युवा आक्रोश के बरक्स खड़े सवाल

दिल्ली और फिर रांची के आंदोलन में शामिल छात्र-युवा भले, मोटे तौर पर, अलग-अलग सामाजिक वर्गों से आए हों और उनकी वर्गीय स्थिति उनकी मांगों में भी झलकी हो, लेकिन वे सभी समान चिंताओं से प्रेरित नजर आए हैं। चिंता है उस बेहतर भविष्य की, जो फिलहाल ओझल हो गया है। दिल्ली में जुटान अपेक्षाकृत उच्चतर वर्गों से आए युवाओं का हुआ, जिनमें प्रोफेशनल डिग्रियों की परीक्षा व्यवस्था के ढहने से जन्मा आक्रोश था। अपनी शैक्षिक एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण वे अधिक राजनीतिक चेतना से लैस थे। इसलिए अपनी समस्या को अपेक्षाकृत अधिक व्यापक संदर्भ में रखने में वे सक्षम नजर आए। 

रांची में उस सामाजिक पृष्ठभूमि के युवा जुटे, जिनका सबसे ऊंचा सपना सरकारी नौकरी पाने का है। प्रोफेशनल डिग्रियां लेकर अमेरिका (या अन्य पश्चिमी देशों) में करियर बनाने का सपना अगर वे देखते भी हैं, तो वह उन्हें बहुत दूर का मालूम पड़ता है। अपनी प्रांतीय पृष्ठभूमि और संघर्षमय जीवन के कारण मध्यम/ निम्न मध्यम वर्ग के युवाओं से उस स्तर की राजनीतिक चेतना या साहस की अपेक्षा उचित नहीं है, जो महानगरीय पृष्ठभूमि में पले-बढ़े उच्च मध्यम/ मध्य वर्ग के युवाओं में आम तौर पर नजर आई है। 

इसीलिए दिल्ली में आंदोलन का नेतृत्व करने वाली “कॉकरोच जनता पार्टी” के नेताओं ने जवाबदेही को मुख्य मुद्दा बनाया। उनके भाषणों में नागरिक आजादियों के सिकुड़ने, राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण, और भारतीय लोकतंत्र के सामने उपस्थित बड़े प्रश्नों का अक्सर उल्लेख हुआ। जबकि रांची के छात्र ऐसी बातें कहने की कोशिश करने वाले व्यक्तियों को मंच पर चुप कराते नजर आए हैं। उनकी एकमात्र चिंता है कि झारखंड लोक सेवा आयोग एवं सरकारी नौकरियों के लिए आयोजित अन्य परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों के दोषियों को सजा दी जाए और रद्द करने के बाद उन परीक्षाओं का दोबारा आयोजन हो। 

बहरहाल, जंतर-मंतर पर हुई गोलबंदी हो या रांची के एस. जयपाल सिंह स्टेडियम में हुआ जुटान- दोनों के विमर्श में एक समान बात नजर आई है। रोजगार के मोर्चे पर लगातार सघन होती गई अवसरहीनता और शिक्षा-परीक्षा प्रणाली के उत्तरोत्तर कमजोर होने के मूलभूत कारणों तक चर्चा को ले जाने की कोशिश इस पूरे युवा आंदोलन में अभी तक गायब है। कहा जा सकता है कि ये आम युवा हैं, जो अपने सामने मौजूद मुश्किल चुनौतियों से परेशान होकर जीवन में पहली बार किसी आंदोलन में शामिल हुए हैं।

अतः इनके संदर्भ में ऐसी कमियों का जिक्र करना ना तो उचित है, ना ही उनसे ऐसी अपेक्षा रखना व्यावहारिक नजरिया होगा। इस स्तंभकार को इस बात से पूरा इत्तेफ़ाक है। फिर भी इस सवाल को उठाना इसलिए अपरिहार्य है, क्योंकि ऐसी समझ के बिना स्वतःस्फूर्त आंदोलन अक्सर कोई दीर्घकालिक सकारात्मक योगदान नहीं कर पाते। ऐसा ही इस प्रतिरोध के साथ भी हो सकता है।

मुद्दा यह है कि रोजगार की परिस्थितियां प्रतिकूल क्यों हुई हैं? शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल क्यों गहरे होते गए हैं? अक्सर ऐसा क्यों कहा जाने लगा है कि भारत में हासिल अधिकांश डिग्रियां रोजगार बाजार की जरूरतों के मुताबिक नहीं हैं? परीक्षा व्यवस्था इस कदर लीक-ग्रस्त क्यों हो गई है? क्या इन प्रश्नों का व्यवस्थागत उत्तर ढूंढे बिना इन समस्याओं का कोई समाधान संभव है?

