अरुणाचल प्रदेश, जहां महिलाओं का चलता है सिक्का

28 अप्रैल, 2022 को सुबह गाड़ी चली तो पाँच मिनट में ही आलो कस्बा पार हो गया और दूर तक फैले खेतों के दर्शन हुये, अभी धान की रोपाई नहीं हुई थी, लेकिन महिला और पुरुष पाँव में रबर का लांग बूट चढ़ाये और सिर पर हैट बांधे खेतों को रोपनी के लिये तैयार करते नजर आ रहे थे। खेतों के साथ लगे पहाड़ों के निचले हिस्से में अनायास उगे केले के जंगल, उसके ऊपर अत्यधिक वर्षा वाले घनघोर वन और कुछ पहाड़ों के उन्नतांश पर बर्फ की छींटाकशी।

यही हाल बहुत फैल कर बह रही सियोम नदी के दूसरी ओर का भी था। नजारा कुछ ऐसा था कि देखने वाला बस उसमें खो जाये, लेकिन इन सबसे अलग गायों के बड़े-बड़े झुण्ड सड़क पर बैठ कर निर्लिप्त भाव से पगुरी कर रहे थे। मानो कह रहे हों कि ज्यादा हार्न-फार्न न बजाओ, रोड क्या हमसे पूछ कर बनाई गई थी, सूखी जमीन है इसलिये सबसे पहले हमारा अधिकार है और ज्यादा चूं-चपड़ न करो, यदि हमें कहीं खरोंच भी लग गई तो मेरी मालकिन मेरे होने वाले बच्चे के बच्चे का हर्जाना निकलवा लेगी, इसलिये चुपचाप गाड़ी सड़क के नीचे उतार कर ले जाओ।

इन्हीं नजारों में 2 घण्टे चलने के बाद कायिंग गाँव आ गया, यहाँ सुबह के नाश्ते से फारिग होने के बाद 100 रुपये में बहुत ही मीठा ढेर सारा केला खरीद लिया, जिसे हम पाँच दिनों तक खाते रहे। केला खरीदते समय कस्बे के एक सरकारी स्कूल में पिछले 25 सालों से हिन्दी पढ़ा रहे पटना के एक मास्टर जी से मुलाकात हो गई, ज्यादा बातचीत का वक्त नहीं था, लेकिन अरुणाचलियों के हिन्दी बोलने और समझने का राज समझ में आ गया। यहाँ से आगे सड़क कटाई के कामों में स्थानीय महिला और पुरुष दोनों लगे हुये थे, वहीं मशीन चलाने की जिम्मेदारी बीआरओ तथा झारखंड के मजदूर निभा रहे थे। जो सरकारी मुलाजिम हैं उनका जिक्र ही क्या, लेकिन झारखंड के मजूर 18000 रुपये में तो स्थानीय 15000 रुपये में अपना श्रम एक महीने के लिए बेच रहे थे।

12 बजने से पहले ही शियोमी जिले का मुख्यालय टाटो आ गया। यहाँ से एक रास्ता नदी किनारे-किनारे मेचुखा को तो दूसरा रास्ता नदी पार एक दूसरी घाटी मोनीगोंग को जाता है। दोपहर के भोजन के बाद पहाड़ की चढ़ाई शुरू हो गई। अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमोत्तर भाग के वनों की अपेक्षा पूर्वोत्तर के जंगल अत्यधिक घने हैं, चौड़ी सड़क के बनते ही इसका व्यावसायिक दोहन शुरू हो जायेगा।

दो-ढाई घण्टे की यात्रा के बाद हमारी मंजिल मेचुखा आ गई। विशाल घाटी नुमा एक कस्बाई शहर, बीच से इठलाती हुई बहती एक नदी, दायें-बायें की बर्फीली चोटियाँ बादलों से खेलती हुईं, नजारे देखें कि पाँच दिन के प्रवास के लिये अपने मेजबान को ढूंढें, दिल की इच्छाओं को दबाकर पूछते-पाछते आखिरकार मैडमात के आलीशान बंगले में पहुँच गये। निजता के मद्देनजर मेजबान का परिचय नहीं दे रहा हूँ।

