वोट के अधिकार से विरोध के अधिकार तक

एसआईआर के विरोध से लेकर महिला पत्रकारों पर कथित पुलिस ज्यादती तक—सवाल सिर्फ वोट का नहीं, लोकतंत्र में नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का भी है।

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा ‘लोकतांत्रिक देश’ कहा जाता है। यहां ‘चुनाव’ को लोकतंत्र का महापर्व माना जाता है। 1952 में हुए पहले आम चुनाव से ही वयस्क भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है। यही अधिकार हमें यह महसूस कराता है कि सरकार हमारे ‘वोट से चुनी’ जाती है और जनता के ‘वोट से चुनी हुई सरकार’ जनता के लिए काम करती है। इस पर भी काफी कुछ लिखा जा चुका है। हम अभी बात करते हैं कि जनता के वोट देने के अधिकार में किस तरह एसआईआर के माध्यम से कटौती की जा रही है। इस कटौती के विरोध में भारत के जागरूक नागरिक और विपक्षी पार्टियां 2 अक्टूबर से दिल्ली की सड़कों पर हैं।

आखिर 2 अक्टूबर को ही क्यों?

2 अक्टूबर भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी का जन्मदिन है। भारत के शासक वर्ग सहित तमाम विपक्षी पार्टियों और जनमानस के अंदर गांधी को लेकर एक स्नेह है। क्योंकि कहा जाता है कि गांधी ने अपने ‘सत्याग्रह’ के दम पर ‘अंग्रेजों को देश छोड़ने’ के लिए मजबूर किया।

इसी भावना के साथ वामपंथी पार्टियों सहित विपक्षी पार्टियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को सड़क पर उतरीं। सरकार और पुलिस प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद दिखा। जंतर-मंतर के आसपास और चौराहों पर बैरिकेडिंग के साथ भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 के तहत प्रतिबंधित बैनर लगाए गए थे। दिल्ली पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के जवान वहां खड़े दिखे। ये जवान डंडों, आंसू गैस के गोलों और हथियारों के साथ नजर आए।

11 मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिया गया। यहां तक कि लोकल रेलगाड़ियों की परिचालन में जानबूझकर देरी की गई, जिससे लोग प्रदर्शन में हिस्सा न ले सकें। जो कुछ लोग पहुंचे, उनको भी हिरासत में ले लिया गया। इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 19(1)(बी) पर बहस होने लगी। संविधान हमें शांतिपूर्वक इकट्ठा होने और सभा करने का अधिकार देता है, तो ये पुलिस वाले क्यों रोक रहे हैं? ये भारतीय लोकतंत्र के रक्षक हैं या सत्ताधारी पार्टी निर्देशों का पालन कर रही थी?

इस बात से शासन-प्रशासन के कान में जूं तक नहीं रेंगी। अनुच्छेद 19(1)(बी) पुलिस वालों के लिए उसी तरह बेकार की बात है, जिस तरह अनुच्छेद 326 ज्ञानेश कुमार के लिए। यह केवल पुलिस या चुनाव आयुक्त के लिए ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट भी इसको अंगूठा दिखाते हुए कह चुका है कि अगली बार वोट दे देना।

देश के युवा और वामपंथी पार्टियां 2 अक्टूबर के हिरासत से डरकर घर नहीं बैठीं। वे 3 अक्टूबर को भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सड़कों पर उतरीं और आज भी उनका प्रदर्शन जरी है।

सरकार विरोधी किसी भी आंदोलन से देश की बिकाऊ मीडिया दूरी बनाए रखती है और वातानुकूलित स्टूडियो में बैठकर आंदोलन का विश्लेषण कर बदनाम करने की कोशिश करती है। सीएए-एनआरसी आंदोलन, किसान आंदोलन, मजदूर आंदोलन और ‘कॉकरोच आंदोलन’ की बात सोशल मीडिया और वैकल्पिक मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंची।

महिला पत्रकारों पर पुलिस की कथित ज्यादती

3 अक्टूबर 2026 को तीन महिला पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। पत्रकार रोजी का आरोप है कि एसीपी विवेक भगत ने उनके स्तनों को दबाया। करीब 200 स्वतंत्र पत्रकारों ने संसद मार्ग थाने का घेराव किया और एसीपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की।

एफआईआर दर्ज करने की जगह जांच मामले को टाल-मटोल करने के लिए क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई। 60 घंटे से अधिक समय तक थाने के सामने एफआईआर दर्ज कराने के लिए डटे रहे पत्रकारों को इसका ‘ईनाम’ यह मिला कि पुलिस ने पीड़िता और उनके पत्रकार साथियों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने स्वतंत्र पत्रकारों को पत्रकार मानने से ही इनकार कर दिया और पीड़िता पर ही पुलिस अफसर द्वारा तंज कसा गया—‘तुमको तो अच्छी तरह जानते हैं।’

हरियाणा से आए एक पत्रकार को हिरासत में लेकर उसकी शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाए जाने और उसके द्वारा फर्जी वीडियो फैलाने का आरोप लगाए जाने की भी बात सामने आई है। ऐसे में सवाल उठता है कि पुलिस ने अब तक सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक क्यों नहीं किया?

