Friday, August 12, 2022

देश में किसी व्यक्ति को एक ही कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री होना चाहिए: अरुंधति रॉय

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आज जब हम नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया पर दिल्ली पुलिस के हमले के दो साल पूरे होने को याद कर रहे हैं, तो हमें सीएए-एनआरसी से बात शुरू करनी चाहिए। हमें यह याद करने की ज़रूरत है कि जामिया से लेकर शाहीन बाग़ और पूरे देश में जो आंदोलन खड़ा हुआ, वह किन अंदेशों को समझते हुए खड़ा हुआ था। आख़िर इस सीएए-एनआरसी की असलियत क्या है।

2019 में जब सीएए-एनआरसी की बात हो रही थी, तब मैंने असम की यात्रा की और उन गाँवों में और ब्रह्मपुत्र नदी के उन छोटे-छोटे द्वीपों में गई, जहां 19 लाख लोगों के नाम एनआरसी से निकाल दिए गए थे।

दरअसल एनआरसी की यह बात असम में बांग्लादेशी प्रवासियों के ख़िलाफ़ शुरू हुई थी। और अब इसको पूरे देश में लागू करने की कोशिश की जा रही है, जिसके साथ नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) ले आया गया। सीएए और एनआरसी को मिला कर मुसलमान समुदाय के ख़िलाफ़ लाया गया है। इसमें कोई शक नहीं है। यह फासीवादी दक्षिणपंथी हिंदू सरकार अपने नागरिकों को अवैध ठहराने की कोशिश कर रही है। लेकिन अगर आप व्यवहार में देखें कि असम में जो हो रहा है, उसमें एनआरसी से बेदख़ल किए गए बहुसंख्यक लोग मुसलमान नहीं हैं। ऐसा इसलिए हुआ कि वहाँ मुसलमान लोगों को अपने ऊपर ख़तरों का अंदाज़ा था, उन्होंने अपने काग़ज़ात को सावधानी से सँभाल कर रखा था। वहाँ जिन लोगों के पास काग़ज़ नहीं हैं वे हैं गरीब लोग, दलित, आदिवासी, औरतें। इस तरह हम देखते हैं कि सीएए-एनआरसी इस कट्टरपंथी, फासीवादी सरकार का एक ऐसा कदम है, जो इस देश के नागरिकों के पैर के नीचे से ज़मीन खींच लेने के लिए बना है।

इतिहास में अब तक एक ही बार ऐसा हुआ है कि किसी राज्य ने देश की जनता से कहा हो कि वह इसका फ़ैसला करेगा कि देश में रह रहे लोगों में नागरिक कौन है, और इसका फ़ैसला उन दस्तावेज़ों के आधार पर होगा जिसकी मंज़ूरी राज्य देगा। यह 1935 में नाज़ी जर्मनी में हुआ था, जब न्यूरेम्बर्ग सिटिजनशिप लॉ बनाए गए थे। नागरिकता को साबित करने के लिए हिटलर के राज ने जिस तरह के दस्तावेज़ तय किए थे, उन्हें अब लीगेसी पेपर्स कहते हैं।

हाना आरेंट एक यहूदी बुद्धिजीवी थी, जिसने कहा था कि नागरिकता अधिकारों का अधिकार है, जिसके होने से आपको सारे अधिकार मिलते हैं। ऐसे में क्या होगा जब आपकी नागरिकता पर ही ख़तरा आ जाए। जब पूरी की पूरी आबादियों की, दलितों, मुसलमानों, आदिवासियों की नागरिकताएँ ख़तरे में पड़ जाएँ। उनके लिए असम में डिटेन्शन सेंटर बनाए जा रहे हैं। आप जानते होंगे उनको बनाने के लिए मेहनत करने वाले कौन लोग हैं, उनकी सामाजिक और आर्थिक हालत क्या है, किसी दिन वे ख़ुद उस सेंटर में क़ैद हो सकते हैं। लेकिन सीएए-एनआरसी को जिस पैमाने पर लागू किया जा रहा है, उसमें ख़तरा तो करोड़ों लोगों के सामने है, और सरकार क्या करोड़ों लोगों को डिटेन्शन सेंटर में डाल सकती है? नहीं।

ये डिटेन्शन सेंटर इसलिए भी बनाए जा रहे हैं ताकि वे यह बात हमारी कल्पना में क़ायम कर दें कि डिटेन्शन सेंटर ही इन लोगों की जगह है। मुसलमानों की जगह, आदिवासियों की जगह, दलितों की जगह डिटेन्शन सेंटर में है, क्योंकि उनके पास कोई हक़ नहीं है। जब समुदायों से उनका हक़ छीन लिया जाए, तो उनकी सामाजिक स्थिति क्या हो जाएगी? यह एक नई जाति व्यवस्था की तरह होगी। यह हुकूमत एक तरह से नई जाति व्यवस्था बना रही है, जो पुरानी जाति व्यवस्था के साथ-साथ चलेगी, जिसमें कुछ नागरिकों के पास अधिकार होंगे, कुछ के पास नहीं होंगे। ऐसी स्थिति में हम सब उजड़ जाएँगे, तितर-बितर हो जाएँगे और इस देश में, इस समाज में अपनी-अपनी जगह खोजते फिरेंगे। ऐसे में हम कैसे लड़ेंगे?

