आपका वोट का अधिकार आपके दादा के कागज पर क्यों टिका रहे?

चुनाव में वोट का अधिकार औऱ कानून का पदानुक्रम:

सिद्धांत कहता है : नियम कानून से ऊपर नहीं, और कानून संविधान से ऊपर नहीं।

1. संविधान – नींव

अनुच्छेद 325: एक निर्वाचन क्षेत्र,एक ही वोटर लिस्ट- “धर्म, मूलवंश,जाति या लिंग के आधार पर कोई व्यक्ति किसी विशेष निर्वाचक नामावली में शामिल होने के लिए अपात्र नहीं होगा।”

इसका अर्थ है : किसी को दलित, मुस्लिम,महिला या किसी जाति के आधार पर वोट के अधिकार से नहीं रोका जा सकता।

अनुच्छेद 326: वयस्क मताधिकार की आत्मा-  “लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे।” 

अर्थ: हर व्यक्ति जो -भारत का नागरिक है,18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है (61वां संशोधन 1988 से पहले 21 वर्ष थी),पागल,अपराध या भ्रष्ट आचरण के कारण कानून द्वारा अयोग्य घोषित नहीं है,

वह वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने का हकदार है।

अनुच्छेद 325 और 326 का संबंध: 325 कहता है सबके लिए एक ही समान लिस्ट होगी, 326 कहता है हर वयस्क नागरिक का नाम उस लिस्ट में होगा।

2. संसद का कानून – रिप्रेजेन्टेशन ऑफ़ पीपल एक्ट 1950 की धारा 19- 

संविधान सिद्धांत देता है,कानून उसकी प्रक्रिया तय करता है। धारा 19: पंजीकरण की शर्तें-प्रत्येक व्यक्ति जो –

अर्हता की तारीख को 18 वर्ष से कम आयु का नहीं है,और किसी निर्वाचन-क्षेत्र में सामान्यतया निवासी है,उस निर्वाचन- क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में पंजीकृत होने का हकदार होगा।”

अगर सीधे शब्दों में कहें तो योग्यता सिर्फ तीन है -भारतीय नागरिकता,18 वर्ष की आयु,और उस क्षेत्र में सामान्य निवास। धारा 19 में कहीं नहीं लिखा कि “पिता का नाम वोटर लिस्ट में होना चाहिए” या “दादा का नाम 2003 की लिस्ट में होना चाहिए”।

SIR विवाद से संबंध: जब Form-6 में “पूर्वजों का नाम 2003 की लिस्ट में दिखाओ” जैसी शर्त लगती है,तो एक ही बूथ पर दो 18 साल के युवाओं के लिए दो अलग नियम बन जाते हैं -एक जिसका पिता वोटर है उसका नाम तुरंत जुड़ेगा,दूसरा जिसे दादा-परदादा के कागज ढूंढने पड़ेंगे। यह अनुच्छेद 325 की “समान लिस्ट” की भावना के सीधे विरुद्ध है।

3. नियम और Form-6 – सबसे नीचे का स्तर- Form-6 कोई सादा कागज नहीं,बल्कि Registration of Electors Rules, 1960 के नियम 13(1) में लिखा हुआ वैधानिक फॉर्म है। ये नियम RPA 1950 की धारा 28 के तहत बने हैं। धारा 28 कहती है – “केंद्र सरकार,चुनाव आयोग से परामर्श करके,निर्वाचक नामावली से संबंधित नियम बना सकती है।”

बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया (धारा 28 के तहत): 

1.प्रस्ताव: चुनाव आयोग द्वारा प्रस्ताव।

2 अनुमोदन और गजट: विधि मंत्रालय द्वारा Rules में संशोधन और भारत के राजपत्र में प्रकाशन।

3.  संसदीय नियंत्रण: धारा 28(3) के तहत नियमों को संसद के दोनों सदनों के सामने 30 दिन के लिए रखा जाना।

बिना उपरोक्त इन तीन चरणों के ECINet में कॉलम जोड़ना केवल सॉफ्टवेयर में बदलाव है,कानूनी बदलाव नहीं। इंडियन एक्सप्रेस की की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्तों संधू और जोशी ने इसी आधार पर इसे “अवैध” कहा था – “सॉफ्टवेयर में बदलाव नियम में बदलाव नहीं है।”

मूल प्रश्न-क्या मूलभूत आधार बदला जा सकता है?: नहीं। पदानुक्रम स्पष्ट है:

1. सबसे ऊपर – संविधान (325, 326)

2. उसके नीचे – संसद का कानून (धारा 19)

3. सबसे नीचे – नियम (Form-6)

यदि नियम में “दादा का वोटर कार्ड लाओ” लिखा जाए,तो वह धारा 19 से टकराएगा। यदि कानून में ही “वोट सिर्फ उन्हीं को मिलेगा जिनके पूर्वज वोटर थे” लिख दिया जाए,तो वह अनुच्छेद 326 से टकराएगा।

इसे कानून की भाषा में Ultra Vires – अधिकार से बाहर का कार्य कहते हैं। नागरिकता, आयु और सामान्य निवास जैसे मूलभूत आधार को Form-6 के जरिए नहीं बदला जा सकता। उसके लिए संसद को धारा 19 बदलनी पड़ेगी,और वह भी यदि संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध हुआ तो सुप्रीम कोर्ट में असंवैधानिक घोषित हो जाएगा।

(रामेश्वर दयाल बैंककर्मी और एक्टिविस्ट हैं।)

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