अपना हक़ मांगने दिल्ली पहुंचे “मृतक” किसान

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प्रदीप सिंह

प्रियजनों के नरमुंड लेकर धरने को मजबूर तमिलनाडु के किसान

नई दिल्ली। दिल्ली में जिंदा किसानों के साथ “मृतक” किसान भी प्रदर्शन करने आ पहुंचे हैं। जंतर-मंतर आने वाले “मृतक” किसान सरकारी दस्तावेजों में आंकड़ा बनने से इंकार कर रहे हैं। तमिलनाडु से लगभग 21सौ किमी दूर दिल्ली के जंतर-मंतर आए सैकड़ों किसान देश की सबसे बड़ी पंचायत के सामने न्याय की गुहार लगा रहे हैं। सिर और कमर पर हरा गमछा लपेटे किसान अपने खाली पेट के लिए दाना और सूखे खेत के लिए पानी की मांग कर रहे हैं।

इतिहास की यह पहली घटना है जब अंधी-बहरी सत्ता को अपनी समस्या सुनाने और दिखाने के लिए किसानों को अपने मृत परिवारजनों की अस्थियां और नरमुंड लाने पड़ रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर तमिलनाडु से आए सैकड़ों किसान नरमुंड पहन कर अपने खाली पेट और सूखे खेत का हाल बयां कर रहे हैं। फसलों के बर्बाद होने और कर्ज के दलदल में फंसने के कारण हर साल किसान आत्महत्या की दर बढ़ती जा रही है, लेकिन दिल्ली है कि सुनती ही नहीं। किसान आत्महत्या रोकने के लिए सरकार के पास कोई फॉर्मूला नहीं दिखता है। तमिलनाडु के तिरुचुरापल्ली (त्रिची) जिले के किसान रामालिंगम कहते हैं कि,’ हम इतने संवेदनहीन नहीं हैं कि अपने मृत परिवारजनों की अस्थियों का सार्वजनिक प्रदर्शन करे। लेकिन साल दर साल देश में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस समस्या का समाधान नहीं हो रहा है और आत्महत्या करने वाला किसान सिर्फ आंकड़ा बनता जा रहा है। अब किसान न तो आत्महत्या करेगा और न ही आंकड़ा बनेगा।’

पैंतीस वर्षीय रामालिंगम त्रिची के अनियापुर गांव के रहने वाले हैं। वे कहते हैं कि किसानों की फसल बर्बाद हो रही है। सूखे की वजह से पैदावार में भी गिरावट आयी है लेकिन सरकार समस्या के समाधान के प्रति गंभीर नहीं है।

त्रिची जिले के ही वलैय्यूर गांव के किसान लिस्टर की समस्या अजब है। खेती-बाड़ी सब तबाह हो चुकी है। स्थानीय प्रशासन ने साल भर पहले मुआवजा देने के लिए बर्बाद फसल का मूल्यांकन किया लेकिन आज तक किसानों को एक पाई नहीं मिली। हर तरफ से निराशा और दुत्कार के बाद सत्तावन वर्षीय लिस्टर ने मृतक किसानों के अस्थियों के साथ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने का निर्णय किया। उनके साथ पूरा हुजूम है। लिस्टर कहते हैं कि, ‘हर दरवाजा खटखटाने के बाद निराशा मिली तो हमने इस तरह के प्रदर्शन का निर्णय किया।’

अपने परिजनों और प्रियजनों की अस्थियों और भीख का कटोरा लिए करीब 253 किसान 14 मार्च से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। तमिलनाडु के किसान जब चेन्नै में बैठे शासकों को अपनी समस्या बताकर थक गए तब उन्होंने दिल्ली का रूख किया। जंतर मंतर आए अधिकांश किसान तमिलनाडु के तिरुचुरापल्ली (त्रिची), मदुरै, करुर, कोच्चि जिले से हैं। सबकी समस्या एक है। पिछले तीन दिनों से वे केंद्र सरकार के मंत्रियों और नेताओं से मिलकर अपनी समस्या और मांग रख रहे हैं लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। उनसे कहा जा रहा है कि आप लोग प्रदर्शन समाप्त करिये, सरकार आप की मांगों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रही है, लेकिन किसान इस बार केवल आश्वासन लेकर वापस जाने को तैयार नहीं हैं। वे ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

