बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने नालसार यूनिवर्सिटी के उन छात्रों के एनरोलमेंट पर लगाए गए प्रतिबंध को कुछ ही घंटों के भीतर वापस ले लिया है जिन्होंने सीजेआई सूर्यकांत को विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया है। बार बीसीआई का यह बड़ा यू-टर्न तब आया सोशल मीडिया में इस कदम की कड़ी आलोचना के बाद आया।
कॉकरोच जनता पार्टी ने प्रोटेस्ट की चेतावनी दी। सीजेपी प्रमुख अभिजीत दिपके ने लिखा कि क्या होगा अगर सभी कानूनी कॉकरोच एक साथ आ जाएं? सीजेपी के प्रवक्ता सौरभ दास ने भी प्रदर्शन की चेतावनी दे दी।
यही नहीं बल्कि बीसीआई के एक सदस्य ने भी चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के फ़ैसले का कड़ा विरोध किया और उन्होंने इस आदेश को “साफ़ तौर पर मनमाना” और ग्रेजुएट्स के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।
बीसीआई चेयरमैन को लिखे एक पत्र में एन मनोज कुमार जो बार काउंसिल ऑफ़ केरल के भी सदस्य हैं ने कहा, “एक लोकतांत्रिक देश में छात्रों को भी हर दूसरे नागरिक की तरह अपनी राय और असहमति ज़ाहिर करने का अधिकार है।” उन्होंने कहा कि सिर्फ़ राय ज़ाहिर करने के लिए छात्रों को एनरोलमेंट से इनकार करने या उसे अनिश्चित काल के लिए टालने की धमकी देना “पूरी तरह से अनुचित” है और यह “बेहद मनमानापन” है।
उन्होंने को लिखा, “जब आदेश में खुद यह माना गया कि किसी विरोध प्रदर्शन में सिर्फ़ शामिल होने या उसका समर्थन करने से कोई अयोग्य नहीं हो जाता और हर व्यक्ति की भूमिका की अलग से जांच होनी चाहिए, तो 2026 बैच के सभी छात्रों पर एक साथ रोक लगाना साफ़ तौर पर मनमाना है। सैकड़ों योग्य लॉ ग्रेजुएट्स के एनरोलमेंट के अधिकार को बिना किसी ठोस कारण के सस्पेंड नहीं किया जा सकता।”
आगे कहा गया, “अब समय आ गया है कि बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ऐसे कदमों से बचे, जिनसे न्यायपालिका को खुश करने की धारणा बनती हो। इसके बजाय, उसे अपनी मुख्य कानूनी ज़िम्मेदारी पर ध्यान देना चाहिए, जो वकीलों के समुदाय के अधिकारों, विशेषाधिकारों और हितों की रक्षा करना और बार की आज़ादी और गरिमा बनाए रखना है। इसलिए, इस आदेश को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।”
कॉकरोच जनता पार्टी के सौरभ दास ने कहा कि किसी औपचारिक निमंत्रण पर असहमति ज़ाहिर करने के लिए छात्रों को सामूहिक रूप से सज़ा नहीं दी जा सकती, कॉकरोच जनता पार्टी इस आदेश की निंदा करती है। इसके बाद उन्होंने कहा कि ‘अगर बीसीआई चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा इस आदेश को तुरंत वापस नहीं लेते हैं तो सभी लॉ छात्र, वकील, सीनियर वकील और अच्छे इरादे वाले युवा कॉकरोच बार काउंसिल के ऑफ़िस और मिश्रा के सरकारी आवास के बाहर, और अपने-अपने राज्यों में विरोध प्रदर्शन करेंगे।’ इस चेतावनी के जवाब में मनन कुमार मिश्रा ने कहा, ‘काउंसिल पहले ही वह पत्र वापस ले चुकी है।’
मनन मिश्रा की पोस्ट के बाद सौरभ दास ने कहा है कि आदेश को पूरी तरह से वापस नहीं लिया गया है। उन्होंने मिश्रा को संबोधित करते हुए कहा है, “आपके नए पत्र के अनुसार, वह हिस्सा अभी भी लागू है जिसमें छात्रों के नाम मांगे गए हैं और उनके शांतिपूर्ण विरोध के लिए उनके खिलाफ “जांच” का आदेश दिया गया है। उस पूरे पत्र को तुरंत वापस लें। भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ लोकतांत्रिक विरोध करने के कारण नालसार के किसी भी छात्र को किसी जांच या उत्पीड़न का सामना नहीं करना चाहिए।
आपको ऐसी धमकी देने का कोई अधिकार नहीं है। अपनी आधिकारिक जिम्मेदारियों के दायरे में रहें और छात्रों को ‘जांच’ की धमकी देना बंद करें। पत्र को पूरी तरह से वापस लें और नालसार के हमारे होनहार लॉ छात्रों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने की गारंटी दें। जब तक यह मांग पूरी नहीं हो जाती, तब तक बीसीआई और मिस्टर मिश्रा के आधिकारिक आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन का आह्वान जारी रहेगा।”
बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी बीसीआई ने नए आदेश में साफ़ किया कि नालसार के 2026 बैच के सभी छात्र अपनी पसंद की किसी भी स्टेट बार काउंसिल में एडवोकेट के रूप में नामांकन करा सकेंगे। बीसीआई ने कहा कि ‘किसी भी निर्दोष छात्र को बिना उसकी गलती के नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।’
हालांकि बीसीआई ने यह भी साफ़ किया कि मामला अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। उसने कहा कि वह नालसार के वाइस चांसलर की जांच रिपोर्ट का इंतजार करेगी और उसके बाद आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि नालसार के 2026 बैच के 450 से अधिक छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में छात्रों ने आग्रह किया कि दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में सीजेआई सूर्यकांत को आमंत्रित करने के फैसले पर दोबारा विचार किया जाए। छात्रों ने कहा कि उनका विरोध सीजेआई के संवैधानिक पद से नहीं, बल्कि हाल के कुछ न्यायिक घटनाक्रमों और उनकी कथित टिप्पणियों से जुड़ा है।
अपने ज्ञापन में छात्रों ने जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामले की सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई का भी उल्लेख किया। छात्रों का कहना था कि सुनवाई के दौरान पुलिस कार्रवाई से जुड़े वीडियो देखने से इनकार किया गया और प्रदर्शनकारियों की शिकायतों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे समय में जब नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे अहम हैं, विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह संविधान के मूल्यों और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक होना चाहिए।
छात्रों ने अपने पत्र में लिखा कि वे कानून के विद्यार्थी हैं और उनका विरोध केवल इस बात को लेकर है कि दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसकी सार्वजनिक भूमिका उन संवैधानिक मूल्यों से मेल खाती हो, जिन्हें विश्वविद्यालय पढ़ाता है। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी संवैधानिक संस्था का अपमान करना नहीं, बल्कि अपनी चिंता दर्ज कराना है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)