मेल-मिलाप और कुछ पेट पूजा को तुरन्त निपटा, हम दोनों मित्र सियोम नदी की ओर चल पड़े। बर्फीली चोटियों और पहाड़ी जंगलों से बहुत सारे बड़े-बड़े नाले निकले हैं, जिनका आखिरी पड़ाव नदी है। ऐसे ही दो नालों के ऊपर बने पुल को पार करने के बाद सेना की छावनी आ गई। छावनी के बाद एक पगडण्डी नदी की ओर जाती है, जहाँ स्टेडियम जैसा कुछ बन रहा था। यहाँ काम करने वाली लड़कियाँ और महिलायें नदी के दूसरी ओर मेम्बा जनजाति के सबसे पुराने मूल मेचुखा गाँव से आती हैं, जिन्हें 350 रुपये मजदूरी मिलती है। सूरज डूबने वाला था, लिहाजा काम बन्द हो गया और सभी झूले के पुल से नदी पार अपने गाँव को चल पड़ीं। इनके गुजरने के बाद हम भी पुल पर आ गये। नदी चौड़ी होने के साथ गहरी भी थी और बहाव बहुत तेज था। पानी इतना साफ कि बीस फुट की ऊँचाई से तलहटी में बैठे पत्थरों के टुकड़े तक साफ दिखाई दे रहे थे।

मेचुखा जैसे दुर्गम कस्बे में, वो भी बरसात में दिल्ली से केवल घूमने के लिये आना अड़ोसी-पड़ोसी तो दूर मेजबान के रिश्तेदारों को भी हजम नहीं हो रहा था। जैसे ही हम लोग घूम-फिर के वापस पहुँचे एक-एक करके लोगों का जिरह के लिये आना शुरू हो गया। इसमें मुझे मजा भी आता है और इस परिस्थिति का इतना आदी हो गया हूँ कि सामने वाला कुछ पूछे उससे पहले अपने सवाल दागते रहो। सवाल भी ऐसे कि सामने वाले का सन्देह गहराने लगे, मसलन- क्या करते हैं, शिक्षा कितनी है, कितने बच्चे हैं, बच्चों के शिक्षा की स्थिति क्या है, आपके पिताजी के कितने बच्चे थे, यहाँ के मूल निवासी हैं, यदि नहीं तो कहाँ से और कब आये, खेती में क्या-क्या उगता है, सरकारी अस्पताल और स्कूल-कालेज की क्या दशा है, नदी कहाँ से निकलती है, आखरी गॉंव कितना दूर है, सीमा किन-किन दिशाओं में और कितनी दूर है, कस्बे की आबादी तथा धार्मिक स्थिति क्या है, इत्यादि।

सामने वाला इन सवालों में ही बौड़ियाने लगता है, इसके बाद बताऊँ कि मैं ‘प्रिंटिंग प्रेस में प्लेट, केमिकल और इंक बेचता हूँ’, तो उसे मेरे इस सीधे-साधे जवाब पर कतई भरोसा नहीं होता है, वह प्रवास के आखिरी दिन तक अपने नये-नये प्रश्नों के साथ मुझे टटोलने में लगा रहता है। ऊपर से मेरा चेहरा और पहनावा सैलानी की जगह कोई सरकारी मुलाजिम होने की चुगली करता है।

मेचुखा में ‘मेब्बा’ और ‘आदि’ दो जनजातियों के लोग निवास करते हैं। सियोम नदी के उस पार  मेब्बा लोगों की बस्तियां हैं तो इस पार आदि लोग निवास करते हैं। आदि, मेब्बाओं की अपेक्षा अधिक समृद्ध हैं। परन्तु, आदि यहाँ के मूल निवासी नहीं हैं, सम्भवतः चार-पाँच पीढ़ी पहले मोनीगोंग से यहाँ आ कर बसना शुरु हुये हैं, जिसके कारण 1995 तक एक सामूहिक काटाकूटी (नरसंहार) का दौर भी चला था। रात के अंधेरे में एक व्यक्ति दूसरे कबीले के छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्ग और महिला सभी को काट डालता था, इस व्यक्ति को अपने कबीले में योद्धाओं जैसा सम्मान दिया जाता था। पूर्वोत्तर भारत की लोकगाथाओं में इस तरह के सैकड़ों लोगों का जिक्र आता है, जो यहाँ के जनमानस में बहुत ही सम्मानित हैं।

