“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।” शायर बशीर बद्र की इन पंक्तियों से इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय फ़ैमुद्दीन एवं दो अन्य बनाम उत्तर प्रदेश एवं 7 अन्य, रिट – सी- नं 2229 of 2026 की शुरुआत की है। यह शुरुआत केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की पीड़ा को सामने रखती है जिसके लिए घर केवल ईंट, सीमेंट और लोहे की दीवारें नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, परिवार की सुरक्षा, बच्चों का भविष्य और जीवन की सबसे बड़ी स्थिरता होता है।
न्यायालय ने इसी मानवीय पहलू को संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 से जोड़ते हुए यह विचार किया कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज होना अपने-आप उसके घर को दंड का निशाना बनाने का आधार नहीं बन सकता।
मामला हमीरपुर के भरुआ सुमेरपुर का था। तीन याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उनके एक रिश्तेदार के विरुद्ध गंभीर आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ था और प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) के बाद याचिकाकर्ताओं को आशंका हुई कि उनके आवासीय मकान तथा अन्य संपत्तियों के विरुद्ध ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जा सकती है। राज्य की ओर से कहा गया कि आवासीय मकान के संबंध में अभी ध्वस्तीकरण नहीं हुआ है और यदि कोई कार्रवाई होगी तो कानून के अनुसार होगी।
इसी परिस्थिति ने न्यायालय के सामने एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न खड़ा किया—क्या किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति से संबंध मात्र के कारण उसके परिवार के घर को प्रशासनिक कार्रवाई का निशाना बनाया जा सकता है और क्या नगर निकाय की ध्वस्तीकरण शक्ति का इस्तेमाल आपराधिक आरोप के अप्रत्यक्ष दंड के रूप में किया जा सकता है?
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी अवैध निर्माण को केवल इसलिए संरक्षण नहीं मिल सकता कि वह किसी व्यक्ति का घर है। यदि निर्माण वास्तव में अवैध है तो सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकता है। लेकिन दूसरी ओर, ध्वस्तीकरण की वैधानिक शक्ति का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को उसके आपराधिक आरोप के लिए दंडित करने के उद्देश्य से नहीं किया जा सकता।
अपराध का निर्धारण और दंड देना आपराधिक न्यायालय का क्षेत्र है; कार्यपालिका स्वयं न्यायालय बनकर किसी आरोपी को अतिरिक्त दंड नहीं दे सकती। इसी संदर्भ में न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने “प्रतिशोधात्मक कार्यपालिका विवेकाधिकार का प्रयोग” की महत्वपूर्ण अवधारणा सामने रखी।
अर्थात यदि किसी प्राधिकारी के पास ध्वस्तीकरण की कानूनी शक्ति तो है, लेकिन उस शक्ति का वास्तविक उद्देश्य अवैध निर्माण हटाना न होकर किसी आरोपी व्यक्ति या उसके परिवार को अपराध के आरोप के कारण दंडित करना है, तो ऐसी कार्रवाई “कार्यपालिका के विवेक का छद्म उपयोग” और विधि-विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण शक्ति-प्रयोग के प्रश्न को जन्म दे सकती है।
इस निर्णय की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालय ने केवल यह नहीं देखा कि प्रशासन के पास ध्वस्तीकरण की शक्ति है या नहीं, बल्कि यह भी देखा कि उस शक्ति का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है। यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट के तुरंत बाद किसी व्यक्ति के मकान को निशाना बनाया जाता है, जबकि उसी क्षेत्र में समान प्रकार के अनेक निर्माण मौजूद हैं और उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होती, तो चुनिंदा कार्रवाई न्यायिक जांच का विषय बन सकती है।
न्यायालय ने इसी संदर्भ में कहा—“चुनिंदा आक्रोश चुनिंदा अन्याय को जन्म देता है”। अर्थात जब कानून का आक्रोश चुनिंदा हो जाता है तो न्याय भी चुनिंदा हो सकता है। इस दृष्टिकोण में अनुच्छेद 14 का समानता का सिद्धांत केवल कागज पर नहीं रहता, बल्कि प्रशासन के व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए—समान परिस्थितियों में समान कानून और समान कार्रवाई होनी चाहिए।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि घर केवल संपत्ति नहीं है। वह व्यक्ति और उसके परिवार की सुरक्षा, स्थिरता, गरिमा और जीवन से जुड़ा है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आश्रय के अधिकार और आजीविका के अधिकार के महत्व को ध्यान में रखते हुए किसी घर को हटाने की कार्रवाई में उसके मानवीय परिणामों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि अवैध निर्माण को वैध कर दिया गया है।
