बढ़ता भारत है अस्वस्थ भारत

भारत में अमीर और ग़रीब के बीच बढ़ती खाई की तस्वीर 29 मई 2026 को जारी हुए हालिया राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण – VI से और ज़्यादा साफ़ होती नज़र आती है :

एक ओर पुरुषों में मोटापे की दर में 22.9% से 27.3% की और स्त्रियों में 24% से 30% की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है।

वहीं दूसरी ओर, 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में बौनापन (स्टंटिंग) (आयु के अनुसार कम लम्बाई) 29.3% की ऊँची दर पर बरक़रार रहा। 

अत्यधिक कमज़ोरी (वेस्टिंग) (लम्बाई के अनुसार दुबलापन) 5.2% की दर पर बना रहा।

5 वर्ष से कम की आयु के बच्चों में अल्प वज़न 31.8% की दर ऊँची बनी रही, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण V (2019-21) की तुलना में इसमें बेहद मामूली गिरावट, 32.1% से 31.8% दर्ज की गयी। श्रीलंका के हालिया आँकड़ों के अनुसार अल्प वज़न की दर वहाँ 21% है।

मोदी का दावा है कि वे भारत को दो दशकों में विकसित भारत बना देंगे। पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं के हालात क्या हैं? आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) देशों में बौनापन और कमज़ोरी न के बराबर हैं। और भारत में एक-तिहाई बच्चे अब भी अल्प वज़न का शिकार हैं, और इस आंकड़े में कई वर्षों में बेहद मामूली गिरावट दर्ज की गयी है। यही दर बरक़रार रही तो भारत को विकसित देशों के स्वास्थ्य स्तर तक पहुँचने और स्वास्थ्य सुविधा में विकसित भारत बनने में दशकों लग जाएँगे।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण एक गहन सर्वेक्षण है जिसकी शुरुआत 1992-93 में हुई थी। उसी वर्ष पहला सर्वेक्षण किया गया था। दूसरा सर्वेक्षण 1998-99, तीसरा 2004-06, चौथा 2015-16 और पाँचवा 2019-20 में किया गया था। छठा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2023-24 में किया गया था जिसमें 715 ज़िलों में 6.8 लाख घरों को शामिल किया गया था। हालाँकि कुछ महत्वपूर्ण मानकों को शामिल न करने के कारण इसकी आलोचना भी हुई है।

तिस पर भी यह स्वास्थ्य सर्वेक्षण आयुष्मान भारत, कर्मचारी राज्य बीमा योजना जैसी केन्द्र और राज्य सरकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों की प्रभावोत्पादकता के मूल्याँकन हेतु ज़रूरी आंकड़ें मुहैया करते हैं।

स्वास्थ्य बीमा पर एकतरफ़ा ज़ोर से सार्वजनिक स्वास्थ्य के अवसंरचना की उपेक्षा तक

स्वास्थ्य सुरक्षा भारत में सामाजिक सुरक्षा की आधारशिला है। अब यह साफ हो चुका है कि पिछले 11 वर्षों में मोदी सरकार की नीतियों का मुख्य ज़ोर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को बेहतर करने के बजाय स्वास्थ्य बीमा कवरेज को बढ़ाने मात्र पर रहा है। यह स्वास्थ्य के बढ़ते निजीकरण और बाज़ारीकरण की सामान्य प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है। इसी पृष्ठभूमि में एनएफ़एचएस-VI के अनुसार भारत की 39.8% आबादी आयुष्मान भारत, ईएसआईसी या सीजीएचएस जैसी सरकारी स्वास्थ्य वित्तपोषण योजनाओं के दायरे में नहीं आती। 

कहने का अर्थ यह है कि भारत कि 40% आबादी मुख्य रूप से प्राथमिक से तृतीय स्तर के स्वास्थ्य केन्द्रों, विशेषतः सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थाओं के निःशुल्क और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर है। पर स्वास्थ्य अवसंरचना का विस्तार करने के बदले सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को स्वास्थ्य बीमा सेवा के भरोसे छोड़ अपना पल्ला झाड़ने का काम कर रही है।

यह परोक्ष रूप से स्वास्थ्य सुविधाओं के निजीकरण का रास्ता तैयार करना है क्योंकि स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ मुख्यतः निजी अस्पतालों और बीमा योजना कम्पनियों को लाभ देती हैं। इस तरह यह रिपोर्ट मोदी सरकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों की खामियों को उजागर करती है।

