मात्र चालीस वर्ष की वय में परिस्थितियों के वशीभूत होकर भारत देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री मंत्री राजीव गांधी बने थे। उनके इस पद पर पहुंचने की दास्तान संजय गांधी की अचानक दुर्घटना से प्रारंभ होती है। मां इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं और वे मस्त राजनीति से दूर अपनी सरकारी पायलट की नौकरी में संतुष्ट थे, जो उनकी अभिरुचि के अनुकूल थी।
छोटे भाई संजय गांधी युवा तुर्क मां के साथ राजनीति में सक्रिय थे। लेकिन कौन जानता था कि राजीव का पायलट के रुप में संतुष्ट जीवन राजनैतिक आपाधापियों में जाने वाला है।संजय के जाने के बाद मां के गहन दुख में करीबी राजनीतिज्ञों की सलाह पर राजीव को राजनीति में प्रवेश करना पड़ा। वे संजय की खाली संसदीय सीट अमेठी से सांसद बनते हैं और कांग्रेस महासचिव भी। सबसे महत्वपूर्ण वे मां का सहारा बनते हैं।
सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था राजीव अभी राजनीति की गहराईयों को समझने में ही लगे थे कि एक दिन उनकी मां के सीने को दो सिरफ़िरे अंगरक्षक छलनी कर देते हैं। वे गहरे शोक में डूब भी नहीं पाए थे, कुछ समझ पाते कि सांसदों द्वारा सर्वसम्मति से उन्हें देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाता है। इस दर्दनाक स्थिति में देश की जनता उन्हें आमचुनाव में अब तक के सबसे बड़े बहुमत से विजयी बनाती है जबकि उनकी पत्नी सोनिया जी कतई यह नहीं चाहती थीं।
मगर जनता के प्यार और हौसले से वे इन स्थितियों से उबरकर, दिल से देश के काम में लग जाते हैं। उनके वे काम जो उन्होंने शुरू किये, उनसे देश दुनिया में चमकदार भारत और प्रगतिशील भारत के रुप में उभरा और टेक्नोलॉजी में सम्पन्नता की ओर बढ़ा। इसमें माहिर भारतीय युवा पीढ़ी ने दुनिया भर में अपना परचम फहराया है।
जेन ज़ी वाले युवा आज भारत की शिक्षा के क्षेत्र की दुर्दशा से आक्रांत होकर विदेश से अपने देश को बचाने आ गए हैं। एक युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गांवों में नवोदय विद्यालयों की स्थापना कर ग्रामीण बच्चों को आगे आने के द्वार खोले। उन्होंने मतदान की उम्र 21वर्ष से घटाकर उन्हें 18 की। यह ऐसा अधिकार था जिससे बड़ी संख्या में युवा शक्ति की राजनीतिक समझ को विकसित करने का सुअवसर मिला तथा एक लोकतांत्रिक देश के समस्त अधिकारों का हक भी।
उन्हें भारत में कंप्यूटर और दूरसंचार क्रांति का जनक माना जाता है, देश को 21वीं सदी की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।स्थानीय निकायों को मजबूत करने के लिए पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिलाने में उनके प्रयास याद किए जाते हैं।
वे कहते थे कि शिक्षा को हमारे समाज में बराबरी का स्थान दिया जाता है। यह एक ऐसा उपकरण है जो हमारे पिछले हजारों सालों के सामाजिक व्यवस्था को एक बराबर के स्तर पर ला सकता है। अफ़सोस इस बात का है कि आज फासिस्ट ताकतों ने शिक्षा की संपूर्ण व्यवस्था का संचालन अपने हाथ में ले रखा है।
अपने एक संबोधन में उन्होंने कहा था “भारत एक प्राचीन देश, लेकिन एक युवा राष्ट्र है…मैं जवान हूं और मेरा भी एक सपना है। मेरा सपना है भारत को मजबूत, स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और दुनिया के सभी देशों में से प्रथम रैंक में लाना और मानव जाति की सेवा करना।” उन्हें देश की युवा शक्ति पर पूरा भरोसा था।
देश ने उनकी असामयिक मृत्यु के बाद बड़े उथल-पुथल देखें हैं लेकिन आज देश में एक बार फिर युवाशक्ति ने इस चुनौती को स्वीकारा है और देश में व्याप्त उन ताकतों को ललकारा है जिन्होंने देश को गुलामी के दौर में ला खड़ा किया है। खास बात ये है राजीव गांधी के पुत्र राहुल गांधी इन ताकतों के खिलाफ लड़ाई जारी रखें हुए हैं। वे प्रतिपक्ष के सजग और सतर्क नेता हैं तथा उन्हें विपक्ष और देश की जागरुक युवा पीढ़ी का भरपूर सहयोग मिल रहा है।
वे प्रधानमंत्री बने ना बनें देश की धारा बदलने नहीं देंगे, अपने पूर्वजों की परम्परा को आहत नहीं होने देंगे। यह खुद्दारी आज भारत के युवाओं में देखने मिल रही है। जो देश हित में एक नई इबारत लिखने वाले हैं जिनके प्रेरणा स्त्रोत अप्रत्यक्षत: देश के युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी ही हैं। जो युवाओं की राजनीतिक भागीदारी के पक्षधर थे।
(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट, टिप्पणीकार हैं।)