खैर काटाकूटी के दौर गुजरे तीन दशक होने को आये हैं, लेकिन जमीन को लेकर असन्तोष अभी भी बरकरार है। जब इस तरह की कोई बात उठती है तो संख्या में थोड़े कम आदि जनजाति वाले मोनीगोंग से अपने साथियों को बुलवा लेते हैं, जिन्हें यहाँ तक पहुँचने में 6-7 घण्टे लगते हैं। लगभग इतना ही समय मेम्बा लोगों को अपने फैले हुए गाँवों से एकत्र हो झूले वाले पुल से नदी पार कर पहुँचने में लगता है। लेकिन, शिक्षा धीरे-धीरे दोनों समुदायों को करीब ला रही है, किन्तु दसवीं के आगे पढ़ने के लिए कोई शिक्षण संस्था नहीं है।

मोनीगोंग, जहाँ से आदि लोग मेचुखा में आये हैं, मेचुखा से लगभग 120 किलोमीटर दूर तिब्बती बॉर्डर से लगा एक गाँव है। मेम्बा और आदि लोग भी मेचुखा या मोनीगोंग के मूल निवासी नहीं हैं, ये लोग भी तिब्बत से आये हैं। कुछ 1956 से पहले, तो कुछ सैकड़ों या हजारों साल पहले विस्थापित हुये थे, लेकिन शुरुआती विस्थापन कब और क्यों हुआ, इस सवाल का जवाब ऊपरी असम से लेकर अरुणाचल तक मुझे किसी से नहीं मिला, बस सबके जेहन में है कि हमारे पुरखे-पुरनियां तिब्बत से आये थे।

बहरहाल मेरे पास हिमालय के उस पार से विस्थापन कब से और क्यों हुआ, इसका एक ठीक-ठाक जवाब है-

भूगर्भीय समय पर नजर रखने वाली एक अधिकृत संस्था इंटरनेशनल कमीशन ऑन स्ट्रैट्रीग्राफी ने जुलाई 2018 में ‘द मेघालयन’ नामक एक युग को प्रस्तुत किया, जो ईसा पूर्व 2200 से आज तक जारी है और इसकी शुरुआत एक बहुत भीषण सूखे से होती है, जिसने मिस्र, मेसोपोटामिया, चीन और हिंदुस्तान की सभ्यताओं को कुचल कर रख दिया था। यह भीषण सूखा सम्भवतः महासागरों और वातावरण में आये बदलावों की वजह से पड़ा था। हिमालय के उस पार से पलायन की शुरुआत आज से लगभग 4200 साल पहले शुरु हुये इसी सूखे से होती है, फिर आवाजाही का दौर 1956 भारत-चीन तनाव तक चला था।

कायदे से इस रिपोर्ट के आने के बाद सरकार को हिमालय के प्रचलित गिरिद्वारों से डीएनए सैम्पल की खोज और जाँच करनी चाहिए थी, लेकिन उसे खलनायक सिनेमा के फूहड़ गाने ‘चोली के पीछे क्या है’ की तर्ज पर ‘मस्जिद के नीचे क्या है’ पर गुनगुनाने में मजा आ रहा है!