इन सवालों पर गंभीरता से विचार किया जाए, तो बात स्वतः अर्थव्यवस्था के बुनियादी स्वरूप और वर्तमान आर्थिक प्राथमिकताओं की ओर मुड़ जाएगी। बाजार से रोजगार गायब हो गए हैं, तो उसका सीधा कारण है कि वित्तीय पूंजीवाद के दौर में ऐसी उत्पादक अर्थव्यवस्था प्राथमिकता नहीं रही, जिसमें आपूर्ति शृंखला और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं, और जिसमें आर्थिक लाभ व्यापक रूप से वितरित होते हैं। चूंकि ऐसी अर्थव्यवस्था में निवेश जोखिम भरा होता है, और निवेश के लाभ दीर्घकाल में जाकर मिलते हैं, अतः वैसा निवेश करना उस समय पूंजीपतियों की प्राथमिकता नहीं होती, जब उनके पास मुनाफा कमाने के दूसरे विकल्प मौजूद हों। आज वित्तीय संपत्तियों में निवेश कर तुरत-फुरत मुनाफा कमा लेना उनकी प्राथमिकता बनी हुई है। 

ऐसी स्थिति में ‘राज्य’ यानी सरकार की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण हो जाती है। ‘राज्य’ इस सूरत बदलने के लिए दो तरह से हस्तक्षेप कर सकता हैः पहला, वह खुद उन क्षेत्रों में निवेश करे, जहां सब्र की जरूरत होती है, और जहां होने वाले सामाजिक-आर्थिक एवं मानव संसाधन से जुड़े लाभों को सीधे पैसे में नहीं तौला जा सकता। राष्ट्रीय प्राथमिकताएं तय कर और उनके अनुरूप निवेश को रियायती सुविधाएं देते हुए राज्य दूसरा हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन यह सब सार्वजनिक नियोजन (PLANNING) के साथ ही संभव है। 

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि 1991 से अपनाई गई नव-उदारवादी नीतियों के साथ भारत में नियोजन के महत्व को घटाने की शुरुआत हो गई, जिसे योजना आयोग को भंग करने की घोषणा के साथ 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परिणति तक पहुंचा दिया। निजीकरण और तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर एकाधिकारी पूंजी का नियंत्रण नव-उदारवादी नीतियों के स्वाभाविक परिणाम हैं। यह उस निर्मित अर्थव्यवस्था के अभिन्न अंग हैं, जिसमें होने वाले धन सृजन के लाभ सीमित तबकों तक ही सीमित रह जाते हैं। 

शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन, संचार आदि जैसी आम उपभोग की सेवाओं को मुनाफा केंद्रित कारोबार में तब्दील करना इन आर्थिक नीतियों की स्वाभाविक परिणति है। प्राइवेट शिक्षा संस्थानों को तरजीह, परीक्षा व्यवस्था के संचालन का निजीकरण, कोचिंग निर्भर पढ़ाई का चलन, आदि जैसी प्रक्रियाएं इसका स्वाभाविक परिणाम हैं। इन सारी समस्याओं का खूब जिक्र कॉकरोच मूवमेंट और रांची के प्रतिरोध के दौरान हुआ है। लेकिन वहां की चर्चाओं का संदर्भ सीमित रहा है। उनका सार है कि समस्या की जड़ में वर्तमान सत्ताधारी हैं, जिनके भ्रष्ट आचरण ने आम युवाओं से उनके हक छीन लिए हैं। 

ऊपरी तौर पर ऐसा होता दिखता भी है। मगर मुद्दा है कि इसका समाधान क्या है? रांची की चर्चा में बार-बार उल्लेख हुआ है कि झारखंड अलग राज्य की स्थापना के बाद से- यानी पूर्व सरकारों के दौर से लेकर आज तक- भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और अपने लोगों को फायदा पहुंचाने के चलन के कारण प्रतियोगिता परीक्षाएं या नौकरी के लिए होने वाले इम्तहान स्वच्छता से आयोजित नहीं हुए। तो फिर सुधार कैसे होगा? आखिर सत्ता में तो अदल-बदल कर वे नेता या दल ही आएंगे, जो पहले भी सत्ता में रह चुके हैं! और अगर कोई नई पार्टी जीत भी गई, तो उसके नेता पुराने चलन पर नहीं चल देंगे, इसकी क्या गारंटी हो सकती है?