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों ने जो किया, हमें इसी के संदर्भ में उसे समझने की ज़रूरत है। उन्होंने जो किया वह बहुत अहम है। उन्होंने इस बुनियादी ख़तरे को समझा, और उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा ख़तरा है जिससे लड़ना होगा और सरकार को वापस लेने पर मजबूर करना होगा।

और वे हम सबके लिए खड़े हुए।

अगर आप भाजपा और आरएसएस की विचारधारा को देखेंगे तो उसमें वह साफ-साफ और सरेआम जिन लोगों से नफ़रत करती है, वे हैं मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट। इन तीन समुदायों से उनकी नफ़रत सार्वजनिक है। लेकिन यह सरकार ऐसी है जो सबसे घृणा करती है। यह ख़ुद को देशभक्त कहती है, लेकिन यह देश के ग़रीबों से, मज़दूरों, आदिवासियों, दलितों से घृणा करती है। मुसलमानों से तो यह घृणा करती ही है, अपने ख़ुद के वोटरों से भी घृणा करती है। इसे जानना हो तो आप नरेंद्र मोदी के काम करने का तरीक़ा देखिए। उनके उठाए गए कदमों से झलकता है कि जनता एक दुश्मन है, जिस पर घात लगा कर हमला करना है।

सबसे पहले यह नोटबंदी से शुरू हुआ, बीच रात में। यह ऐसा था जैसे कोई क्रिकेट का बैट लेकर आपकी रीढ़ की हड्डी को तोड़ दे। नोटबंदी उसी तरह का एक हमला था। उसके बाद आया सीएए-एनआरसी। जिस तरह इन्होंने पहले नोटबंदी की, उसी तरह कोविड महामारी के दौरान चार घंटे की नोटिस में लॉकडाउन लगाया। इसके नतीजे में हमने देखा कि किस तरह लाखों मज़दूरों के लिए एक ख़ौफ़नाक त्रासदी खड़ी हो गई। इस सरकार के ज़ेहन में ही नहीं था कि इस देश में ऐसे लोग भी होते हैं जो एक-एक कमरे में रहते हैं, उन्हें उसका रेंट देना है, उसके लिए उन्हें काम करना है, नहीं करेंगे तो वे शहर में रह ही नहीं सकते हैं। लॉकडाउन लगने के बाद उनको रातो-रात हज़ारों मील पैदल चल कर अपने गाँव लौटना पड़ा।

फिर उसके बाद आया किसान क़ानून, जिसका मक़सद किसानों की ज़मीनें छीनना है। यह किसानों के अस्तित्त्व को ख़त्म करने वाला क़ानून है। यह सब ऐसी चीज़ें हैं जो छत्तीसगढ़ में, नर्मदा घाटी में पहले से चल रही हैं। लेकिन वे लोग ग़रीब हैं, बहुत दूर हैं, गाँवों में रहते हैं, तो उनकी बातें कोई नहीं सुन रहा था। अब जब पानी नाक तक पहुँचा है तो यह बात सबकी समझ में आ रही है कि जो लोग इस देश पर हुकूमत कर रहे हैं वे कैसे लोग हैं, और वे क्या कर रहे हैं।

छात्रों ने इन अंदेशों को समझा और विरोध किया। और भी बहुत सारे लोगों ने, एक्टिविस्टों ने, वकीलों ने, बुद्धिजीवियों ने, संस्कृतिकर्मियों ने इन बातों को समझा। और यही वजह है कि उन पर हमले किए गए। जामिया में, जेएनयू में छात्रों के ऊपर हमले हुए, उन्हें बदनाम किया गया, उससे पहले उमर ख़ालिद जैसे छात्रों के साथ 2016 से जो हो रहा है, वह इस हुकूमत के एक चरित्र को दिखाता है। यह फासीवादी हुकूमत सिर्फ़ बुद्धिजीवियों और बौद्धिकता के ख़िलाफ़ नहीं है, यह हर क़िस्म की समझदारी के ख़िलाफ़ है।