मेचुखा कस्बे में एक निर्माणाधीन अस्पताल है, तो वहीं शराब की अनगिनत दुकानें हैं। अन्य राज्यों की अपेक्षा अरुणाचल में शराब आधे दाम पर बिकती है।

दसवीं तक विद्यालय होने के कारण आबादी पर थोड़ा नियंत्रण लगा है और इस पीढ़ी के लोग 3-4 बच्चे पैदा कर रहे हैं, अन्यथा पिछली पीढ़ी वालों में 8-10 बच्चे होना आम बात थी। कस्बे के जितने भी परिवारों से मुलाकात हुई, उसमें महिला की उम्र अपने पति से अधिक थी। खुद हमारी मेजबान मैडम अपने पति से दो साल बड़ी हैं और अपने शादी का प्रस्ताव दसवीं में पढ़ते समय अपने नाबालिग हम सफर के सामने रखा था, फिर महोदय 6 महीना अपने होने वाले ससुराल में खटकर अपनी योग्यता को साबित किये। शादी में हुजूर के परिवार ने 5 मिथुन भेंट दिया, जो भोज में आये लोगों के पेट में हजम हुआ।

हमारे प्रवास के दौरान कस्बे में एक शादी थी, जहाँ 10 मिथुन और 30 सुअर काटे गये थे। इन जनजातीय इलाकों में बिना मिथुन दिये शादी नहीं होती है। मिथुन दिखने में गाय और कुछ-कुछ भैंस जैसा होता है, लेकिन इसे पाला नहीं जाता है, ये जंगलों में घूमते रहते हैं। नमक चटा कर इन्हें पालतू बना लेते हैं और पहचान के लिये अलग-अलग आकार में कान काट दिया जाता है। काफी लोग घर की चाहरदीवारी के पीछे सुअर पालते हैं, तीन महीने नये के नवजात सुअर की कीमत यहाँ 8000 रुपये है। हमारे आगमन के दस दिन पहले मेजबान मैडम के तीन सुअरियों ने 29 बच्चों को जन्म दिया था, जो जनजातियों के आर्थिक समृद्धि का एक स्रोत भी है। भेड़, बकरी और गड़ेरिया संस्कृति के अभाव में इस संभाग के फौजी भी इन लजीज मांस का सेवन करते हैं, लेकिन इस बात को किसी ने खुल कर स्वीकार नहीं किया।

पारम्परिक आयोजनों में शरीक होने वाले अपने साथ एक चाकू रखते हैं, जिससे परोसे गये 3-4 किलो के मांस के टुकड़े को काट-काट कर खाया जा सके। प्रकृति ने यहाँ के लोगों का हाजमा दुरुस्त रखने के लिए एक नायाब औषधि ‘जायर’ दिया है, जो पतली टहनियों में मटर जितना बड़ा और गहरे हरे रंग का होता है। इसकी खुशबू बहुत तेज और शानदार होती है, यहाँ के लोग इसका प्रयोग मसाले की तरह करते हैं।

मेचुखा में सुबह का उजाला दिल्ली की अपेक्षा एक घंटा 25 मिनट पहले होना शुरु हो जाता है। मेजबान ने मेरे पढ़ने-लिखने का इंतजाम कर दिया था, लिहाजा उजाला होते ही मैं अपने काम में लग गया। दोपहर बारह बजे हम दोनों मित्र कस्बे के पास में एक पहाड़ी पर बने नये गोम्पा की ओर चल पड़े। गोम्पा के पीछे और उससे लगी एक काफी ऊंची पहाड़ी है, जहाँ फौज के बंकर बन रहे हैं, लेकिन काम बन्द है। बंकर सम्भवतः वायु सेना की हवाई पट्टी की सुरक्षा के लिये बनाये जा रहे हैं। धीरज ने अपनी सेहत के मद्देनजर नीचे रहना मुनासिब समझा।

जब मैं ऊपर पहुँचा तो पता चला कि एक कच्ची सड़क से भी ऊपर आ सकते हैं। यहाँ से पूरी घाटी के चप्पे-चप्पे का नजारा हो रहा था। घाटी के पश्चिमोत्तर दिशा में लगभग 12 किलोमीटर दूर एक ऊंचे पहाड़ी पर एक और आलीशान गोम्पा, गोम्पा से कुछ दूर आगे घाटी का सम्भवतः आखिरी छोटा सा गाँव थरगेलिंग, गाँव से नीचे नदी की ओर एक गुरुद्वारा, गुरुद्वारे के ऊपर बर्फीली चोटियाँ, शायद वहीं कहीं अपने देश की आखिरी सीमा है।

