किसी विरोध प्रदर्शन को कुचलने के लिए जब 38,000 अर्धसैनिक बलों और पुलिसकर्मियों को तैनात कर दिया जाए, तब आप वहाँ की रिपोर्टिंग कैसे करेंगे?
महिला और एलजीबीटीक्यू+ पत्रकारों के लिए अधिक सटीक सवाल है : जब काम करने का मतलब गिरफ़्तारी की सम्भावना, धमकी, प्रताड़ना और अपमान है तब आप काम कैसे जारी रखेंगे?
कॉकरोच जनता पार्टी के आह्वान पर जन्तर मन्तर पर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग पर होने वाले 10 और 11 अक्तूबर के प्रदर्शनों को कवर करने वाले पत्रकारों के लिए ये ज़िन्दा सवाल थे। यह डर हमेशा नाटकीय टकरावों के रूप में ही सामने नहीं आया। यह शान्त, सतत, ज़्यादा गम्भीर फिर भी उतना ही भयानक साबित हो सकता है।
यह इस बात की आशंका थी कि आगे क्या होगा। यह इस बात का खौफ़ था कि पुलिस बर्बरता को दर्ज करने वाला उसका अगला निशाना बन सकता है और आटे में घुन की तरह पिस सकता है।
द क्विण्ट की मुख्य सम्वादाता अलिज़ा नूर ने 10 अक्तूबर को रिपोर्टिंग शुरू करने से पहले ही सोच लिया था कि क्या-क्या ग़लत हो सकता है। क्या पेलेट गंस इस्तेमाल की जाएंगी? क्या पुलिस की शह पर और कभी पुलिस की वर्दी तक में संघी गुण्डे अपना गुस्सा “देशद्रोही” पत्रकारों पर निकालेंगे?
इसके अलावा कुछ आम लेकिन ज़्यादा गहन मसले थे : क्या उन्हें कामचलाऊ शौचालय मिल पाएगा? अवांछित नज़रों से बचने के लिये उनके क्या कपड़े पहनने चाहिए? वे ख़ुद को जोख़िम में डालने से बचाते हुए भीड़ में कैसे आगे बढ़ेंगी?
कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स के अनुसार विरोध प्रदर्शन के दो दिनों के दौरान दिल्ली पुलिस के 15,000 कर्मियों के साथ 23,000 अर्धसैनिक बल तैनात थे। आवाजही पर रोक और पाबन्दियों के कारण राष्ट्रीय राजधानी थम सी गयी थी : मेट्रो के 57 स्टेशन बन्द थे, ट्रेनें रद्द कर दी गयीं थीं, कई ट्रेनों के रूट बदल दिये गये थे ताकि शहर में न रुके, आवाजाही को रोकने के लिये पुलिस ने बैरिकेड्स लगा दिये और रैली शुरू होने के बाद शान्तिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बर्बरता से घसीटा और गिरफ़्तार किया गया।
यह विडम्बना ही है कि इतनी भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती के बावजूद सुरक्षा का आभास नहीं था। महिला और एलजीबीटीक्यू+ पत्रकारों द्वारा उठाये जा रहे जोख़िम में मनमाने तरीक़े से गिरफ़्तारी, सड़कों पर उत्पीड़न इस बोध के साथ शामिल था कि उनके साथ होने वाला व्यवहार उनके जेण्डर, मज़हब या लैंगिक पहचान के आधार पर तय होगा। एक बार पुलिस ने सड़कें खाली करनी शुरू कर दी तो प्रेस कार्ड के बूते बच पाने की सम्भावना कम है।