चुनिन्दा आँकड़ों की दुरव्याख्या द्वारा भ्रामक प्रशंसा

एनएफ़एचएस-VI के कुछ चुनिन्दा आँकड़ों की व्याख्या के आधार पर मीडिया रिपोर्ट आँखों पर पट्टी बाँध कर भारत के स्वास्थ्य सुविधाओं के गुणगान गा रही है। वे टीकाकरण के स्तर के 87.1% पहुँचने पर सरकार की तारीफ़ों के पुल बाँध रहे हैं। यूनिसेफ़ के आँकड़ों के अनुसार भारत में 5 वर्ष से कम की आयु के लगभग 11 से 11.5 करोड़ बच्चे हैं। कहने का अर्थ यह कि 1.32 से 1.38 करोड़ बच्चे अब तक भी पूर्ण रूप से टीकाकृत नहीं है, जो एक बड़ी संख्या है।

मतलब अब भी एक करोड़ से ज़्यादा बच्चे डिप्थीरिया, काली खाँसी, टिटनस, पोलियो, ख़सरा, हेपेटाइटिस-बी, तपेदिक और जापानी इंसेफेलाइटिस जैसी घटक बीमारियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। दूरस्थ आदिवासी समुदायों में ऐसे बच्चों का अनुपात और अधिक है।

यही नहीं, यह दावा कि पूर्ण टीकाकरण कवरेज 83.8% से बढ़कर 87.1% हो गया है, इस तथ्य से मेल नहीं खाता कि डबल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2019 में काली खाँसी के 1.36 करोड़ मामले, टीबी के 20 लाख मामले, और जापानी इंसेफेलाइटिस के 56,847 मामले और नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार 19,705 खसरे और 3.5 करोड़ हेपेटाइटिस-बी के मामले दर्ज किये गये थे। रिपोर्ट इस विसंगति का कोई स्पष्टीकरण नहीं देता।

स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते निजीकरण की अस्वस्थ प्रवृत्ति

स्वास्थ्य सुविधाओं के निजीकरण के अपने नुकसान हैं। 2025 में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के हाथों में बाह्य रोगी सेवाओं (ओपीडी) का 70-80% और आन्तरिक रोगी सेवाओं (आईपीडी) का 60-70% हिस्सा था। 2025 के अन्त तक सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश के कुल स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना में निजी अस्पतालों का हिस्सा 11.8 लाख बिस्तर और 44,000 अस्पताल के साथ 62% था। यह रिपोर्ट निजी स्वास्थ्य सेवा के खामियों को रेखांकित नहीं करती है, ख़ास तौर पर यह कि किस प्रकार निजी अस्पताल – विशेषकर तथाकथित कॉर्पोरेट अस्पताल – मजबूर मरीज़ों का भयंकर आर्थिक शोषण करते हैं।

हालात ऐसे हैं कि कोई मरीज़ मामूली से सर्दी-ज़ुकाम के लिए भी यदि निजी अस्पतालों का रुख़ करता है तो उससे कम से कम 1 लाख रुपये की चपत लग जाएगी। सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा के प्रति मध्य वर्ग की विमुखता कई शहरों में मध्य वर्ग समेत निम्न मध्य वर्ग को भी निजी अस्पतालों के चंगुल में धकेलने का काम कर रही है।

कॉर्पोरेट अस्पतालों द्वारा ग़ैर-ज़रूरी जाँच और विशेषज्ञ परामर्श के नाम पर वसूले जाने वाली अत्यधिक फ़ीस अक्सर ही सुर्खियाँ बन जाती हैं। सरकार निजी अस्पतालों में फ़ीस को नियंत्रित करने के लिये कोई कार्रवाई नहीं करती। 2025 में जारी एनएसओ की 80वीं दौर की रिपोर्ट के अनुसार उसी इलाज के लिये निजी अस्पताल सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा संस्थानों से 16 गुना अधिक फ़ीस वसूलते हैं।  

मसला इतना गम्भीर हो गया कि सर्वोच्च न्यायालय को सीधे दखल देना पड़ा। फरवरी 2024 में एक मसले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को निजी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा दरों के मानकीकरण और विनियमन के आदेश जारी किये। उन्होंने यह भी सुझाया कि केन्द्र सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) की दरों को मानक के रूप में इस्तेमाल किया जाये।

