प्रफुल्ल कोलख्यान

गिरोही चरित, छल-छलावा-छर्रा का खन-खन और छम-छम के माहौल में लोकतंत्र बेदम

अभी-अभी देश में इतने धूमधाम से धीर, उदात्त ललितचरित के आदर्श- मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा हुई… Read More

लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक सत्ता-हवस और कॉर्पोरेटी धन-हवस का इलाज मतपेटी में है

यह मान लेना चाहिए कि किसानी की समस्याओं को ठीक से समझने के प्रति हमारी राज्य-व्यवस्था कभी… Read More

खेल-खेल में, क्या खेल हुआ! लोकतंत्र क्या, फेल हुआ!

नौवीं बार नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने हैं। बिहार विधान सभा के अंदर सरकार में विश्वासमत के प्रति… Read More

रोजी-रोजगार विमुख लाभार्थी योजना कल्याणकारी नहीं है, न सेंगोल ही संवैधानिक न्याय का प्रतीक है

सत्रहवीं लोक सभा का अवसान हो चुका है। याद करें तो, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाई जा… Read More

भारत जोड़ो न्याय यात्रा और बुलडोजर न्याय के साए में होने वाले आम चुनाव का महत्व ?

सामने है-2024 का आम चुनाव। चुनावी माहौल में चल रही है भारत जोड़ो न्याय यात्रा। अचरज की… Read More

आलोचना की स्वतंत्रता का अवसर क्या जीवन में अवसरवाद का राज-द्वार खोल देता है?

जैसे-जैसे 2024 का आम चुनाव नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे भारत के राजनीतिक दलों की गतिविधियों में… Read More

यह भावुकता की फांस से बाहर निकलकर बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से सोचने और विवेक को आजमाने का क्षण है‎

भारत में जनवरी महान गणतंत्र, महात्मा गांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस का महीना है। भारत में ही… Read More