द क्विण्ट के साथ ही जुड़ी एक पत्रकार सना ने ग़ौर किया कि किस तरह पेशेवर प्रमाणपत्र का मोल नज़र-बन्दी में ख़ाक हो जाता है। यह बताते हुए कि किस तरह एक पत्रकार का नाम और उसकी धार्मिक या जातिगत पृष्ठभूमि जोख़िम को बढ़ा देती है और उसकी स्थिति को कमज़ोर बना देती है, उन्होंने कहा, “अगर आप मुसलमान हैं, तो आपके प्रेस कार्ड की कोई अहमियत नहीं: चूँकि आपका पहचान पत्र आपका मज़हब ज़ाहिर करता है, आपका नाम से ही सब कुछ तय हो जाता है”।
नूर के लिए पिछले प्रदर्शनों के मुक़ाबले मे देखा जाए तो परिस्थिति में दिन और रात का अन्तर था। वे याद करती हैं, “मैं हज़ारों पुलिसकर्मियों के बीच भी महफ़ूज़ नहीं महसूस कर रही थी।”
नूर और सना, दोनों के पास उन वेबसाइट के ज़रिये सांगठनिक समर्थन था जिनके लिए वे काम करती थीं। लेकिन, स्वतंत्र महिलाओं और एलजीबीटीक्यू+ पत्रकारों ने इन जोखिमों को अपने दम पर, बिना किसी संस्थानिक समर्थन के झेला। किसी न्यूज़रूम क़ानूनी टीम, सुरक्षा इंतजाम या वरिष्ठ सम्पादकों की ग़ैर-हाज़री में उन्हें ख़ुद ही फैसला लेना पड़ा कि किस तरह बचा जाये और फूटेज को किस तरह बचाया जाए, या स्थिति गम्भीर होने की स्थिति में कैसे निकला जाए।
जेण्डर ने कई फैसले प्रभावित किये : स्रोत तक पहुँच कैसे बनायी जाए, क्या दस्तावेज़ीकरण जारी रखा जाए और हिंसक स्थितियों में कब निकला जाए। पूरी हो चुकी स्टोरी में ऐसे समीकरणों के लिए शायद ही जगह बचती हो, लेकिन ये फिर भी दस्तावेज़ीकरण को तय करते हैं – और वह जो आवाम कभी नहीं देखेगी।

10 अक्तूबर को कनॉट प्लेस के नज़दीक दिल्ली पुलिस की शह और संरक्षण में संघी गुण्डे खुलेआम एक युवा प्रदर्शंकारी पर हमला करते हुए (तस्वीर इंस्टाग्राम से साभार)
हिंसा का ख़तरा अमूर्त नहीं, वास्तविक था
एक प्रतिष्ठित प्रिण्ट संस्थान के साथ कार्यरत एक पत्रकार ने गोपनीयता बनाये रखने की शर्त पर बताया कि पहले तो उन्हें मौखिक रूप से धमकाया गया फिर महिला पुलिसकर्मी के हाथों घसीटा गया और बदसलूकी की गयी। गिरफ़्तारी से बचने की प्रक्रिया में उनके हाथों पर खंरोचें आयीं और वे चोटिल हो गयीं। उन्होंने कहा, “मैं घायल हो गयी, बुरी तरह घसीटी गयी और बदसलूकी का शिकार बनी, और सदमे में थी। मुझे लगता है एक स्त्री होने के नाते हम अपने पेशे या पद के बावजूद सार्वजनिक जगहों पर पहले से ही ज़्यादा कमज़ोर स्थिति में होते हैं। यह कमज़ोरी हर जगह हमारा पीछा करती है।“
अपने फ़ोन से अकेले ही रिपोर्टिंग करने वाली स्वतंत्र पत्रकार सौम्या राज के लिए मुश्किलें प्रदर्शन स्थल पर पहुँचने से पहले ही शुरू हो गयीं। 10 अक्तूबर को पुलिस ने उन्हें सफ़दरजंग फ्लाईओवर के पास ही रोक दिया और सड़क किनारे तक़रीबन एक घण्टा इंतज़ार करवाया। आगे जाने से रोक दिये जाने पर उन्हें वहीं से अपनी रिपोर्ट फ़ाइल करनी पड़ी।
अगले दिन राज महिला प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों की गिरफ़्तारी की घटना की चश्मदीद बनी, जिस प्रक्रिया को उन्होंने बेहद क्रूर बताया। जब उन्होंने वीडियो रिकॉर्डिंग शुरू की तब एक आक्रामक पुलिस अधिकारी ने उनसे बहसबाज़ी की और उन्हें हिरासत में ले लेने की धमकी दी।
