ओडिशा में आदिवासियों के इलाज के लिए गए डॉक्टर रैंडल सिकेरा को खनन-विरोधी प्रदर्शनों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है। इस गिरफ्तारी पर कई मानवाधिकार संगठनों ने नाराजगी जताई है और इसकी निंदा की है। पुलिस ने दलित कार्यकर्ता लक्ष्मण नाइक के साथ डॉक्टर सिकेरा को कालाहांडी जिले में उनके घर से उठाया और हिरासत में ले लिया। फिलहाल वे रायगडा उप-जेल में बंद हैं और उन पर हत्या के प्रयास और दंगा करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
उनकी गिरफ्तारी, ओडिशा राज्य सरकार द्वारा दलित और आदिवासी लोगों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को दबाने की कोशिशों की एक और कड़ी है। ये लोग अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं—वही संसाधन, जिन पर उनका पूरा जीवन टिका है। इन विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व ‘माँ माटी माला सुरक्षा मंच’ कर रहा है, और ये प्रदर्शन धरनों, पदयात्राओं और पहरेदारी के रूप में सामने आए हैं।
रैंडल सिकेरा ने भी कुछ विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह गिरफ्तारी विरोध को दबाने और खनन परियोजनाओं को आसान बनाने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा है।
‘द वायर’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने इन दोनों को कालाहांडी जिले में सिकेरा के घर से रात करीब 11 बजे उठाया। डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के नेटवर्क ‘मेडिको फ्रेंड सर्कल’ और ‘ग्राउंड ज़ीरो’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कांतामल गांव में हुई झड़प से जुड़ी एफआईआर में सिकेरा और नाइक का नाम नहीं था।
बताया जाता है कि यह झड़प तब हुई जब पुलिस ने स्थानीय निवासियों के खिलाफ कार्रवाई की, जिसमें आंसू गैस के गोले दागना और लाठीचार्ज करना शामिल था। इस टकराव में दोनों पक्षों के लोग घायल हुए।
फिलहाल सिकेरा और नाइक रायगढ़ा उप-जेल में बंद हैं। ‘द वायर’ के अनुसार, उन पर हत्या के प्रयास, घातक हथियारों के साथ दंगा करने, डकैती और आपराधिक धमकी देने जैसे आरोप लगाए गए हैं।
बेंगलुरु के सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने वाले सिकेरा पिछले पांच साल से अधिक समय से कालाहांडी में रह रहे हैं। यहां वे आदिवासी समुदायों के साथ मिलकर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और सामाजिक न्याय के लिए काम कर रहे हैं।
उन्होंने सिजीमाली के जंगलों में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन (जहां वेदांता समूह एक खनन परियोजना से जुड़ा है) और कुत्रुमल्ली (जहां अडानी समूह एक परियोजना से जुड़ा है) के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया है।
सिकेरा का काम मुख्य रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक परिस्थितियों के बीच संबंध पर केंद्रित रहा है, जिसमें साफ पानी, शुद्ध हवा और पौष्टिक भोजन तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल हैं।
उनके करीबी दोस्त नीलेश मोहिते ने बताया कि सिक्वेरा ने इस आंदोलन के लिए पूर्णकालिक काम करने के उद्देश्य से अपनी मेडिकल प्रैक्टिस छोड़ दी थी। उन्होंने पिछले पांच-छह साल आदिवासी समुदायों और उनकी संस्कृतियों को समझने में बिताए हैं।
सिक्वेरा की मां, नैन्सी सिक्वेरा ने कहा कि उनका बेटा आदिवासियों के अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ रहा थ और उम्मीद जताई कि अंततः न्याय होगा।
‘द वायर’ में उद्धृत कार्यकर्ताओं के अनुसार, 2023 में खनन के खिलाफ विरोध शुरू होने के बाद से 100 से अधिक दलित और आदिवासी लोगों को गिरफ्तार किया गया है और उनके खिलाफ 43 मामले दर्ज किए गए हैं। उनका आरोप है कि खनन परियोजनाओं का विरोध करने वालों को डराने-धमकाने के लिए आपराधिक मामले और गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
नारीवादी शोधकर्ता रंजना पाढ़ी ने आरोप लगाया कि राज्य प्रशासन, स्थानीय समुदायों और उनका समर्थन करने वाले कार्यकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक न्याय प्रणाली का इस्तेमाल करके कॉरपोरेट हितों को साधने में मदद कर रहा है।
इस आंदोलन की मांगों में ‘वन अधिकार अधिनियम’ और ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम’ को लागू करना शामिल है। ये कानून अनुसूचित क्षेत्रों में वन अधिकारों और स्थानीय स्वशासन से जुड़े सुरक्षा उपाय प्रदान करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में स्थानीय निवासियों द्वारा गठित ग्राम सभाओं ने बॉक्साइट खनन के प्रस्तावों को खारिज कर दिया था। समुदाय के सदस्यों का आरोप है कि इसके बाद उन पर सशस्त्र सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में इन परियोजनाओं को स्वीकार करने के लिए दबाव डाला गया। यह मामला फिलहाल ओडिशा उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।
(जनचौक ब्यूरो)