पिछले तीन-चार सालों से तमिलनाडु सूखे की चपेट में है। कावेरी नदी के पानी पर विवाद है। उसका भी सरकार के पास कोई सर्वमान्य हल नहीं है। तिरुचुरापल्ली (त्रिची) के किसान सेंथिल कुमार कहते हैं कि पानी के अभाव में खेत रेगिस्तान बनते जा रहे हैं। किसानों ने बैंकों से कर्ज लेकर गाय, बकरी और मुर्गी पालने की कोशिश की लेकिन यह पहल भी विफल साबित हुई। किसान कर्ज में दब गए और आत्महत्या के सिवा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा। सेंथिल और उनके साथ आए किसान कोई छोटे किसान नहीं हैं। सब के पास अच्छी जोत है। सेंथिल के पास 15 एकड़ जमीन है। कुछ सालों पहले तक वे चावल, गन्ना और केला की खेती करते थे। लेकिन अब सिचाईं के लिए पानी न मिलने के कारण खेती तबाह है। कर्ज लेकर पशुपालन करना भी घाटे का सौदा साबित हुआ। क्योंकि सूखे में पशुओं के लिए भी पानी-चारा जुटाना मुश्किल है। त्रिची के मरवानूर गांव के रहने वाले सेंथिल कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि हमारे यहां की जमीन उपजाऊ नहीं है। पानी की कमी के कारण किसान तबाह हो रहे है।

त्रिची के फुल्लमवाड़ी गांव के पचपन वर्षीय नटराजन के पास लगभग 12 एकड़ जमीन है। लेकिन सब खाली पड़ी है। खेती से परिवार और बच्चों का गुजर नामुमकिन हो गया है।

एक समय मदुरै के संपन्न किसानों में गिनती होने वाले ए. सेमन का परिवार अब तबाही के कगार पर है। सेमन विगत छह माह से दिल्ली आकर होटल में काम कर रहे हैं। पैतीस वर्षीय सेमन कहते हैं कि, “हमारे यहां नारियल की खेती होती थी। लेकिन पानी के कमी के कारण नारियल की खेती उजड़ गई है। मेरे परिवार द्वारा सात एकड़ नारियल की खेती की जाती थी। हमारे पास लगभग पांच सौ नारियल के पेड़ थे। फल और पेड़ सब सूख गए।“ सेमन कहते हैं कि कृषि उत्पादों का मूल्य तय न होने के कारण किसानों को सस्ते में फसल बेचना पड़ता है। अधिक उत्पादन होने पर भी किसानों के बजाय बिचौलियों को फायदा मिलता है।

सेमन कहते हैं कि तमिलनाडु में हर साल आत्महत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं। वे आत्महत्या का कारण कर्ज बताते हैं। उनका कहना है कि किसानों का कर्ज बहुत ज्यादा नहीं है। बैंकों से अधिकांश कृषि लोन लिया गया है। जो मुश्किल से एक लाख से पंद्रह लाख के बीच है। गांवों में किसानों की हालत इतनी खराब है कि पेट भरने के लिए महिलाओं को अपना मंगलसूत्र तक बेचना पड़ रहा है।

किसानों का कहना है कि चावल, गन्ना, मूंगफली, कपास, केला और नारियल किसानों की दशा एक जैसी है। सब नकदी कृषि है लेकिन इसके बावजूद किसानों को कुछ नहीं मिलता है। सेमन कहते हैं कि नारियल जब होता है तो किसानों को दस रुपये की जगह दो रुपये मिलता है।

राष्ट्रीय दक्षिण भारतीय नदियां किसान संघ के अध्यक्ष पी. अयाकन्नू कहते हैं कि, ‘हमारी मांग पूरी नहीं हुई तो हम सब सौ दिनों तक भूख हड़ताल करेंगे।’

कर्ज और आत्महत्या के बीच झूल रहे तमिलनाडु के लगभग ढाई सौ किसान आधे बदन पर कपड़ा लपेटे जंतर-मंतर पर इस उम्मीद से बैठे हैं कि उनके ऊपर भी मीडिया और सरकार की नजर पड़ेगी।

प्रदर्शनकारी किसानों की प्रमुख मांगें

1. कृषिऋण को सरकार माफ करे।

2. तमिलनाडु को रेगिस्तान बनने से रोकना।

3. कावेरी नदी को सूखने से रोकना।

4. कावेरी नदी के लिए प्रबंधन समिति का गठन।

5. मदुरै के इंजीनियर एसी कामराज की स्मार्ट जलमार्ग परियोजना द्वारा सभी नदियों को आपस में जोड़ना।

6. कृषि उत्पादों के लिए उचित और लाभदायक मूल्य का निर्धारण।

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