यह खेती की समझदारी के ख़िलाफ़ है, यह ज़मीन पर काम करने की समझदारी के ख़िलाफ़ है, यह कारीगरों और शिल्पियों की समझदारी के ख़िलाफ़ है। यह किसी भी चीज़ को नहीं समझती, सिवाय नफ़रत के। हमारे पास एक ऐसी सरकार है जो देश को प्यार करती है लेकिन लोगों से प्यार नहीं करती है। दो दिन पहले हमने देखा मोदी जी बनारस में एक मंदिर में सीमेंट के भारत माता के नक़्शे को प्रणाम कर रहे थे। आज जबकि उनकी नीतियों के चलते पूरा देश आर्थिक रूप से, और कोरोना महामारी में, बदहाल है। आज जब इस देश के एक्टिविस्ट जेल में है, छात्र जेल में हैं, बुद्धिजीवी जेल में हैं, आख़िर वे किस देश की पूजा कर रहे थे? किसानों की नहीं, दलितों की नहीं, मज़दूरों की नहीं, महिलाओं की नहीं, आदिवासियों की नहीं।

वे पूजा करते हैं तो अंबानी की, अडानी की।

इन हालात को बदलना होगा, और यह आसान नहीं है। उन्होंने सत्ता पर अपनी पकड़ को बनाए रखने के लिए चुनाव की पूरी व्यवस्था ही बदल दी है। अब चुनावों में किसी दल के पास पर्याप्त संसाधन नहीं है, सिर्फ़ भाजपा ही ऐसा दल है जिसके पास चुनाव की फ़ंडिंग है। चुनावी बॉन्ड्स के बारे में लाया गया कानून, निर्वाचन क्षेत्रों की बदली जाने वाली सीमाएं – हर चीज़ इस तरह की जा रही है कि वे सत्ता में बने रहें।

आज इस देश के संस्थानों पर सिर्फ़ भाजपा का नहीं, बल्कि आरएसएस और उसकी विचारधारा का क़ब्ज़ा है। यह क़ब्ज़ा ऐसे किया गया है कि अगर वे चुनाव हार भी जाएँ, तब भी सत्ता में उन्हीं के लोग रहेंगे। हमने ख़ुद देखा कि किस तरह मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने सर्वोच्च न्यायालय को एक प्रशासनिक संगठन में बदल दिया, उसे सीएए-एनआरसी के रोज़मर्रा के कामकाज की निगरानी करने का ज़िम्मा दे दिया। यह तब किया गया जब यह सवाल अभी हल नहीं हुआ था कि सीएए-एनआरसी संवैधानिक है भी कि नहीं, वे इस सुनवाई को ही टालते रहे। इन क़ानून की संवैधानिकता पर सवाल खड़े थे और न्यायालय इसको तय किए बिना इसको लागू कर रहा था। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का मज़ाक़ बना दिया।

ऐसे हालात में हम सबके लिए बड़ा सवाल है कि भविष्य क्या होने जा रहा है। इसका जवाब मुश्किल बना रहेगा जब तक हम यह नहीं समझते कि ये सारे संघर्ष आपस में जुड़े हुए हैं, जब तक हम अलग-अलग लड़ते रहेंगे। वे यही चाहते हैं कि हम अलग-अलग बने रहें, जामिया के छात्र सिर्फ़ जामिया के लिए लड़ें, जेएनयू के छात्र सिर्फ़ जेएनयू के लिए लड़ें, छत्तीसगढ़ के लोग सिर्फ़ छत्तीसगढ़ के लिए लड़ें, किसान सिर्फ़ किसान के लिए लड़ें। वे यही चाहते हैं कि एक जाति दूसरे के खिलाफ, एक धर्म दूसरे धर्म के ख़िलाफ़ बना रहे। हम आज जिस हालात में हैं हमें समझना पड़ेगा कि चीजें ऐसे नहीं चल पाएँगी।

हमारा देश भारत एक सामाजिक करार पर बना है। यह करार सैकड़ों समुदायों, भाषाओं, धर्मों, जातीयताओं, जातियों, क्षेत्रों, नस्लों के बीच में है। अगर इस करार को तोड़ दिया जाए, और आरएसएस-भाजपा की विचारधारा इस करार को तोड़ने की विचारधारा है, तो भारत नहीं रहेगा। शायद दस या बीस साल लगेंगे, लेकिन इस करार के टूटने के बाद भारत भी नहीं रह जाएगा। अगर आप देखना चाहते हैं कि देश कैसे ख़त्म होते हैं तो आप बस सोवियत संघ और यूगोस्लाविया को देख लीजिए।

