Sunday, December 4, 2022

गांधी की दांडी यात्रा-15: गांधी के सत्याग्रह की व्यापकता और जिन्ना की असहमति 

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गांधी जी के लिए, अहिंसक प्रतिरोध, राजनीति के बड़े लक्ष्य तक पहुंचने का एक साधन भी था। सत्याग्रह को वह मनुष्य के उच्चतम धर्म, सत्य के मार्ग के रूप में देखते थे, और वह यह मानते थे कि, उच्चतम आध्यात्मिक सिद्धांत इस मार्ग में निहित हैं। इसलिए, गांधी का मानना था कि, जिन लोगों ने सत्याग्रह का मार्ग चुना है, उन्हें अनुशासित रहना ही चाहिए। उन्हें विचार और कर्म से, शुद्ध होना चाहिए और आत्म-बलिदान के लिए, सदैव तैयार भी रहना चाहिए, यहाँ तक कि, मृत्यु के लिए भी।

दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश और बोअर के बीच हुए युद्ध में, गांधी जी ने ब्रिटिश साम्राज्य का समर्थन तो किया था, पर वे अहिंसा के प्रति अपने संकल्प के कारण, युद्ध में भाग नहीं ले सकते थे, तो उन्होंने चिकित्सा और एम्बुलेंस सेवा का काम सम्भाल लिया था। बोअर युद्ध के दौरान, गांधी के चिर प्रतिद्वंद्वी, विंस्टन चर्चिल से, उनकी मुलाकात होते-होते भी बची थी, और दोनों की यह प्रतिद्वंद्विता, जीवन पर्यंत तक चली। चर्चिल, बोअर युद्ध में ब्रिटेन की तरफ से भाग लेने गए थे और गांधी युद्ध में घायल लोगों की सुश्रुसा में व्यस्त थे।

6 अक्टूबर, 1906 को, गांधी जी, जिस दिन दक्षिण अफ्रीका से, लंदन के लिए रवाना हुए, उस दिन रवाना होने के पहले, उन्होंने किसी भी प्रकार के अन्याय को, स्वीकार करने के बजाय, जेल जाने के निर्णय को “एक पवित्र कार्य के रूप में वर्णित किया था, और कहा था कि, केवल ऐसा करने से ही भारतीय समुदाय (दक्षिण अफ्रीका में) अपना सम्मान बनाए रख सकता है। आत्मसम्मान, कर्तव्य, हंसमुख स्वभाव, आत्म-बलिदान, यह सब उनके लिये पुरुषोचित और, लगभग सैनिक, लोकाचार थे।

इन सब मूल्यों के द्वारा ही, गांधी, सत्ता की ज्यादती के खिलाफ निष्क्रिय प्रतिरोध के रूप में, सत्ता के सामने डटने की, अपने सहयोगियों से, अपेक्षा करते थे। गांधी हमेशा “निष्क्रिय प्रतिरोध” शब्द के साथ असहज महसूस करते थे क्योंकि यह निष्क्रियता, एक प्रकार से कमजोरी को भी दर्शाता था। वे कहते हैं, “अगर हम खुद पर विश्वास करना जारी रखते हैं और दूसरों को यह विश्वास करने देते हैं कि, हम कमजोर और असहाय हैं और, इसलिए निष्क्रिय प्रतिरोध की बात करते हैं, तो, हमारा प्रतिरोध हमें कभी भी मजबूत नहीं बनाएगा।” 

(गांधी, सत्याग्रह, 156)

दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने, अपने आंदोलन हेतु, एक बेहतर शब्द गढ़ने के लिए, अपने अखबार, इंडियन ओपिनियन में एक प्रतियोगिता भी आयोजित की थी, जिसमें विजेता को पुरस्कार देने का भी प्रस्ताव रखा गया था। गांधी जी के,  चचेरे भाई मगनलाल, जो फीनिक्स फार्म में रह रहे थे, ने, इस हेतु, एक शब्द सुझाया, सदाग्रह, जिसका संस्कृत में अर्थ है “एक अच्छे कारण में दृढ़ता।” गांधी ने, सदाग्रह को, सत्याग्रह, या “सत्य के लिए दृढ़ता” में बदल दिया। “शब्द ‘सत्य’ “सत्’ से लिया गया है जिसका अर्थ है, होना। और सत्य के अलावा, कुछ भी नहीं है या मौजूद नहीं है।  इसलिए सत् या सत्य शायद ईश्वर का सबसे महत्वपूर्ण नाम है।” जहां तक ​​आग्रह शब्द का सवाल है, गांधी के दिमाग में इस शब्द का अर्थ केवल “दृढ़ता” या “दृढ़ता” से कहीं अधिक था। सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी के पृष्ठ 46, ‘यरवदा मंदिर’, में यह विवरण अंकित है। मगनलाल को, यह नाम सुझाने के लिये, पुरस्कृत भी किया गया था। जिस सत्याग्रह के मार्ग, का विधिवत परीक्षण, गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में कर चुके थे, आज वही, सत्याग्रह का नमक कानून तोड़ने और सरकार के प्रतिरोध का एक प्रमुख प्रतिरोध मार्ग बन चुका था। 

जिस दिन गांधी ने दांडी में कानून तोड़ा, गांधी जी के मित्र शौकत अली ने उन्हें एक शिकायती अंदाज में पत्र लिखा कि, “उन्होंने (गांधी जी) ‘मुसलमानों से परामर्श किए बिना’ अपना (नमक सत्याग्रह) आंदोलन शुरू कर दिया है, और अब आप इतनी ताकत हासिल करना चाहते हैं कि, “अप्रतिरोध्य” हो जाएं और हमें अपनी मर्जी से मजबूर होने के लिए मजबूर करें।” राम चन्द्र गुहा की किताब, गांधी, द ईयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड में इस प्रसंग का संदर्भ बहुत विस्तार से दिया गया है। दरअसल शौकत अली और गांधी जी के रिश्ते, खिलाफत आंदोलन के बाद, थोड़े ठंडे पड़ने लगे थे। खिलाफत आन्दोलन, मार्च 1919-जनवरी 1921 तक देश मे चला था।

तुर्की के खलीफा को अपदस्थ करने में ब्रिटेन की भूमिका से नाराज मुस्लिम समुदाय के अली बंधुओं के साथ मिल कर, गांधी जी ने यह आंदोलन चलाया था। मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना शौकत अली, तब देश में मुस्लिमों के सबसे बड़े नेता के रूप में उभरे थे और इतिहास में उन्हें अली बंधु के नाम से जाना जाता है। मार्च 1919 में बम्बई में एक खिलाफत समिति का गठन किया गया था। मोहम्मद अली और शौकत अली के साथ-साथ अनेक अन्य मुस्लिम नेताओं ने इस मुद्दे पर संयुक्त जनकार्यवाही की सम्भावना तलाशने के लिए महात्मा गांधी के साथ चर्चा शुरू कर दी। सितम्बर 1920 में कांग्रेस का कोलकाता अधिवेशन, महात्मा गांधी की अध्यक्षता में हुआ था। अली बंधु, मुहम्मद अली और शौकत अली, उस समय, गांधी जी के अनन्य सहयोगी थे और तब गांधी जी के असहयोग आंदोलन के साथ, पूरी ताकत से खड़े थे। 

लेकिन, गांधी जी के द्वारा, चौरीचौरा हिंसा के बाद, असहयोग आन्दोलन को वापस लेने और खिलाफत आंदोलन की समाप्ति के बाद, अली बंधुओं, से गांधी जी की दूरी बढ़ने लगी। गांधी जी ने खुद को सामाजिक कार्यों में व्यस्त रखा और फिर उन्हें, देशद्रोह के एक मामले में, छः साल की सज़ा हुयी, हालांकि वे सज़ा पूरी होने के पहले ही स्वास्थ्य कारणों पर, रिहा कर दिए गए थे। मौलाना शौकत अली और गांधी जी में लंबे समय तक कोई गंभीर पत्र व्यवहार नहीं हुआ। बस दूरियां बढ़ती गयीं तो, बढ़ती ही चली गयीं। कांग्रेस के पूर्ण स्वराज के संकल्प अधिवेशन और 26 जनवरी 1930 के स्वतंत्रता दिवस के बाद, तो गांधी जी ने अपने सविनय अवज्ञा आंदोलन की योजना खुद ही बनाई। मौलाना शौकत अली, इस आंदोलन में, खुद को शामिल न किये जाने और इसके बारे में कोई सलाह मशविरा न लिए जाने के बारे में, यह उलाहना भरा पत्र लिखा था। उन्होंने यह भी लिखा था, मुसलमानों को, इस नए आंदोलन से पहले के आंदोलनों (असहयोग और खिलाफत आंदोलन) ,की तरह नहीं जोड़ा गया था। 