इसीलिए आवश्यक है कि समस्या के नीतिगत पहलुओं को समझा जाए। मुद्दा है कि अर्थव्यवस्था को कैसे इस तरह का स्वरूप दिया जाए, जिससे भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में तमाम लोगों के जीवन-स्तर में सुधार की परिस्थितियां बनें? इस लिहाज से दो प्रमुख चुनौतियां हैः रोजगार बाजार में पहुंचने वाले युवाओं के लिए बेहतर वेतन एवं सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली नौकरियों की अधिकतम गुंजाइश बनाना, और शिक्षा ढांचे को ऐसा रूप देना, जिससे वह युवाओं को जरूरी ज्ञान एवं कौशल से लैस कर सके। 

क्या मौजूदा आर्थिक नीतियों एवं नव-उदारवादी सोच के साथ ऐसा करना संभव है? 

इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने के प्रयास में हमें सौ साल पहले हुए प्रयोगों पर गौर करना चाहिए। पश्चिम में उस दौर को कीनेसियन (Keynesian) उदारवाद का दौर कहा जाता है- यानी वह दौर, जिसमें आर्थिक नीतियां अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स के विचारों से प्रेरित हुई थीं। अनेक पश्चिमी विश्लेषक मानते हैं कि Keynesian उदारवाद एक प्रकार की आत्म-क्रांति था, जिसने पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने के लिए नियोजन, सक्षम राज्य, और उससे संचालित आर्थिकी को अपनाया।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पश्चिम में पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था इसलिए सफल होती दिखी, क्योंकि वह व्यवस्था वक्ती चुनौतियों के अनुरूप खुद को बदलने में तब सक्षम साबित हुई थी। चुनौतियां सोवियत संघ के अस्तित्व में आने से पैदा हुई थीं, जिस कारण अमेरिका सहित तमाम देशों में श्रमिक आंदोलन एवं कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रभाव तेजी से फैल रहा था। कम्युनिस्ट क्रांति के खतरे को भांपते हुए तब पूंजीवादी शासक वर्ग ने श्रमिक वर्ग के प्रति ‘रियायत’ बरतने की नीति अपनाई। 

इसके तहत राज्य को अधिक सक्षम बनने दिया गया, सामाजिक सुरक्षा का विस्तार हुआ, पूंजी के कुछ रूपों को सीमित किया गया, सार्वजनिक क्षेत्र में निवेश बढ़ा, और बाजारों एवं समाज के बीच एक नया राजनीतिक समझौता तैयार किया गया। इसके जरिए संदेश दिया गया कि ‘सर्वसत्तावादी’ कम्युनिस्ट व्यवस्था को अपनाए बिना भी उत्कृष्ट मानव विकास एवं समृद्धि के न्यायपूर्ण वितरण की दिशा में बढ़ा जा सकता है। तब ये सुधार पूंजीवाद को राजनीतिक रूप से अधिक स्वीकार्य एवं टिकाऊ बनाने में मददगार बने। 

मगर, सोवियत संघ के विघटन और चीन के अस्पष्ट दिशा अपनाने के बाद जब कम्युनिज्म की वैचारिक चुनौती कमजोर पड़ गई, तब पूंजीवादी व्यवस्थाओं ने ‘रियायतों’ को वापस लेना शुरू कर दिया। 

भारत की कहानी से उस परिघटना से अलग नहीं है। भारत जब आजाद हुआ, तब वह व्यवस्था प्रचलन में थी, जिसे फ्रेंच शब्द Dirigiste से जाना जाता है। Dirigiste एक आर्थिक व्यवस्था है, जिसमें राज्य (सरकार) बाजार को सक्रिय रूप से निर्देशित करता है और आर्थिक गतिविधियों को दिशा देता है। इसे लैसेज़-फेयर (पूरी तरह मुक्त बाज़ार) अर्थव्यवस्था के विपरीत माना जाता है। दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद इसे फ्रांस में indicative planning (संकेतात्मक योजना) के रूप में लागू किया गया।

तब चार्ल्स द गॉल के शासनकाल में फ्रांस ने औद्योगीकरण और विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाव के लिए राज्य-निर्देशित आर्थिक नीतियां अपनाई थीं। उससे कुछ पहले राष्ट्रपति फ्रैंकलीन डी. रुजवेल्ट के शासनकाल में पारित हुए न्यू डील कानूनों के जरिए इससे मिलती-जुलती व्यवस्था को अमेरिका में भी अपनाया गया था। ये सारे प्रयोग सोवियत संघ के गोसप्लान (Gosplan) से प्रेरित थे। गोसप्लान सोवियत संघ का केंद्रीय योजना आयोग था, जो पंचवर्षीय योजनाएं बनाता और लागू करता था। 