निर्णय का संतुलित सिद्धांत यही है कि अवैध निर्माण को कानून के अनुसार हटाया जा सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति को अपराध के आरोप के लिए घर गिराकर दंडित नहीं किया जा सकता। उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित ध्वस्तीकरण संबंधी सुरक्षा-उपायों, नोटिस, सुनवाई, कारणयुक्त आदेश तथा जहाँ कानून अनुमति देता है वहाँ शमन या नियमितीकरण की संभावना पर विचार करना इसी संतुलन का हिस्सा है।
इस निर्णय का एक अत्यंत व्यावहारिक पहलू यह है कि यदि ध्वस्तीकरण का वास्तविक और निकट खतरा हो तो नागरिक को हर स्थिति में पहले अपना घर गिरने का इंतजार करके ही उच्च न्यायालय आने की आवश्यकता नहीं है। यदि नोटिस, अधिकारियों की कार्रवाई और अन्य परिस्थितियों से ध्वस्तीकरण की वास्तविक एवं उचित आशंका उत्पन्न होती है, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत पूर्व-निवारक न्यायिक हस्तक्षेप का प्रश्न उठ सकता है।
इसी तरह न्यायालय ने उन मामलों में राज्य की भूमिका पर भी ध्यान दिलाया जहाँ कोई निर्माण वर्षों तक प्रशासन की जानकारी में बना रहा हो। केवल नागरिक को दोषी ठहराकर राज्य की प्रशासनिक मशीनरी की भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता; लंबे समय तक अधिकारियों की निष्क्रियता, लापरवाही अथवा संभावित मिलीभगत की भी जांच होनी चाहिए। इसका व्यापक संदेश यह है कि कानून नागरिक पर लागू होता है तो कानून लागू करने वाली प्रशासनिक व्यवस्था भी कानून के प्रति उतनी ही जवाबदेह है।
दोनों न्यायाधीशों के बीच अधिकांश मूल सिद्धांतों पर व्यापक सहमति रही—विशेषकर यह कि केवल आपराधिक आरोप के कारण किसी व्यक्ति के घर को दंड के रूप में नहीं गिराया जा सकता और उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित ध्वस्तीकरण संबंधी सुरक्षा-उपायों का पालन आवश्यक है।
मतभेद मुख्यतः न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन द्वारा दिए गए अतिरिक्त दो वर्ष के प्रतिबंध पर हुआ, जिसके अनुसार प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के बाद आरोपी के आवासीय घर को सामान्यतः दो वर्ष तक नगर निकाय के उल्लंघन के आधार पर ध्वस्त न किया जाए। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन इस अतिरिक्त व्यापक प्रतिबंध से सहमत नहीं हुए। इसी सीमित प्रश्न के कारण निर्णय को विभाजित मत के रूप में आगे तीसरे न्यायाधीश अथवा बड़ी पीठ के विचार के लिए जाने की स्थिति बनी। इसलिए दो वर्ष की रोक को पूरे निर्णय का सर्वमान्य और अंतिम बाध्यकारी सिद्धांत मानना उचित नहीं होगा।
इस निर्णय की वास्तविक और दीर्घकालिक महत्ता केवल दो वर्ष की रोक में नहीं, बल्कि इस सिद्धांत में है कि सरकार के पास शक्ति होना और उस शक्ति का वैध उद्देश्य से इस्तेमाल होना दो अलग बातें हैं। यदि ध्वस्तीकरण का वास्तविक उद्देश्य अवैध निर्माण हटाना है तो कानून अपना काम करेगा; लेकिन यदि कानून की आड़ में किसी आरोपी या उसके परिवार को दंडित करने का प्रयास है, तो न्यायालय उस कार्रवाई के पीछे के वास्तविक उद्देश्य की जांच कर सकता है।
यही वह बिंदु है जहाँ यह निर्णय सामान्य ध्वस्तीकरण विवाद से आगे जाकर संवैधानिक शासन, विधि का शासन, अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 21 और कार्यपालिका की जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।
आम नागरिक के लिए इस निर्णय का सीधा संदेश है—प्रथम सूचना रिपोर्ट किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करती और प्रथम सूचना रिपोर्ट किसी के घर को अपने-आप अपराध का दंड भुगतने योग्य नहीं बना देती। यदि निर्माण अवैध है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो सकती है, लेकिन कार्रवाई निष्पक्ष, समान, कारणयुक्त और वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। किसी अपराध का फैसला आपराधिक न्यायालय करेगी; कार्यपालिका अपने बुलडोजर को अदालत की जगह नहीं दे सकती।
इसी अर्थ में फ़ैमुद्दीन निर्णय एक महत्वपूर्ण संवैधानिक नज़ीर के रूप में सामने आता है—यह सरकार की वैध शक्ति को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसे कानून, समानता, संवैधानिक मर्यादा और उसके वास्तविक उद्देश्य के भीतर इस्तेमाल करने की याद दिलाता है। घर किसी व्यक्ति के अपराध का दंड नहीं है और कानून का शासन तभी सार्थक है जब राज्य की शक्ति भी उसी कानून के अधीन रहे जिसके पालन की अपेक्षा वह नागरिकों से करता है।
(महा प्रसाद अधिवक्ता हैं और लॉयर्स कलेक्टिव फॉर पीपल्स राइट्स (एलसीपीआर) के संयोजक हैं।)