Monday, January 24, 2022

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कृष्ण प्रताप सिंह

विधानसभा चुनाव: इस बार ‘जातियुद्ध’ व ‘धर्मयुद्ध’ से बचेगा उप्र?

उत्तर प्रदेश में जब भी चुनाव आते हैं, वे लोकसभा के हों, विधानसभा के या फिर नगर निकायों और पंचायतों के ही क्यों न हों, उन्हें जातियों व धर्मों के युद्धों में बदलने की कोशिशें खासी तेज हो जाती...

तो क्या वे मौतें ‘नजरों का धोखा’ थीं?

मरो भूख से, फौरन आ धमकेगा थानेदार/लिखवा लेगा घरवालों से-’वह तो था बीमार’/अगर भूख की बातों से तुम कर न सके इंकार/फिर तो खायेंगे घर वाले हाकिम की फटकार/ले भागेगी जीप लाश को सात समुन्दर पार/अंग-अंग की चीर-फाड़ होगी...

क्या कहती है मंत्री की यह तिलमिलाहट?

मंत्री केन्द्र के हों या राज्यों के, पत्रकारों के सारे सवालों के जवाब नहीं देते। अप्रिय, असुविधाजनक अथवा गैरजरूरी लगने पर ‘नो कमेंट’ कहकर आगे बढ़ लेते हैं। गत बुधवार को लखीमपुर खीरी में पत्रकारों के सवालों से चिढ़कर...

नगालैंड कांड: सरकार को समझना होगा कि इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा कुछ भी नहीं

हिन्दी के तीसरे सप्तक के महत्वपूर्ण कवियों में से एक सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, जिनकी कविताओं को उनकी असाधारण साधारणता के लिए जाना जाता है और जो कवि के तौर पर देश के जनसाधारण से इस हद तक सम्बद्ध थे कि...

मूर्खों के स्वर्ग से बाहर निकलिये हुजूर और थोड़े शरमाइये!

निस्संदेह, यह ऐसा समय है जब उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को शर्म महसूस करनी चाहिए कि प्रदेश में रामराज्य ला देने के उसके दावे एक के बाद एक हवा में उड़ते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी...

फिर वही सपनों की सौदागरी!

अकारण नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भीतर का सपनों का सौदागर एक बार फिर जाग उठा है। 2014 में उनके भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के बाद से ही यह परम्परा-सी बन गई है...

नागरिक इतने ‘अवांछनीय’ क्यों हो गये हैं?

दिल्ली-एनसीआर में दमघोंटू प्रदूषण के मामले पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने गत दिनों जिस तरह नौकरशाहों को फटकारा और पूछा कि अगर सब कुछ न्यायालय को ही करना है तो भला वे किसलिए हैं, वह सच पूछिये...

इतना तो समझ लेते भाई कि काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ा करती!

प्रायः हर चुनाव के वक्त हिंदू बनाम मुसलमान, श्मशान बनाम कब्रिस्तान या होली बनाम ईद करने वाली भारतीय जनता पार्टी के रहते शायद ही किसी को उम्मीद रही हो कि उसके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन चुके पांच राज्यों...

जयंती पर विशेष : व्यवस्था के खिलाफ मुक्तिबोध में दबा बम धूमिल में फट पड़ा!

‘क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है, जिन्हें एक पहिया ढोता है या इसका कोई मतलब होता है?’ हिन्दी कविता के एंग्रीयंगमैन सुदामा पांडे ‘धूमिल’ने अब से कई दशक पहले यह जलता व चुभता हुआ सवाल...

अब तो चेतिये हुजूर! जम्मू-कश्मीर आपके साम्प्रदायिक एजेंडे की कीमत चुकाने लगा

शुक्र है कि देर से ही सही, जम्मू कश्मीर में नागरिकों की लक्षित हत्याओं को लेकर केन्द्र सरकार की नींद टूटी और गृहमंत्री अमित शाह ने हालात की उच्चस्तरीय समीक्षा के बाद केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल व नेशनल इन्वेस्टिगेटिंग...

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों पर हैं। दूसरी ओर कोरोना का प्रकोप भी जोरो पपर है।...