“तुझे भी अन्दर जाना है क्या?” अफ़सर ने पूछा।
राज बताती हैं कि अधिकारी ने उनका कैमरा बन्द कर देने से पहले तीन-चार बार यह धमकी दोहरायी। अकेले काम करते हुए उनके पास रास्ता था : फिल्माना जारी रखना और गिरफ़्तारी का ख़तरा मोल लेना या रिकॉर्डिंग बन्द कर देना। वे कहती हैं, “ऐसी परिस्थितियों में अकेले और उसपर भी एक महिला होना दुश्वार है। अगर पुरुषों को एक क़दम पीछे लेना पड़ता है तो महिलाओं को दो लेने पड़ते हैं।”
धमकी सिर्फ वर्दीधारी पुरुषों से नहीं मिल रही थी। राज ने बताया कि 11 अक्तूबर को पीस-टू-कैमरा करते हुए उन्हें 4 संघियों ने घेर कर डराने और विचलित करने की कोशिश की। वे महज़ कुछ इंचों की दूरी पर खड़े होकर माइक्रोफ़ोन पर उनके कहे हर शब्द पर ग़ौर कर रहे थे। उन्हें डर था कि इतनी क़रीबी से हाथापाई की स्थिति बन सकती है, अतः उन्हें तय करना पड़ा कि क्या उन्हें रिकॉर्डिंग रोक कर वहाँ से चले जाना चाहिए।
अकेले रिपोर्टिंग करने का मतलब था अपनी सुरक्षा और स्टोरी के बीच में सन्तुलन बनाए रखना। भीड़ के उग्र हो जाने की स्थिति में राज आने-जाने वाले लोगों से भी हस्तक्षेप की उम्मीद नहीं कर सकती थीं, न ही तनावपूर्ण स्थिति की सूरत में ख़बर को अधूरा छोड़ सकती थीं। उनके काम को बाधित करने के लिए डराने-धमकाने की घटनाओं का हिंसक रूप लेना भी ज़रूरी नहीं था, वे कहाँ खड़ी हों, क्या कहें और कैमरे से रिकॉर्डिंग जारी रखें या बन्द कर दें, यह तय करने के लिए डर ही काफ़ी था ।
एक अन्य स्वतंत्र पत्रकार कनिका गुप्ता के लिए बेचैनी का कारण नज़र रखा जाना था। पहले दिन राम मनोहर लोहिया अस्पताल के पास एक प्रदर्शनकारी का साक्षात्कार लेते हुए उन्होंने सादे कपड़ों में एक व्यक्ति को अपने बगल में खड़े होकर कैमरे से रिकॉर्ड करता हुआ पाया। उनको अंदाज़ा नहीं था कि वह कौन था और उन्हें ही क्यों रिकॉर्ड कर रहा था। उसके होने से असहज महसूस करते हुए उन्होंने इंटरव्यू बीच में ही छोड़ दिया।
उसकी निगरानी से वे परेशान हो गयीं: वे तय नहीं कर पायीं कि क्या वह केवल उनके काम को परख रहा था या हस्तक्षेप करने की तैयारी में था। उन्हें सीधे तौर पर कोई ख़तरा नहीं था, लेकिन उसकी मौजूदगी मात्र से उनकी रिपोर्टिंग प्रभावित हुई और उन्हें इंटरव्यू रोक देने के लिए बाध्य कर दिया।
गुप्ता ने बताया कि कुछ मामलों में पुलिस का रुख़ उनके प्रति ज़्यादा नरम था, उनपर सीधे तौर पर हमला करने के बजाये आवे उन्हें आगे बढ़ जाने को कह रहे थे। वे तब भी महफ़ूज नहीं महसूस कर रहीं थीं।
एक तनावपूर्ण सार्वजनिक जगह पर महिला होते हुए रिपोर्टिंग करते हुए उन्हें लगातार अपने पीछे खड़ी भीड़ पर नज़र रखनी पड़ती थी, दूरी बनाये रखनी पड़ती थी और अनचाहे स्पर्श से ख़ुद को बचना होता था – यह सब शॉट लेते हुए या सवाल तैयार करने के साथ करना होता था।

