आरोपित (अपराधी नहीं) का धर्म, जाति और आर्थिक हैसियत देख कर चलाया जाता है। पिछले कुछ वर्षों में बुलडोजर न्याय धड़ल्ले से होने लगा है। न्यायपालिका बैठे देख रही है, या बढ़ावा दे रही है। शासन में बैठे लोगों के फतवे से ही उन्हें पसंद न आने वालों के आशियाने ध्वस्त कर दिये जा रहे हैं।

पार्टी, सरकार और राज्य का भेद खत्म हो चुका है। सत्ता के शीर्ष से भी अब वैसी ही भाषा निकलने लगी है जैसी एक आम ट्रोल इस्तेमाल करता है। एकमात्र यही मामला है जिसमें समाजवाद क़ायम हो चुका है।

समाजवाद, यानि आर्थिक लोकतंत्र का मतलब है आय और संपत्ति के बेशर्म केंद्रीकरण का खात्मा, उसका उचित बंटवारा। अभी देश की कुल संपत्ति का 40 प्रतिशत केवल 1 प्रतिशत लोगों के हाथ में है, और हर साल कुल आय का 22.6 प्रतिशत भी केवल 1 प्रतिशत लोगों के हाथ में जा रहा है। जबकि नीचे की 50 प्रतिशत आबादी के हाथ में कुल आय का केवल 15 प्रतिशत जा रहा है। और इनमें भी ग़रीबी और वंचना की असंख्य परतें हैं।

यह ग़ैर बराबरी लोकतंत्र को खोखला और कमजोर कर रही है। दुनिया के स्तर पर अधिकतर मामलों के सूचकांकों में हम बेहद खराब हालत में हैं। लोकतंत्रों की हालत का मूल्यांकन करने वाली संस्था वी-डेम ने भारत को 105वीं पायदान पर चुनावी तानाशाही (इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी) की कैटेगरी में रखा है।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली हमारे देश की मुख्यधारा की मीडिया ने भी अपने कृत्यों से देश को शर्मसार कर दिया है। प्रेस स्वतंत्रता के मामले में 180 देशों में हम 157वीं पायदान पर हैं। चैनलों के स्टूडियो और अखबारों के संपादकीय कक्षों से दिन-रात संवैधानिक मूल्यों को तार-तार किया जाता है। लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला किया जाता है और सांप्रदायिक जहर फैलाया जाता है। अपने हक़ की मांग करने और आवाज उठाने वाले नागरिकों पर देशद्रोही होने का ठप्पा लगाया जाता है।

सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके स्वतंत्र सोच वाले चैनलों पर क़ब्या करा लिया जाता है, विरोध की आवाजों को दबाने के लिए स्वतंत्र पत्रकारों और आम नागरिकों के एकाउंट जबरन बंद करा दिये जाते हैं, उनकी पोस्टें हटवा दी जाती हैं, कोर्ट से नोटिसें दी जाती हैं, कई-कई एफआईआर करा दी जाती है, उनके और उनके परिजनों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई शुरू करायी जाती है, गुंडों के समूहों द्वारा ट्रोल कराया जाता है। ऐसा नहीं है कि जेन ज़ी इसे महसूस नहीं कर रही है। इसीलिए उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान गोदी मीडिया का बहिष्कार किया।

लैंगिक असमानता की हालत यह है कि श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी केवल 18 प्रतिशत है। इस लैंगिक गैप के मामले में 148 देशों की सूची में हम 131वीं पायदान पर हैं।

लगभग सभी मामलों में यही हाल है। मानव विकास सूचकांक में 134वें स्थान, कानून के शासन के सूचकांक में 86वें स्थान, वैश्विक भूख सूचकांक में 123 देशों में 102वें स्थान पर हम हैं। हमारे 12 प्रतिशत बच्चे कुपोषित, 18.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन वाले और 32.9 प्रतिशत बच्चे बौनेपन के शिकार हैं।

जेन ज़ी को आम तौर पर रील देखने-बनाने में मगन और अपने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश के प्रति ग़ैर जिम्मेदार, अराजनीतिक और न्यायपरक मूल्यों के प्रति बेपरवाह पीढ़ी के रूप में चित्रित किया जा रहा था। लेकिन अपने आंदोलन और इसके दौरान व्यक्त और जिये गये अपने सरोकारों द्वारा इसने हमें बता दिया है कि बाहर से फक्कड़ दिखने वाली यह पीढ़ी भीतर से कितनी संजीदा है। इसने बता दिया है कि संजीदा होने के लिए संजीदा दिखना जरूरी नहीं है। ‘वक्त आने पर बता देंगे तुझे ऐ आसमां, हम अभी से क्या बताएं, क्या हमारे दिल में है।’

इस पीढ़ी ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुता और व्यक्ति की गरिमा जैसे जिन मूल्यों की महानता की हम ऊंची आवाजों में घोषणाएं करते थे, वे मूल्य तो इस पीढ़ी की रगों में दौड़ते हैं। पुरानी, जेन एक्स और जेन वाई पीढ़ी जहां अपनी सुविधाएं और नौकरी बचाने की जद्दोजहद में एक से बढ़ कर एक कायरता पूर्ण समझौते करती रही, वहीं जेन ज़ेड पीढ़ी बहादुर और निडर है और सत्ता की आंखों में आंखें डाल कर सवाल करने और अपने लोकतंत्र को वापस लेने का दावा करने और उसकी हिफाजत करने में सक्षम है। जंतर-मंतर पर उसने यह करके दिखा दिया है।

(सिद्धार्थ कबीर का लेख)

Leave a Reply