हरिवंश पर दूसरी किश्त: तो क्या सरकार उस कोयले के आयात पर रोक लगा देगी जिसमें अडानी की एक तिहाई हिस्सेदारी है?

अडानी और कोयला खदान की एक तस्वीर।

अब देखें कि भारत में आयात किस तरह के कोयले का किया जाता है और कौन हैं इसके आयात करने वाले। भारत में कोयले से 72% बिजली का उत्पादन होता है। 200 मिलियन मीट्रिक टन कोयले के सालाना आयात में कोकिंग कोयला 43.50 मिलियन मीट्रिक टन और नॉन-कोकिंग यानी थर्मल कोयला 156.38 मिलियन मीट्रिक टन शामिल है। तो 156.38 मिलियन मीट्रिक टन का आयात बिजली पैदा करने वाले और सीमेंट बनाने वाले करते हैं और 43.50 मिलियन मीट्रिक टन स्टील बनाने वाले और ये लगभग सारे के सारे अच्छी क्वालिटी के कोयले हैं यानी इस क्वालिटी वाले आयातित कोयले भारत में नहीं मिलते हैं। 

तो क्या भारत इन 200 से 250 मिलियन मीट्रिक टन कोयले के आयात को बंद कर देश में ख़राब क्वॉलिटी के मिलने वाले कोयले से बिजली, स्टील, सीमेंट आदि का उत्पादन करना चाहता है? यह प्रदूषण की समस्या को और भी बढ़ाएगा! इससे निबटने के लिए भारत की कौन सी योजना है? और, इसका अर्थशास्त्र कितना सही है? दो सौ साल पहले तुलनात्मक सुलाभ का सिद्धान्त (Theory of Comparative Advantage) डेविड रिकार्डो ने प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत के अनुसार हर देश को वह उत्पादन करना चाहिए जिसमें वह सर्वश्रेष्ठ हो। बाकी दूसरे देशों से आयात कर लेना चाहिए। तो ये साहब अर्थशास्त्र के कौन से सिंद्धांत के आधार पर आत्मनिर्भरता की बात कर रहे हैं? 

कोयला खदान। फाइल फोटो।

भारत में जिन 41 कोयले के ब्लॉक्स को मोदी सरकार की नीलाम करने की योजना है वे 225 मिलियन मीट्रिक टन सालाना कोयले का उत्पादन करेंगे। तो क्या मोदी सरकार जितना कोयला आयात किया जाता है भारत में उसे बंद कर देश के नए उत्पादन से आपूर्ति करना चाहती है? हरिवंश तो यही कह रहे हैं। पर यह कितना सत्य है? आइये देखें। 

भारत में दो तिहाई कोयले की जरूरत बिजली बनाने वाली कंपनियों के लिए है। कोकिंग कोयले की मुख्य रूप से आवश्यकता स्वदेशी उपलब्धता के बीच की खाई को पाटने और बेहतर गुणवत्ता के लिए राज्य द्वारा संचालित स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) और अन्य इस्पात निर्माण इकाइयों द्वारा आयात किया जाता है। कोयला आधारित बिजली संयंत्र, सीमेंट संयंत्र, कैप्टिव पावर प्लांट, स्पंज आयरन प्लांट, औद्योगिक उपभोक्ता और कोयला व्यापारी गैर-कोकिंग कोयला आयात कर रहे हैं। कोकिंग कोयला मुख्य रूप से स्पंज-आयरन निर्माताओं और लोहे और इस्पात क्षेत्र के उपभोक्ताओं द्वारा मिनी-ब्लास्ट फर्नेंस में उपयोग करने के लिए आयात किया जाता है। तो क्या मोदी सरकार इनसे कहेगी कि देशी कोयला का उपयोग करें? 

विशेषज्ञों का कहना है, कोकिंग कोयले की उपरोक्त जरूरत और बिजली संयंत्रों के लिए गैर-कोकिंग कोयले की आवश्यकता है, जिनके बॉयलर केवल आयातित कोयले पर चलने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, तो आने वाले वर्षों में उनके द्वारा कोयला आयात जारी रखने की संभावना है। इसके अलावा, हमारे पास तटीय क्षेत्रों में कोयले पर आधारित बिजली संयंत्र हैं जो आयातित कोयले पर आधारित हैं। उनके बॉयलर केवल आयातित कोयले के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। वे आयातित कोयले का उपयोग जारी रखेंगे। भारत में आयात होने वाले कोयले में एक तिहाई अडानी ग्रुप करता है। तो क्या अडानी को मोदी सरकार आयात करने से रोक देगी या यह सब कुछ अडानी के लिए ही किया जा रहा है?