मेचुखा, नदी की तरफ ढलाँव लिये हुये एक बहुत बड़ा लगभग समतल पर वलयकार भूभाग है, जिसके पश्चिमोत्तर दिशा से लेकर दक्षिण तक बर्फीली चोटियाँ और बाकी दिशाओं में देवदार के जंगलों से लदे ऊँचे-ऊँचे पहाड़, साथ में दायें-बायें घूम कर बहती एक औसत दर्जे की नदी जिसके पानी के स्रोत यही बर्फीले पहाड़ और जंगल हैं। कम दूरी में एक नदी का बनना यही मेचुखा घाटी की खासियत है, जो मेम्बा भाषा में इसके नाम को सार्थक करती है, जिसका मतलब होता है -‘चिकित्सकीय गुण वाली बर्फीली नदी’।

घाटी में नदी को पैदल पार करने के लिये कई झूले वाले पुल बनाये गये हैं। मेरी गिद्ध वाली आँख ने उनमें से चार पुल ढूंढ निकाले और मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि घाटी को सड़क की अपेक्षा इन पुलों के द्वारा घूमना बहुत आसान है, क्योंकि सड़क नदी के साथ बहुत दायें-बायें घूमकर किसी मंजिल को पहुँचाती प्रतीत हो रही थी।

पहाड़ी से उतरने के बाद हम दोनों घूमते-घामते एक अत्यंत निर्जन इलाके में स्थित उपभोक्तावाद संस्कृति से उपजे कचरे से बिजली बनाने के ‘सफेद हाथी’ के पास पहुँचे (देखने में संयंत्र बिजली बनाने का ही प्रतीत हो रहा था)। बिल्डिंग के खिड़की-दरवाजे तो दूर संयंत्र ही लँगड़ा गई थी। कोई मिलता तो पूछते भइया यह सरकारी है या पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल और इसने किन-किन लोगों को कृतार्थ किया है!

कस्बे के बहुत सारे परिवारों ने तथागत को छोड़कर ईसाइयत का दामन थामा है, जिसमें मोनीगोंग से आये आदि जनजाति के लोग बड़ी संख्या में हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो यह कहते हैं कि इस वादी में रहना ही हमारे जीस्त का मुकद्दर है। ऐसे ही एक व्यक्ति के खेत में मुझे ‘मेमो’ साग दिख गया। इसका स्वाद कुछ-कुछ हरे प्याज के पत्ते की तरह होता है, जिसको लगभग 1900 मीटर की ऊँचाई पर उगाया जा सकता है और आलू के साथ बने इसके भुजिये का जवाब नहीं है। खेती और मजदूरी परिवार के आय के स्रोत हैं।

खेत में खड़ी गेहूं की फसल को पकने में अभी बीस दिन की देर है, तो वहीं गोभी और आलू तैयार हो गये हैं। इन सबके बाद धान रोपने की तैयारी शुरु होगी। सुधीजन, धान और गेहूं के बीच में यहाँ मंडुवा भी उगाई जाती है। यहाँ तक पहुँचते-पहुँचते रसायनिक खाद बहुत महँगा हो जाता है, लिहाजा गोबर और सड़ी पत्तियों का उपयोग खाद की तरह किया जाता है।

खाने में मडुवे की रोटी और मेमो का साग तथा रात्रि विश्राम के अनुरोध को अस्वीकार करके हम लोग मिलते रहने के वादे के साथ विदा हुये, हमारे साथ ढेर सारा मेमो साग था, जिसे रात के खाने में उपयोग किया गया।

7

अगले दिन रविवार को दोनों मित्र 12-13 किलोमीटर दूर 400 साल पुराने महायान सम्प्रदाय के श्समतेन योंगचा मठ के लिये निकले तो वहीं हमारे मेजबान अपने तीन बच्चों के साथ चर्च के लिए रवाना हुये। तीन झूले के पुल और दलदली जमीन को लांघते हुये लगभग ढाई घण्टे की यात्रा के बाद पहाड़ी पर बने तिब्बतीय मॉडल के मठ द्वार पर हमने दस्तक दे दी, लेकिन तथागत बुद्ध का अभी पुर्नजन्म लंबित है और उनके अनुयायी लामा लोग शायद कस्बे में कहीं पेट पूजा कर रहे थे, निर्जनता ऐसी थी कि आदमी और जानवर तो दूर परिन्दे भी गायब थे।

