शिक्षा केन्द्र इलाहाबाद में “छात्रों की गूंज” कार्यक्रम में युवा शक्ति की समस्याओं को संवाद के ज़रिए समझने और युवाओं से अपार स्नेह मिलने के बाद प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी ने संघ के गढ़ पुणे में “छात्रों की गूंज” में भाग लिया। महिलाओं को शिक्षा के क्षेत्र में दाखिल करने के लिए कथित सनातनियों से अभूतपूर्व संघर्ष करने वाली सावित्री बाई फुले की नगरी में नारी शक्ति से यह संवाद मायने रखता है।
इन कार्यक्रमों में सरकार और संघ के लोगों ने व्यवधान डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पुणे वही क्षेत्र हैं जहां अंधविश्वासों से लोगों को दूर करने अभियान चलाने वाले डॉक्टर नरेन्द्र दाभोलकर को सुबह सैर पर भ्रमण करने जाते हुए कथित तौर संघ से जुड़े व्यक्तियों ने एक साजि़श के तहत मार डाला था।
यह ‘चालबाज संघी’ अन्ना हजारे का भी क्षेत्र है। लेकिन इनके विचारों से टकराने आज पुणे से बाहर अध्ययनरत अभिजीत दिपके हाज़िर हैं। उनकी काक्रोच जनता पार्टी शिक्षा के क्षेत्र में आई विसंगतियों से पिछले कई दिनों से संघर्ष जारी रखें हुए है। उनके नीट पेपर लीक मामले में एक केंद्रीय मंत्री का इस्तीफ़ा हो चुका है।
राहुल गांधी ने भी इलाहाबाद में गूंज के जरिए छात्र-छात्राओं से बातचीत कर अन्य अन्दरूनी समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित किया है।
पुणे के गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने लड़कियों के कार्य क्षेत्र में आने वाली उन तकलीफों को सुना जिनसे लोग अभी तक लगभग अपरिचित थे। उन्होंने उपस्थित लोगों, जिनमें बहुसंख्यक युवतियां थीं, को उन तमाम आंकड़ों की जानकारी दी जिसे सरकार छुपाती रही है वह आंख खोल देने वाली थी।
आज़ादी के बाद 2014 के बाद स्त्री अत्याचार, उनके सामाजिक, शासकीय और राजनैतिक शोषण की कारुणिक दास्तानों के बीच छात्राओं से लेकर नौकरी पेशा महिला और घरु महिला पर पिता, पति और भाई का शिकंजा तो आज भी है। इसके अलावा समाज भी उनके प्रति दोयम दर्जे का व्यवहार कर रहा है।अब तो नादान बच्चियों को भी शिकार बनाया जा रहा है।
माना जाता है उनका अपना कोई वजूद नहीं है। जबकि क्षमताओं में वे पुरुषों से आगे हैं जिन्हें अवसर मिला है या उन्होंने अपने साहस से मुकाम हासिल किया है।
पिछले दिनों जंतर-मंतर में जिस तरह छात्राओं और युवतियों ने अपनी मर्जी से उपस्थिति दर्ज़ कराई तथा जोशीले अंदाज में नारे बुलंद किए, जनगीत गाए और गालियों तक का इस्तेमाल किया। उससे यह ज़ाहिर हो गया था कि लड़कियां अब रुकने और झुकने वाली नहीं हैं, वे अपनी हसरतें पूरी करने बेताब हैं। यह पारिवारिक मर्यादा तोड़ना नहीं है बल्कि अपने संवैधानिक हक़ पाने की चाहत है जो उन्हें आमतौर पर प्राप्त नहीं थी।
स्मरण आता है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक प्रयोग किया गया था प्रियंका गांधी द्वारा “लड़की हूं लड़ सकती हूं।” बहुत सी महिलाओं को टिकट दिए थे। लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे दकियानूसी प्रदेश में वे असफल रहीं थीं।
आज वे जाग उठी हैं और हर आंदोलन में उनकी बढ़ती उपस्थिति आश्चर्य जनक है। कालेज और स्कूलों की छात्राएं भी खुलकर अपने अधिकारों के लिए मैदान में हैं। ये शहरों तक सीमित नहीं रहा है, गांव-गांव इनकी गूंज सुनाई दे रही है। देश की आधी ताकत अभी तक लड़की बचाओ-लड़की पढ़ाओ, लाड़ली बहना, नारीवंदन जैसी झूठ मूठ नारों के बीच झूलती रही है।अब वह सचेत हो रही है।
देश की राष्ट्रीय पदक विजेता पहलवानों के साथ, बिल्किस बानों और अन्य यौन हिंसा पीड़ित अपराधियों के साथ तथा मणिपुर की महिलाओं के प्रति सरकार का व्यवहार बता रहा है कि स्त्रियों के प्रति कितनी निकृष्टतम सोच है। बंगाल में ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के प्रति उनके उद्गार भी उनके अंतर्मन की बात बताते हैं।
ऐसे दुर्दांत समय में जब स्त्री का कोई नहीं है तब अपनी रक्षा खुद करने तैयार होना ही चाहिए। रक्षाबंधन का सूत्रपात इसलिए हुआ होगा कि भाई उसकी रक्षा करेगा। यह भी सदियों से नारी को कमज़ोर करता रहा है।
अब वह समर्थ बनने की राह पर चल पड़ी है, अपने मन की छुपी बात सार्वजनिक करने लगी है या कहें वह खामोशी तोड़ने लगी है। यह उसकी आधी जीत है। आगे लड़की हूं लड़ सकती हूं उसे मुकम्मल स्थान दिलायेगा। गूंज में हुए संवाद चीख-चीख कर विसंगतियों को उजागर कर रहे थे। ऐसे श्रेष्ठ कार्यक्रम होते रहने चाहिए।
कार्यक्रम में आज राजनैतिक और सामाजिक अपमान से लज्जित हुए बिना अपने भोजपुरी गीतों से ख़ामोशी तोड़ने वाली नेहा सिंह राठौर शामिल रहीं वे बधाई की पात्र हैं। उन्होंने महिलाओं को अपनी ताकत आप बनो का संदेश देकर गूंज को महत्वपूर्ण बना दिया।
कुल मिलाकर ये गूंज कार्यक्रम संघ की छाती पर मूंग दलने जैसे हैं क्योंकि वह नहीं चाहता है कि देश में प्रबुद्ध लोग हों और स्त्री जो घर की महत्वपूर्ण धुरी है वह अपनी अलग पहचान कायम करें। गूंज मनुस्मृति के खिलाफ हैं। युवाओं को अधिकार चाहिए, नारी को देवी नहीं बनना वह इंसान बनना चाहती है। उसे आज़ादी चाहिए।
(तस्वीर : वीडियो ग्रैब)
(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट, टिप्पणीकार हैं।)