शाकाहार-मांसाहार की बहस बेतुकी है। ऐसी बेमतलब बहसें आमतौर पर देश के हिंदी-भाषी राज्यों के कुछ खास वर्ण-वर्ग के अपेक्षाकृत समृद्ध, कर्मकांड को पसंद करने वाले और शारीरिक श्रम से दूर रहने वाले लोग ही चलाते हैं। मकसद होता है, अपने सामाजिक-आर्थिक हितों का संरक्षण और आम लोगों के बीच अवैज्ञानिक, अतार्किक और मूर्खतापूर्ण मान्यताओं का विस्तार करना! आमतौर पर ऐसे लोगों का पेट हमेशा भरा होता है। इनके लिए भरण-पोषण जैसी जीवन की बुनियादी चुनौतियां नहीं होती हैं!
इसलिये ये लोग भूख, गरीबी, असमानता, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी और पर्यावरण-विनाश जैसे मुद्दों पर बहस की बजाय कभी खान-पान पर, कभी पहनावे पर तो कभी ‘अच्छा धर्म-बुरा धर्म’, कभी ‘पुण्यकर्म-धत्कर्म’ पर बहस करना पसंद करते हैं!
कोई शाकाहारी या मांसाहारी है, इसका सम्बन्ध भोज्य पदार्थ की सहज उपलब्धता से जुड़ा है। इसी आधार पर लोगों की अपनी पसंद-नापसंद भी तय हो जाती है। किसी धर्म या समाज की नैतिकता से ये चीजें तय नहीं होतीं! इसलिए शाकाहार को किसी सामाजिक-धार्मिक नैतिकता या ‘शुद्ध-अशुद्ध’ के चश्मे से देखने का कोई आधार नहीं है! इतिहास, समाजशास्त्र और और मानवविज्ञान भी इसी बात की तस्दीक करते हैं।
भिन्न सर्वेक्षणों की रोशनी में जानने की कोशिश करें तो इस समय दुनिया में तकरीबन 90 फीसदी आबादी के मांसाहारी होने का अनुमानित आंकड़ा मिल रहा है। मांसाहारियों की इस आबादी में हर धर्म, समाज, देश और इलाके के लोग शामिल हैं। इनमें अगर इथोपिया, सोमालिया या सूडान के अति-पिछड़े और विपन्न इलाकों के लोग हैं तो यूरोप, एशिया, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के अपेक्षाकृत विकसित समाजों और क्षेत्रों की आबादी भी शामिल है।
यूपी, राजस्थान और मध्यप्रदेश आदि में ब्राह्मण समुदाय के ज्यादातर लोग शाकाहारी माने जाते हैं। कृषिकर्म से जुडे कुछ पिछड़े वर्गों में हाल तक शाकाहार ही ज्यादा था! अब मांसाहार भी चलन में आ गया है। लेकिन बिहार या झारखंड के मिथिलांचल में ‘उच्चवर्णीय हिंदू’ भी मांसाहार, खासतौर पर मछली उसी तरह खाता है, जैसे आम बंगाली खाता है। पूरे देश का परिदृश्य देखें तो यहां के लोगों में भी मांसाहारियों की आबादी 80 फीसदी या इससे कुछ अधिक बताई गई है। यह सर्वेक्षण और अनुमान आधारित आंकड़े हैं।
हमारा मानना है कि भारत जैसे देश की राष्ट्रीय जनगणना में लोगों के खान-पान सम्बन्धी आदतों के भी आंकड़े लिये जाने चाहिए। अभी इस तरह के जो भी आंकड़े उपलब्ध कराये जाते हैं, वे आमतौर पर निजी या शासकीय क्षेत्र द्वारा कराये विभिन्न सर्वेक्षणों पर आधारित हैं या अनुमानित हैं। यह सिर्फ ‘फूड-हैबिट्स’ की बात नहीं है, समाज के आर्थिक और सामुदायिक उन्नयन के लिए जरूरी अन्य आंकड़ों का भी हमारे यहां अभाव है।
कुछ ही समय पहले हमारे देश की सरकार ने संसद से सचिवालय तक हर जगह ऐलान किया कि 2027 की जनगणना में सभी जातियों की भी गणना कराई जायेगी ताकि उनके ठोस आंकड़े उपलब्ध हो सकें!
