दिल्ली हाईकोर्ट ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी बड़ी साज़िश के मामले में बुधवार को जेएनयू के पूर्व स्कॉलर उमर खालिद और शरजील इमाम की ज़मानत अर्ज़ियों को खारिज किया।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की बेंच ने कहा कि वह गुलफिशा फातिमा मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश में बदलाव नहीं कर सकते। उस आदेश में ज़मानत पाने के लिए कुछ शर्तें रखी गईं—पहली, संरक्षित गवाहों के बयान पूरे होने पर और दूसरी, आदेश पारित होने की तारीख (5 जनवरी, 2026) से एक साल पूरा होने पर।
कोर्ट ने कहा, “यह कोर्ट न्यायिक अनुशासन से बंधा हुआ है।” आगे कहा कि वह शरजील और उमर पर लगाई गई शर्तों में बदलाव नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि तस्लीम अहमद और खालिद सैफी की भूमिका शरजील और उमर से अलग है, इसलिए अहमद और सैफी को अंतरिम ज़मानत देने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर वे समानता का दावा नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा, “ऊपर की चर्चा और मामले के सभी तथ्यों, खासकर गुलफिशा मामले में अपीलकर्ताओं पर लगाई गई शर्तों को देखते हुए यह कोर्ट ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कमी नहीं पाता है। इसलिए अपीलें खारिज की जाती हैं।”
खालिद ने अपनी तीसरी ज़मानत अर्ज़ी खारिज होने को चुनौती दी। इमाम ने भी उसी आदेश के तहत अपनी ज़मानत अर्ज़ी खारिज होने को चुनौती दी। ये अपीलें नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी एक्ट की धारा 21 के तहत ट्रायल कोर्ट के 4 जुलाई के उस आदेश के खिलाफ दायर की गईं, जिसमें खालिद और इमाम को ज़मानत देने से इनकार किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने कहा कि उसके पास सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, जिसमें दोनों को ज़मानत देने से इनकार किया गया।
कोर्ट ने गौर किया कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संरक्षित गवाहों के बयान पूरे होने या उस आदेश की तारीख से एक साल पूरा होने पर—जो भी पहले हो—इमाम ज़मानत के लिए फिर से अर्ज़ी दे सकते हैं। 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा, मीरा हैदर, शिफा-उर-रहमान, मो. सलीम खान और शादाब अहमद को ज़मानत दी थी; हालांकि, कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की थी।
इसके बाद जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली डिवीज़न बेंच ने ‘गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य’ मामले के फ़ैसले पर सवाल उठाए। बेंच का कहना था कि इस फ़ैसले में 2021 में ‘यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम केए नजीब’ मामले में तीन जजों की बेंच द्वारा दिए गए फ़ैसले का ठीक से पालन नहीं किया गया। उस फ़ैसले में यूएपीए के तहत मामलों में ट्रायल में लंबी देरी को ज़मानत का आधार माना गया।
मई में जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली डिवीज़न बेंच ने खालिद और शरजील की ज़मानत अर्ज़ियां खारिज की थीं। बेंच ने यह भी देखा कि ‘यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम केए नजीब’ मामले में तीन जजों की बेंच के फ़ैसले को समझने को लेकर अलग-अलग बेंचों के बीच “मतभेद” है, इसलिए इस मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया।
एफआईआर 59/2020 की जांच दिल्ली पुलिस का स्पेशल सेल कर रहा है। यह मामला इंडियन पीनल कोड और अनलॉफुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट, 1967 (यूएपीए) के तहत दर्ज किया गया।
इस मामले में आरोपी ताहिर हुसैन, उमर खालिद, खालिद सैफी, इशरत जहाँ, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा, शिफा-उर-रहमान, आसिफ़ इक़बाल तन्हा, शादाब अहमद, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक, मो. सलीम खान, अतहर खान, सफूरा ज़रगर, शरजील इमाम, फैज़ान खान और नताशा नरवाल हैं।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)