उन प्रयोगों के दौर में सभी संबंधित समाजों में सर्वांगीण विकास एवं समृद्धि के न्यायपूर्ण वितरण की प्रवृत्तियां देखने को मिलीं। भारत में आज भी जो सार्वजनिक संपत्तियां हैं, वे उसी दौर में निर्मित हुईं। सामाजिक न्याय की दिशा में जो प्रगति हुई, उसकी जमीन उन्हीं नीतियों से तैयार हुई थीं। जब उन नीतियों को छोड़कर पूंजी को अनुशासन-मुक्त कर दिया गया और पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने एवं राजसत्ता पर उनका नियंत्रण मजबूत करने में जब राज्य सहायक बन गया, तो गैर-बराबरी की खाई चौड़ी होने के साथ-साथ आम जन के लिए अवसरहीनता की स्थिति और संगीन होने की स्थितियां आगे बढ़ने लगीं। 

अब सूरत यह है कि 1950 के आसपास कायम हुआ वो संतुलन बेहद कमजोर हो चुका है। भारत हो, या अमेरिका या अन्य कथित लोकतांत्रिक देश- वहां नीतियां विपरीत छोर पर पहुंच चुकी हैं। इन सभी जगहों पर शासक पूंजीपति वर्ग ने धुर-दक्षिणपंथी/ नव-फासीवादी ताकतों को आगे कर बहुसंख्यक जनता का ध्यान अवसरहीन एवं अंधकारमय भविष्य से भटकाने की कोशिशें की हैं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि आखिरकार पेट के सवाल उन भटकावों के मकड़जाल से बाहर निकलने का प्रयास करने लगे हैं। 

बहरहाल, इस सवालों के जवाब उस विमर्श में नहीं हैं, जो फिलहाल हावी दिखता है। वास्तविक चुनौती राज्य की क्षमता का पुनर्निर्माण करने, तथा राज्य, पूंजी और नागरिक समाज के हितों बीच संतुलन फिर से स्थापित करने की है। सबक यह है कि जो राज्य- निर्माण नहीं कर सकता, विनियमन नहीं कर सकता, पुनर्वितरण नहीं कर सकता, सार्वजनिक सुविधाएं प्रदान नहीं कर सकता, सामाजिक प्राथमिकताओं पर अमल सुनिश्चित नहीं कर सकता, वह अंततः अपनी वैधता खो देता है। 

कई अन्य कथित लोकतांत्रिक देशों के साथ-साथ यह स्थिति आज भारत में भी पैदा हो रही है। इस संदर्भ में जॉन कीन्स द्वारा उठाया गया ये सवाल आज फिर हमारे सामने आ खड़ा हुआ है: क्या उदारवादी लोकतंत्र अपनी संस्थागत कमजोरियों के व्यवस्थागत संकट में तब्दील होने से पहले खुद को नए सिरे से गढ़ (reinvent) सकता है? 

जो छात्र समझते हैं कि उनकी लड़ाई सिर्फ परीक्षा व्यवस्था में घुसे भ्रष्टाचार के खिलाफ है- उन्हें उपरोक्त प्रश्न या राजनीति से कोई मतलब नहीं है (जैसा कि दिल्ली और रांची में कई बार सुनने को मिला), उनके बारे में यही कहा जाएगा कि वे अपनी ऊर्जा व्यर्थ ज़ाया कर रहे हैं। हालांकि इस ना-जानकारी के लिए उनसे कहीं ज्यादा दोषी वे राजनीतिक संगठन हैं, जिन्होंने समाज में व्यवस्था से जुड़े मूलभूत प्रश्नों पर बहस से मुंह मोड़ लिया है- जिन्होंने समाज में बुनियादी सियासी जागरूकता लाने की अपनी जिम्मेदारी छोड़ रखी है। 

कहने का कुल तात्पर्य यह है कि प्रतिरोध एवं विद्रोही भावनाओं का अपना महत्व है, लेकिन अगर सचमुच सूरत बदलनी है, लक्ष्य बेहतर जिंदगी के अवसर पैदा करना है, और भारत ने “नियति से मिलन” की जो यात्रा 79 साल पहले शुरू की थी, उस राह में आ खड़ी हुई रुकावटों को हटाना है, तो सवालों की जड़ें जहां हैं, वहां तक नजर ले जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।) 

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