सरकारी ऐलान के बावजूद सभी समुदाय और जाति के लोगों के जातिवार आंकड़े भी मौजूदा जनगणना में वैज्ञानिक ढंग से नहीं लिये जा रहे हैं! इसलिए 2011-12 के सामाजिक-आर्थिक जातिवार सर्वेक्षण की तरह ही 2027 में भी जाति-सम्बन्धी आंकडों की बिल्कुल अधूरी, उलझी और भ्रामक तस्वीर सामने आयेगी।
पर जनगणना के इस ‘शासकीय फरेब’ पर इस वक्त देश का सिर्फ राजनीतिक हलका ही नहीं, विद्वत जन, सिविल सोसायटी, यहां तक कि ‘सामाजिक-लोकतंत्रवादी’ और कथित लिबरल्स भी बिल्कुल मौन धारण किये हुए हैं! ‘डेटाशास्त्र’ के तमाम ‘तकनीकी विशेषज्ञ और पंडित’ भी इस पर खामोश हैं।
भारतीय जनगणना-2027 के 40 सवालों में ‘अनाजों के उपयोग’ पर तो एक सवाल पूछा जा रहा है पर मांसाहार और शाकाहार पर कोई सवाल ही नहीं है! फिर इसके अद्यतन आंकड़े कहां से मिलेंगे? आखिर हमारे समाज और सत्ता को संचालित करने वाले अपने समाज और देश के सच को जानने से इतना परहेज क्यों करते हैं? उन्हें क्या डर सताता है?
वे सुबह से रात तक अपने समाज, धर्म, वर्ण और आचार-विचार की महिमा पर भाषण करते हैं, तरह-तरह की कथा कहते या सुनते हैं और लाउडस्पीकर लगाकर अपने-अपने कथित धर्मों का गुणगान भी करते हैं! पर यह कोई रहस्य नहीं कि देश की आबादी के जरूरी पहलुओं को लेकर ठोस आंकड़ों के आने से वे क्यों बिदकते हैं? ठोस आंकडों के होने से लोगों के सरोकार और प्राथमिकता में भी बदलाव आता है।
भारत की आर्थिक तरक्की में बहुत बड़ी बाधा सही आंकड़ों की और गंभीर शोध-कार्य की कमी है। कृषि और उपभोक्ता क्षेत्र में योजना-निरूपण और क्रियान्वयन आदि के बड़े नीतिगत फैसले के लिए, उपभोग, उत्पादन और उत्पादकता के ठोस आंकड़ों की जरूरत होती है। इसके बाद ही उत्पादन और वितरण के बारे में सही फैसले लिये जा सकते हैं!
किस इलाके की आबादी के खान-पान की क्या खास विशिष्टता है, किस पदार्थ की मांग ज्यादा है और उसके उत्पादन की अद्यतन क्या स्थिति है; इसे जाने बगैर सही फैसले कैसे हो सकते हैं? कुपोषण की कहां क्या स्थिति है? लोगों को सस्ते दर पर प्रोटीन युक्त खान-पान कहां से और कैसे उपलब्ध हो सकता है? इसके लिए भी आंकड़ों की जरूरत है। ऐसे हर आंकड़े के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की सम्बद्ध संस्थाओं पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है।
कई दशक पहले ही दक्षिण भारतीय राज्यों, खासतौर पर कर्नाटक, केरल, आंध्र और तमिलनाडु की विभिन्न सरकारों ने इस पहलू पर खासतौर पर गौर किया और कुछ खास-खास योजनाओं के निर्धारण के लिए जरूरी आंकड़े इकट्ठे किये। केरल में 1968-69 के ‘जातिवार सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण’ के आंकड़ों ने सूबे के योजना-निर्धारण की प्रक्रिया को ठोस वैज्ञानिक आधार दिया। आजादी के बाद केरल पहला राज्य बना, जिसकी निर्वाचित सरकार ने राज्य में ऐसा सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कराया, जिसमें जातिवार गणना भी शामिल थी।
इससे जमीन-जायदाद और मिल्कियत के सारे तथ्य भी सामने आये। इसका इतना जबर्दस्त असर पड़ा कि भूमि-सुधार से सहकारिता सुधार के अनेक बड़े फैसले हुए और समूचे कृषि क्षेत्र की तस्वीर ही बदल गई। रबर, नारियल, चावल, मसाले और चाय-काॅफी के उत्पादन में अकल्पनीय वृद्धि दर्ज होने लगी। ईमानदार और वैज्ञानिक ढंग से कराये शासकीय सर्वेक्षणों और ठोस आंकड़ों के बल पर ही केरल ने देश के एक बेहाल राज्य से सबसे विकसित राज्य बनने का रास्ता तैयार किया। इसमें निश्चय ही ईएमएस नंबूदरिपाद और सी अच्युत मेनन की अगुवाई वाली दोनों सरकारों की ऐतिहासिक भूमिका रही।