 वापसी के लिये जैसे ही मुड़े, बादलों ने मेहरबानी शुरु कर दी। चलते समय मौसम ठीक था, इसलिये बचाव का कोई इंतजाम नहीं किया गया था। बरसात हो रही थी, लिहाजा पगडंडियों वाले रास्ते की जगह सड़क मार्ग को अपनाया गया। पिच रोड इतनी बेहतरीन ढंग से बनी हुई थी कि दबाने से दब जाये और जोर से रगेद दें तो नीचे से मिट्टी निकल आये! 

साथी ठहरे मोदी भक्त और साथ में पार्टी के प्रचारक। केन्द्र और राज्य में इन्हीं की पार्टी की सरकार, बार-बार दुहाई देने लगे कि अभी इसके ऊपर कंकरीट की ढलाई की जायेगी! साहिबान इसे कहते हैं अंधभक्ति। जब दिमाग गलत को सही ठहराने के लिये तथ्य और तर्क ढूँढने लगे, तो समझिए कि आपने अफीम चाट लिया है या चटा दिया गया है।

खैर एक घण्टा तर होने के बाद आबादी के इलाके में पहुँचे तो सात सौ रुपये में दो छाता खरीदा गया, जो दिल्ली में अधिक से अधिक 150 रुपये में एक मिल जाता।

दो मई को मित्र धीरज ने कहीं चलने से मना कर दिया, बहुत मान-मनौव्वल के बाद साहब खेत वाले सज्जन के यहाँ चलने को राजी हुये। चल ऐसे रहे थे कि जैसे बवासीर का कोई गम्भीर मरीज टांग फैलाकर बहुत धीरे-धीरे कदम बढ़ता है, पिछले दिन का 24 किलोमीटर चलना और भीगना साहब को बहुत भारी पड़ गया था।

खेत वाले परिवार के साथ चाय पीते समय एक बात का खुलासा हुआ कि यहाँ के स्थानीय चुनाव में एक वोट की कीमत तीन लाख रुपये हो सकती है, जो लेने वाले नौजवान दम्पति को जमीन के शक्ल में दी गई थी और दम्पति भी साथ बैठे हुए थे। दोनों ने घर वालों की मर्जी के बगैर शादी किया था, लड़का बीआरओ में 700 रुपये में दिहाड़ी मजदूरी करता है और उम्र में थोड़ी बड़ी महिला को फौज की कैंटीन में खाना बनाने के 350 रुपये रोजाना मिलते हैं, लेकिन 25 साल की उम्र में ही दोनों तीन बच्चों के मां-बाप बन गये हैं।

चुनाव में तीन लाख रुपये की जमीन देने वाले को मैं बहुत करीब से जानता हूँ, साहब इतने सज्जन पुरुष हैं कि शराब को छूना पाप समझते हैं, लेकिन लोगों को पिलाकर मस्त रखते हैं मतलब कस्बे में एक मदिरालय के मालिक हैं।

सुधीजन, एक और राज की बात बताता हूँ। आलो से मेचुखा के रास्ते में कुछ ऐसे ठिकाने हैं जहाँ डीजल 70 रुपये/लीटर मिलता है, जिसे बेंचने वाला 20 रुपये/लीटर के मुनाफे पर बेचता है, बिना किसी मिलावट और घटतौली के, है न आश्चर्य की बात। बस इतना समझिये कि यह सड़क का कमाल है! 

अब इस दास्तान को विराम देने का वक्त आ गया है, लिहाजा अगले दिन सुबह 5:30 बजे की गाड़ी में दो सीट बुक करा लिया गया। इस बार नदी की दिशा में चलते हुये गुवाहाटी फिर दिल्ली।

समाप्त।

(सुरेंद्र विश्वकर्मा का संस्मरण।)

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