इसलिए हमें यह समझने की ज़रूरत है कि जामिया और एएमयू के छात्रों ने और उन सारे लोगों ने, जो सीएए के ख़िलाफ़ खड़े हुए, उन्होंने समझा कि यह हमारे देश के सामने बुनियादी ख़तरा है। और उनमें से कई लोग आज यूएपीए के तहत जेल में हैं। किसी लोकतंत्र में ऐसा कोई क़ानून कैसे हो सकता है कि आप किसी को उठा कर सालों के लिए जेल में बंद कर दें। वे इसे प्रिवेंटिव डिटेन्शन कहते हैं, एक लोकतंत्र में ऐसे क़ानून की जगह कहां होती है? इस आतंकवाद के क़ानून के तहत सरकार ने जिस-जिस को भी उठाया है, उसे अच्छी तरह मालूम है कि वे आतंकवादी नहीं हैं। इसीलिए वे उन्हें आतंकवादी कह रहे हैं। साईबाबा आतंकवादी नहीं हैं, सुधा भारद्वाज आतंकवादी नहीं हैं, आनंद तेलतुंबडे आतंकवादी नहीं हैं, सुरेंद्र गाडलिंग, गौतम नवलखा, उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, कोई भी आतंकवादी नहीं है। बल्कि सच्चाई इसके उलट है। आप जानते हैं खुर्रम परवेज़ क्यों जेल में हैं। क्योंकि वे कश्मीर में एक मज़बूत पाये की तरह खड़े थे, वे एक मुश्किल ज़मीन पर खड़े थे, जहां से वे वहाँ के अवाम के ख़िलाफ़ राज्य की कार्रवाइयों के खिलाफ भी थे और मिलिटेंसी के ख़िलाफ़ भी। कश्मीर पर भारतीय राज्य ने जो दहशत थोपी है, उनके संगठन ने इसके दस्तावेज़ तैयार किए। वे इसलिए जेल में हैं कि उन्होंने उस दहशत को और भारतीय राज्य को, जो एक दहशतगर्द राज्य है, उजागर किया।

यूएपीए इसी का एक नमूना है कि यह दहशत किस तरह थोपी जा रही है। अमित शाह ने यूएपीए को और भी कठोर बनाते हुए यह बात जोड़ी कि सिर्फ़ संगठन ही नहीं, व्यक्ति भी आतंकवादी माने जा सकते हैं। आप-हम, यहाँ मौजूद सभी नौजवान, छात्र, नेता, एक्टिविस्ट, और बुद्धिजीवी जेल में डाले जा सकते हैं। एक अगस्त 2019 को यूएपीए क़ानून में संशोधन के समय अमित शाह ने जो कहा था, वह मैं आपको पढ़ कर सुनाना चाहती हूँ।

यह छात्रों पर, बुद्धिजीवियों पर हमला है, यह हम सब पर हमला है जिनको अर्बन नक्सल कहा जाता है। और हमें इस हमले का एक साथ सामना करना है। जैसे इन्हें कृषि क़ानून वापस लेने पड़े, वैसे ही इनको सीएए-एनआरसी को वापस लेना पड़ेगा।

आख़िर में मैं दो और बातें कहना चाहती हूँ। पहली बात यह है कि इनको सत्ता से हटाना पड़ेगा। यह बात हमें साफ़-साफ़ कहने की ज़रूरत है कि जो भी विपक्षी दल आपस में एक दूसरे के साथ लड़ते हैं, वे फ़ासिस्टों के साथ हैं। उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं, हम चाहते हैं कि जो भी दल फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ हैं वो एक साथ हो जाएँ। और अगर वो नहीं होते हैं तो इसका मतलब है कि वो इनके साथ हैं।

दूसरी बात यह है कि हमें एक बड़ी अहम माँग उठाने की ज़रूरत है कि हमारे देश में कोई व्यक्ति सिर्फ़ एक ही कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री बन सकता है। हमें राजा-महाराजाओं का समय नहीं चाहिए। वह समय ख़त्म हो गया। अब हमें माँग करनी है कि एक व्यक्ति सिर्फ़ एक ही बार प्रधानमंत्री बन पाए, उससे ज्यादा नहीं। हमारी तरफ़ से यह एक लोकतांत्रिक माँग उठनी चाहिए।

शुक्रिया।

(जामिया मिलिया इस्लामिया और उसके छात्रों पर हुए हमले के दो साल पूरे होने के मौके पर दिल्ली प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम में लेखिका अरुंधति रॉय के भाषण का संपादित अंश। अनुवाद रेयाज़ुल हक़ ने किया है।)

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