कोल खदान। प्रतीकात्मक फोटो।

अब हरिवंश कहते हैं कि इन कोयले के ब्लॉक्स की नीलामी होने से बड़ा कैपिटल इन्वेस्टमेंट होगा। कितना होगा? पांच से सात वर्षों में महज 33,000 हज़ार करोड़! इतना तो भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट 20,000 करोड़, मोदी जी के एफडीआई लाने के लिए किये गए विदेशी दौरों के 446 करोड़, 13 दिसंबर 201 तक सरकारी प्रचार पर किये गए खर्च 5200 करोड़ और 3000 करोड़ की सरदार पटेल की प्रतिमा के खर्चों को ही जोड़ दें तो पहुंच जाता है। फिर हरिवंश किसको मूर्ख बना रहे हैं? 

अब देखें हरिवंश साहब कैसे अपने ही बनाये जाल में फंसते हैं। भारत में तापीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता 194 गीगावाट की है। भारत मार्च 2022 तक अपनी स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता को 78 गीगावाट से बढ़ाकर 175 गीगावाट (1 GW = 1,000 MW) करना चाहता है। उस 175 गीगावाट में  100 गीगावाट सौर ऊर्जा होगी। 2018-19 (फरवरी तक) में भारत की बिजली की अधिकतम मांग 177 गीगावाट थी। 2018-19 के वित्तीय वर्ष के दौरान, भारत में उपयोगिताओं द्वारा उत्पन्न सकल बिजली 1,372 TWh थी और देश में कुल बिजली उत्पादन (उपयोगिताओं और गैर उपयोगिताओं) 1,547 TWh था। 2018-19 में सकल बिजली की खपत 1,181 किलोवाट प्रति व्यक्ति थी।अब अगर अक्षय ऊर्जा की क्षमता भी क्षमता 175 गीगावाट तक  2022 में पहुंच जायेगी तब फिर कोयले के ब्लॉक्स का आवंटन क्यों? 

अगर खनन करना भी हो तो क्या कोल इंडिया के पास 33,000 करोड़ निवेश करने का माद्दा नहीं है? भारत में 194 गीगावाट कोयले से ताप आधारित बिजली बनाने वाली कंपनियों में से 34 कंपनियां जिनकी स्थापित क्षमता 40 गीगावाट की है, दिवालिया होने के कगार पर हैं।  उन पर 1.70 लाख करोड़ रुपये का बैंकों का बकाया है। तो क्या ये सब उन्हें बचाने के लिए हो रहा है?

यह बात ध्यान रखने योग्य है कि वाणिज्यिक खनन के लिए प्राइवेट कंपनियों को नीलाम होने वाले 41 कोयला ब्लॉक्स के लिए अंतिम उपयोग (end use) की शर्त नहीं है। यानी यह यूपीए सरकार से ज्यादा खराब सौदा है। ये कंपनियां चाहें तो कोयला को खनन के बाद बाजार में बेच सकती हैं, निर्यात भी कर सकती हैं। अतः यह स्पष्ट है कि ये नीलामी मोदी सरकार को पैसे के लिए करना पड़ रहा है जिसका ये सरकार अपव्यय ही करेगी जो यह पिछले 6 सालों से करती आ रही है। इसमें बड़े स्तर की कमीशनखोरी होगी जिसका बड़ा हिस्सा भाजपा को जाएगा। इस सरकार ने नोटबंदी में सरकारी खजाने की चोरी की फिर 1.76 लाख करोड़ रिज़र्व बैंक के रिज़र्व पर दिन दहाड़े डाका डाला। अतः हरिवंश कोरी लफ्फाजी कर रहे हैं और सरेआम झूठ बोल रहे हैं। यह भारत की आम जनता के साथ धोखाधड़ी का मामला है।

                                                                              जारी….

(अखिलेश श्रीवास्तव कलकत्ता हाईकोर्ट में एडवोकेट हैं। और आजकल जमशेदपुर और कोलकाता में रहते हैं।)

इस लेख की पहली किश्त नीचे दी गयी है:

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