पुनः मार्च 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकारों को दवाओं और उपकरणों की मनमानी क़ीमतों पर रोक लगाने का निर्देश दिया। परन्तु न्यायालय के इस दिशा निर्देश का पालन नहीं हुआ। निजी अस्पतालों ने सहयोग करने से इंकार कर दिया और सस्ते स्वदेशी स्टेंट आदि का इस्तेमाल करने से माना कर दिया और सरकार ने अन्ततः हार मान ली।  

एनएफ़एचएस-VI सिजेरियन प्रसव में हुई वृद्धि को भी रेखांकित करती है, जो बढ़ कर 21.5% से 27.2% हो गयी है, जो डबल्यूएचओ द्वारा सुझाये गये आदर्श सीमा 10-15% से कहीं अधिक है। यह मसला मुख्यतः निजी अस्पतालों से जुड़ा हुआ है। ज़्यादा पैसे वसूलने के इरादे से वे सामान्य प्रसव की संभावना के बावजूद ग़ैर-ज़रूरी सिजेरियन ऑपरेशन कर देते हैं। निजी अस्पतालों में लूट केवल सिजेरियन ऑपरेशन तक सीमित नहीं है। 

स्त्री स्वास्थ्य की अवहेलना

एनएफ़एचएस-VI की रिपोर्ट के अनुसार इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाली स्त्रियों की संख्या एनएफ़एचएस-V की 33.5% से बढ़कर 64.3% हो गयी है, निजी तौर पर फ़ोन इस्तेमाल करने वाली स्त्रियों की संख्या 53.9% से बढ़कर 63.6% हो गयी है, बैंक खाता रखने वाली महिलाओं की संख्या (जनधन योजना के सौजन्य से) 78.6% से 89.0% हो गयी है, और इन आँकड़ों को स्त्री सशक्तिकरण और वित्तीय समावेशन के रूप में उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है।

लेकिन यह रिपोर्ट इन उपलब्धियों की स्त्री स्वास्थ्य पर पड़ने वाले सीधे प्रभाव का कोई विश्लेषण नहीं करती है। 

यदि भारत में मातृ मृत्यु दर को 130 प्रति लाख जीवित जन्मों से घटकर 88 प्रति लाख जीवित जन्म के स्तर पर पहुंचाया गया है तो इसका श्रेय मुख्यतः आशाकर्मी और एएनएम को जाता है। उनपर काम का अतिरिक्त बोझ होता है पर उनके काम की स्थिति ख़ुद दयनीय है। उन्हें वेतन के नाम पर बेहद कम मेहनताना मिलता है और कोई श्रम अधिकार नहीं मिलता है। एनएफ़एचएस-VI की रिपोर्ट उनकी समस्याओं का ज़िक्र भी नहीं करती। 

लगभग 96% संस्थागत प्रसव और 87% पूर्ण टीकाकरण हासिल करना निश्चय ही कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। एनएफ़एचएस-VI की रिपोर्ट इसके लिए स्वास्थ्य नीति निर्धारकों और प्रशासकों की प्रशंसा करते हैं। पर यह उपलब्धि 13.86 लाख डॉक्टरों, 40 लाख नर्सों, और क़रीब 11 लाख पैरामेडिकलकर्मियों के मेहनत का नतीजा है। ये वे लोग हैं जिन्होंने कोविड-19 से लड़ते हुए भारत में लाखों लोगों की जान बचायी और ऐसा करते हुए अपने ही साथियों को खो दिया।

आज वे, ख़ासतौर पर जो निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं, कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। लेकिन इस रिपोर्ट में इन समस्याओं के प्रति कोई सरोकार ही नहीं है जैसे कि उनका सवास्थ्य समस्याओं से कोई वास्ता ही नहीं।

निष्कर्ष के तौर पर एनएफ़एचएस-VI कि रिपोर्ट से छह महीने पहले प्रकाशित एनएसओ के 80वें दौर के सर्वेक्षण में यह पाया गया था कि सर्वेक्षण के दौरान ख़ुद को बीमार बताने वालों की संख्या पिछले 30 वर्षों में दुगुनी हो गयी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि विश्व के प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से बढ़ता भारत अधिक स्वस्थ्य नहीं है; बल्कि पहले से अधिक बीमार है।

(बी सिवरामन लेखक, शोधकर्ता हैं। अंग्रेज़ी से अनुवाद : वृषाली श्रुति)

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