क्विर पत्रकारों के लिए सड़कों से रिपोर्टिंग के दौरान और भी चिन्ताएँ थीं : क्या पुलिसकर्मी उनके प्रेस प्रमाण को स्वीकार करेंगे, उनकी पहचान का सम्मान करेंगे या उनके साथ ऐसे बर्ताव करेंगे जैसे सार्वजनिक जगहों पर उनका कोई हक़ नहीं।
एक क्विर पत्रकार ने बताया कि उन्हें क्विरबीट के पत्रकार अनुरीत वाट्स के साथ चाणक्यपुरी पुलिस थाने में चार घण्टे तक हिरासत में रखा गया। दोनों ने बार-बार अपने प्रेस कार्ड दिखाये, लेकिन पुलिस अधिकारियों ने उन्हें यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि उनके प्रेस पहचान-पत्रों का “सत्यापन” किया जाना ज़रूरी है। उन्हें हिरासत में लेने का कोई कारण नहीं बताया गया और कहा गया कि विरोध प्रदर्शन समाप्त होने के बाद ही उन्हें रिहा किया जाएगा। उन्हें तभी छोड़ा गया, जब वकील और साथी पत्रकार पुलिस थाने पहुँचे।
उन्होंने कहा, “पुरुष पुलिसकर्मियों के मन में क्विर पत्रकारों और महिला पत्रकारों के लिए नफरत भरी पड़ी है।” उनका मानना था कि कुछ पुलिस अधिकारियों को महिलाओं और क्विर पत्रकारों का अधिकारपूर्ण पदों पर होना खटकता था। उनका अनुभव था कि पुलिस और भीड़ के एक खास वर्ग—दोनों ही—सड़क पर उनकी मौजूदगी पर सवाल उठाते थे, मानो उन्हें वहाँ जाने का कोई हक़ ही न हो—न तो पत्रकार के रूप में और न ही अपने तौर पर।
गिरफ़्तारी, बदसलूकी और यंत्र छीन लिये जाने पर सवाल किये जाने पर सुरक्षा घेरा सम्भाल रहे दो सहायक पुलिस आयुक्तों (एसीपी) ने सवाल को एक ही बेरुखी भरे जवाब से टाल दिया: पुलिसकर्मी अपना “फर्ज़ निभा रहे थे।”
इसके बाद ग़ैर-क़ानूनी गिरफ़्तारी, शारीरिक हमले, धमकी और प्रेस प्रमाण की अनदेखी पर नेटवर्क ऑफ़ विमेन इन मीडिया ने सर्वोच्च न्यायालय में संविधान के धारा 32 के तहत एक रिट याचिका दायर की है। इस याचिका में महिला पत्रकारों का घसीटा जाना, उनके साथ किया शारीरिक दुर्व्यवहार, और हिरासत में लिया जाना दर्ज किया गया है। इसमें यह तर्क दिया गया है कि इन कार्रवाइयों से प्रेस की आज़ादी, महिलाओं की गरिमा को और शारीरिक तौर पर अस्तित्व तथा सार्वजनिक जगहों से समान शर्तों पर रिपोर्टिंग करने के उनके संवैधानिक अधिकार को ख़तरा है।
जब खौफ़ यह तय करने लगे की एक पत्रकार किसी स्रोत का रुख़ करे या नहीं, फिल्माना जारी रखे या तनाव की स्थिति होने पर छोड़ दे, तो रिपोर्टिंग की बुनियादी शर्तों को ही ख़तरा है। महिला और एलजीबीटीक्यू+ पत्रकारों के लिए किसी प्रदर्शन को कवर करना जोख़िम का आंकलन करने जैसा है : ख़ुद को ख़तरे में डाले बिना वे कितना दस्तावेज़ीकारण कर सकते हैं?
(स्वतंत्र पत्रकार समीक्षा शर्मा की रिपोर्ट इंडिपेंडेंट इंक से साभार। अंग्रेज़ी से अनुवाद : वृषाली श्रुति। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)