देश में मांसाहारी खाद्य पदार्थ के उत्पादन और प्रसंस्करण में आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे प्रदेश लंबे समय से महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं। भारत में अंडे के उत्पादन में आंध्रप्रदेश आज भी अव्वल है। पूरे देश की तकरीबन 18:38% मांग वह अकेले ही पूरी करता है। कृषि उत्पादन के साथ मांसाहारी खाद्य उत्पादों के प्रसंस्करण और उत्पादन के क्षेत्र में इन राज्यों की कामयाबी ठोस जरूरतों और योजनाओं के आधार पर मिली है। अगर धर्म और वर्ण के चश्मे से इस तरह के उत्पादन क्षेत्र को देखा गया होता तो छोटे और लघु उद्योगों ( एमएसएमई) का यहां इतना उल्लेखनीय विस्तार नहीं हो पाता।
हिंदी भाषी ज्यादातर राज्यों के औद्योगिक और अन्य विकास कार्यक्रमों में भले ही इधर कुछ प्रगति दिखती हो लेकिन जरूरत, संभावना और उत्पादों के चयन के मामले में इन राज्यों की समस्याएं बरकरार हैं। इनके पीछे कहीं न कहीं ‘थोपी हुई गैरजरूरी धार्मिकता'(इसमें मीट शाॅप और नॉन-वेजिटेरियन ढाबों और रेस्टोरेंट पर लगाई जाने वाली बंदिशें भी शामिल हैं) से लोगों की खान-पान की आदतों को जबरन बदलने की कोशिश हो रही है।
ऐसा करने से येन-केन-प्रकारेण कृषि उत्पादन बढ़ाने या बड़े पैमाने पर आयात करने का दबाव भी बढ़ता है। हाल के वर्ष में फलों, सब्जियों और अन्य खाद्यान्नों की उत्पादन-गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई है। यह संयोग नहीं कि पनीर से पपीता और दालों से सब्जियों में मिलावट और जहरीले छिड़काव का आज सबसे बड़ा इलाका उत्तर और मध्य के प्रदेश ही बने हुए हैं! यूपी, बिहार और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों पर कृषि उत्पादन बढाने का दबाव हमेशा रहता है।
लेकिन मछली-उत्पादन, अंडा उत्पादन और अन्य मांस-उत्पादों के क्षेत्र में ज्यादा बेहतर प्रदर्शन करके ये राज्य अपनी उत्पादन सम्बन्धी जरूरतों और संभावनाओं को वैविध्यपूर्ण बना सकते हैं। यूपी आदि में मांस उत्पादन-प्रसंस्करण की बडी-बडी यूनिटें स्थानीय खपत की बजाय मांस निर्यात के व्यापार में लगी हैं। एक आंकड़े में बताया गया है कि देश से जितना भी बफैलो-मीट की सप्लाई पश्चिम एशिया-गल्फ और कुछ अन्य दक्षिण एशियाई देशों को होती है, उसका 45 से 50% हिस्सा अकेले यूपी से जाता है।
लेकिन उसी यूपी में सरकार और सत्ताधारी संरचना के इर्द-गिर्द के संगठनों की तरफ से विभिन्न धर्म-जाति के गरीब मजदूरों और सामान्य लोगों को सस्ते रेट पर नाॅनवेज थाली उपलब्ध कराने वाले ढाबों और रेस्टोरेंट आदि जैसे देसी अड्डों पर आये दिन हमले कराये जा रहे हैं ताकि वे इस बिजनेस में न टिक सकें! उन्हें मीट-मुरगा की जगह सिर्फ रोटी-दाल-सब्जी या परांठे-दही बेचने के लिए मजबूर किया जा रहा है! क्या गरीबों की प्रोटीन सम्बन्धी जरूरत इससे पूरी हो सकेगी?
क्या हमारे उत्तर-भारतीय खास मिजाज के ये सत्तापोषित अमीरजादे अपने आस-पास के गरीब श्रमिकों या मेहनतकश लोगों को कुपोषण का शिकार बनाकर रखना चाहते हैं ताकि वे सिर्फ उनकी ‘सेवा’ कर सकें और 50-60 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते लाचार होकर मर जायें! इसलिए खान-पान या शाकाहार-मांसाहार का मसला सिर्फ हमारे जैसे समाज के लिए ही नहीं, समूची दुनिया के लिए एक बेमतलब मुद्दा है।
असल मुद्दा समूची आबादी को अच्छा-स्वास्थ्यवर्धक भोजन उपलब्ध कराना। अच्छी शिक्षा, बेहतर रोजगार और उत्तम स्वास्थ्य सेवा मुहैय्या कराना! अगर कोई लोकतांत्रिक देश यह जरूरी दायित्व नहीं निभा रहा है और इनकी जगह सिर्फ शाकाहार-मांसाहार और धर्म-जाति के विवादों को ही उछालने में लगा रहता है तो वह कुछ और हो सकता है पर निश्चय ही वह सही लोकतंत्र नहीं हो सकता!
(उर्मिलेश प्रिंट और टीवी मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं और यूट्यूब चैनल UrmileshOfficial भी चलाते हैं।)