पुलिस का पत्रकारों के लिए दिशा-निर्देश

पुलिस ने पत्रकारों के लिए एआई-निर्मित पोस्टर जारी कर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। पोस्टर देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस वाले नहीं, बल्कि महिला पत्रकार ही पुलिस वालों को परेशान कर रही हैं। चित्र में महिला पत्रकारों को पुलिसकर्मियों के बेहद करीब और उनके शरीर से सटकर रिपोर्टिंग करते हुए दिखाया गया है। इस तरह से गुनहगार पुलिस नहीं, महिला पत्रकार ही हैं।

पत्रकारों से वैध पहचान-पत्र की बात कही जा रही है। सवाल है कि किसी स्वतंत्र पत्रकार के लिए क्या वैध पहचान हो सकती है? दिल्ली पुलिस खुद निजी कैमरामैन को नियुक्त की हुई है। क्या उनके पास दिल्ली पुलिस का कोई पहचान-पत्र हो सकता है? वे अपने पेशे के अनुसार प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें ले रहे हैं। ठीक उसी तरह कोई पत्रकार प्रदर्शनकारी की तरह व्यवहार नहीं कर रहा है, वह सवाल कर रहा है। तो क्या पुलिस उसको प्रमाणपत्र देगी? पुलिस का यह काम नहीं है कि शैक्षणिक योग्यता देखे उसका काम शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।

‘सैंया भइले कोतवाल तो डर काहे का’

एक तरफ जहां एसीपी विवेक भगत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग हो रही थी, ठीक उसी समय विवेक भगत को पदोन्नति देते हुए एसीपी से एडिशनल डीसीपी बनाने की घोषणा कर दी गई। जब चौतरफा आलोचना होने लगी तो दिल्ली सरकार ने घोषणा की कि विवेक भगत की पदोन्नति जांच पूरी होने तक रोक दी गई है। यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। यदि किसी अधिकारी के खिलाफ गंभीर आरोपों की जांच चल रही हो और उसी दौरान उसकी पदोन्नति की घोषणा कर दी जाए, तो जांच की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। जांच अधिकारी पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? क्या वह स्वतंत्र रूप से जांच कर पाएगा?

सुप्रीम कोर्ट ने Munshi Singh Gautam (Dead) & Others v. State of Madhya Pradesh, Criminal Appeal No. 919/1999, निर्णय दिनांक 16 नवंबर 2004, में कहा था कि पुलिसकर्मी अपने सहयोगियों को बचाने के लिए अक्सर चुप रहते हैं और सच्चाई को भी तोड़-मरोड़ देते हैं।

बाद में कई अन्य न्यायालयों के फैसलों में भी इस टिप्पणी का उल्लेख किया गया, जिनमें Dalbir Singh v. State of U.P. (2009), Prithipal Singh v. State of Punjab (2011) और Sube Singh v. State of Haryana (2006) शामिल हैं। 2025 में गुजरात हाई कोर्ट के एक फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को उद्धृत किया गया है।

भारत के गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने 16 जुलाई 2019 को प्रश्न संख्या 3789 के जवाब में बताया कि वर्ष 2016-19 के दौरान 302 कस्टोडियल बलात्कार के मामले हुए हैं। 2023 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने पुलिस हिरासत में बलात्कार और छेड़खानी के 12 मामले दर्ज किए हैं। 2017–2022 में कुल 275 कस्टोडियल बलात्कार के केस दर्ज हुए और उनमें 56 मामलों में पुलिस आरोपी हैं। 

2021 में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना ने कहा था कि देश में मानवाधिकारों के लिए सबसे गंभीर खतरे वाली जगहों में पुलिस थाने शामिल हैं।

पत्रकार ही नहीं  महिला पुलिसकर्मी भी सुरक्षित नहीं 

समाचार पत्रों में थाने में महिला पुलिसकर्मी से बलत्कार की खबरें आती रहती हैं। ओडिशा में विधानसभा में सरकार ने बताया कि 2023 से सितंबर 2025 तक महिला पुलिसकर्मियों से संबंधित 22 मामले दर्ज हुए। इनमें 4 बलात्कार के मामले थे। बाकी मामलों में उत्पीड़न आदि शामिल थे। ये मामले पुलिस विभाग में काम करने वाली महिलाओं के साथ हुए थे और पुलिस स्टेशन तथा कार्यालय भी इसके दायरे में थे। अप्रैल 2023 में दिल्ली पुलिस की एक महिला पुलिस अधिकारी ने विशेष आयुक्त स्तर के अधिकारी पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। यह घटना घटना कथित तौर पर विशेष आयुक्त के कार्यालय के अंदर हुई थी। ऐसी परिस्थितियों में पत्रकार जुली को न्याय मिल पाएगा?

अधिकारों की लड़ाई

आज जनता को शक्ति देने वाले जो भी संवैधानिक अधिकार हैं, चाहे अनुच्छेद 19(1)(ए), 19(1)(बी) हो या अनुच्छेद 326—शासन-प्रशासन के व्यवहार को लेकर उन अधिकारों के प्रभावी इस्तेमाल पर सवाल उठ रहे हैं। यहां तक कि सूचना के अधिकार (आरटीआई) से लेकर शिक्षा के अधिकार तक को धीरे-धीरे कमजोर किए जाने की आशंकाएं व्यक्त की जाती रही हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने बड़े जोर-शोर से यह मुद्दा उठाया था कि बीजेपी को 400 से अधिक सीटें इसलिए चाहिए ताकि वह संविधान को बदल सके। अब सरकार के आचरण से लग रहा है कि बिना संविधान बदले ही संविधान प्रदत्त अधिकार नहीं दिए जाएंगे।

डॉ. आंबेडकर से लेकर राममनोहर लोहिया तक ने कहा है कि अधिकार मांगने से नहीं मिलता, छीनना पड़ता है। अधिकारों के प्रति जागरूक होकर संघर्ष करने से ही आज के समय में अधिकार मिलेगा।

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