संसद झूठ बोलने/सुनने के लिए नहीं बनी है 

सदन के अंदर विपक्ष क्या करेगा आकर जब उसके सवालों को दरकिनार करते हुए उस पर तंज कसे जाएंगे? आपका व्यवहार आपकी बातों को तस्दीक नहीं करता, इसलिए विपक्ष पर संसद न चलने देने का आपका आरोप गलत है।

विपक्ष को बुलाकर खुद गायब हो जाना आपकी फितरत है। कई बार सर्वदलीय बैठक बुलाकर खुद उससे अलग हो जाना विपक्ष की अवहेलना नहीं तो और क्या है?

यदि विपक्ष की बात सुननी ही नहीं है, उसके सवालों का जवाब देना ही नहीं है, तो फिर संसद के भीतर उसकी मौजूदगी का औचित्य क्या रह जाता है?

 ऐसे में संसद के अंदर रहना क्या और बाहर रहना क्या!

आप सत्ता में हैं तो क्या संविधान से भी ऊपर हैं? जरा सोचिए—जिस विधेयक पर सरकार संसद से समर्थन और विमर्श चाहती है, उसे प्रस्तुत करने वाला मंत्री ही यदि सदन से अनुपस्थित रहे, तो यह नजीर संसदीय जवाबदेही के किस आदर्श को स्थापित करती है?

ऐसे में संसद का चलना और न चलना क्या, जब किसी तरह की कोई जवाबदेही ही नहीं है। 

संसद किसी दल का निजी मंच नहीं है। वह देश की जनता की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है।

ऐसी संसद अपना कितना औचित्य सिद्ध कर पाएगी, जहाँ उसके सदनों के नीति-नियामक सभापति और अध्यक्ष सत्ताधारी दल के हिसाब से कार्यवाही चलाएं!

जिन मंत्रियों से जवाब माँगा जाय, यदि वे सत्ता के अहंकार में संसद में स्थित अपने चेंबर में तो रहें, लेकिन सदन में आने की जहमत न उठाएँ, तो फिर इसे संसद की अवहेलना के रूप में क्यों न देखा जाय? 

संसद आपके घर की बैठक नहीं है कि सब आपके हिसाब से चले। लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है और संसद उस जवाबदेही का सबसे महत्वपूर्ण मंच है।

 यह कोई राजतंत्र नहीं है कि प्रजा आपके आने की राह तके और आप तब उपलब्ध हों, जब चीजें आपके हिसाब से हों! 

नेहरू जी तो बीमारी की हालत में भी सदनों की कार्यवाही में भाग लेते थे और एक आप हैं कि जब-जब आप सवालों से घिरे सदन से जय राम जी की कर ली।

ऐसे संसद की गरिमा क्या तब तार-तार नहीं हुई थी, जब पिछले बजट सत्र में सदन के नेता राष्ट्रपति के अभिभाषण पर औपचारिक धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने तक न आए? बताया गया कि महिलाएं प्रधानमंत्री पर हमला कर सकती थीं, इसलिए उनको आने से मना कर दिया! अब बताइए अपनी ही महिला सांसदों का इतना खौफ़। जहां तक हमारी जानकारी है, ऐसा संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ। 

पहले बजट सत्र में प्रधानमंत्री न हाजिर हुए तो इस बार उनकी राह पर चले शाह जी। हालांकि शाह जी नाम को आखिरी दिन हाजिर हुए। लोकसभा शुरू भी न हो पाई कि स्थगित हो गई। आज तो लोकसभा अध्यक्ष सत्र के अवसान पर सांसदों का औपचारिक धन्यवाद तक न दे सके। पारंपरिक औपचारिकताएं तक न निभाई गईं। आखिर क्यों? 

इतनी जल्दी क्या थी सदन के स्थगन की?

इसके अलावा जब सदन को झूठ के प्रसार का जरिया बना लिया जाय तो फिर बिना जवाबदेही तय किए उसमें मौजूदगी का कोई अर्थ रह नहीं जाता। 

कई बार मौजूदा प्रधानमंत्री जी स्वयं नेहरू के बारे में गलतबयानी कर चुके हैं और इस बार तो खुद रक्षा मंत्री ने भी ऑपरेशन सिंदूर में सैनिकों की शहादत पर गलतबयानी की। 

अब बताइए जब सदन में मंत्रियों द्वारा झूठ बोला जाएगा तो  फिर संसद का औचित्य क्या रहेगा?

संसद की गरिमा इस बात से भी तय होती है कि वहां तथ्य कितनी जिम्मेदारी से रखे जाते हैं। यदि सदन के भीतर इतिहास, घटनाओं या सरकारी कार्रवाइयों के बारे में ऐसे दावे किए जाएं जिनकी तथ्यात्मकता पर गंभीर सवाल हों, तो संसद जनचर्चा का मंच न रहकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मंच बनकर रह जाएगी।

संसद झूठ बोलने/सुनने के लिए नहीं बनी है। 

संसद इसलिए बनी है कि देश के करोड़ों नागरिकों की आवाज वहाँ पहुँचे; सरकार से सवाल पूछे जाएँ; नीतियों पर बहस हो; गलतियों पर जवाबदेही तय हो और व्यापक राष्ट्रीय हित में निर्णय लिए जाएँ।

संसद देश की समस्याओं के समाधान और विकास हेतु जनप्रतिनिधियों के व्यापक विमर्श का मंच है  न कि विपक्ष को नीचा दिखाने का स्थान।

(संजीव शुक्ल का लेख)

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