मौलाना शौकत अली के इस उलाहना भरे पत्र से गांधी जी को आश्चर्य हुआ। उन्होंने उत्तर दिया, “मुझे यह नहीं मालूम है कि, मैं कैसे और कितना आप की उम्मीदों पर नहीं उतर पाया हूँ, क्या मेरे पुराने मित्र, यह नहीं देख पा रहे हैं। हालांकि मैंने अपना कार्यक्रम (नमक सत्याग्रह) स्वतंत्र रूप से शुरू किया है, पर इसका यह मतलब नहीं कि, मैंने आप को छोड़ दिया है। मेरी अंतरात्मा साफ है। मैंने न तो आप को छोड़ा है और न ही मुसलमानों को। नमक कानून को तोड़ना और आज़ादी के लिये संघर्ष करना, (आप को या मुसलमानों को) छोड़ना कैसे हो गया?”

(कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, खंड 49, पृ.127) 

गांधी और अली बंधुओं के बीच की दूरी का एक कारण नेहरू रिपोर्ट भी थी, जिसे, मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित कमेटी द्वारा तैयार, संविधान का प्रथम मसौदा कहा गया था। उस रिपोर्ट को लेकर, मुस्लिम नेताओं को कुछ ऐतराज़ था। देश में बढ़ रहे साम्प्रदायिक उन्माद भी, आपसी गलतफहमियों को बढ़ाने में अपना योगदान दे रहे थे। कुछ दिनों बाद, बंबई में, भाषण देते हुए, मौलाना शौकत अली के भाई मोहम्मद अली ने कहा कि, “असहयोग आंदोलन, जिसकी शुरुआत, आज से दस साल पहले, गांधी ने किया था, वह, स्वराज पाने के लिये किया गया, एक वास्तविक आंदोलन था। लेकिन यह सविनय अवज्ञा आन्दोलन, (नमक सत्याग्रह) एक हिंदू राज को स्थापित करने के लिये चलाया जा रहा है। गांधी, अब पूरी तरह से हिंदू महासभा के प्रभाव में आ गये हैं, और अब वे मुसलमानों के साथ कोई सम्मानजनक समझौता करने के लिये तैयार नहीं हैं।” 

(राम चंद्र गुहा, द ईयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड, पृ.348)

यह एक बड़ा आक्षेप था और मुहम्मद अली के इस भाषण और शौकत अली के उपरोक्त पत्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि, गांधी और अली बंधु जो किसी समय घनिष्ठ मित्र थे, अब एक दूसरे से अलग होने लगे थे। मुहम्मद अली ने अपने अनुयायियों का आह्वान किया कि, वे इस सविनय अवज्ञा आंदोलन से दूर रहें और कहा कि, वे, खुद लंदन में होने वाली गोलमेज सम्मेलन में भाग लेंगे और, ब्रिटिश संसद में, मुसलमानों की तरफ से, उनकी बात रखेंगे। 

अली बंधुओं के इस बदलते दृष्टिकोण का एक कारण, गांधी के प्रति, उनका मोहभंग भी था और ईर्ष्या भी। अली बंधु, असहयोग और खिलाफत आंदोलन के समय 1920 – 22 के बीच गांधी जी के सबसे निकट और विश्वसनीय सहयोगियों में से एक थे। एमए जिन्ना, खिलाफत आंदोलन के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने, 1916 के लखनऊ समझौते के बाद, अचानक शुरू हुए, असहयोग और खिलाफत आंदोलन के समय गांधी और अली बंधुओं से, दूरी बना ली थी। गांधी का स्वाधीनता संग्राम और वैश्विक राजनीति में, कद बढ़ता जा रहा है। वे अपने कार्यक्रम खुद तय करते थे। उनकी रूपरेखा और रणनीति खुद बनाते थे और वे एक सर्वोच्च और निर्विवाद नेता के रूप में स्वाधीनता संग्राम में स्थापित हो गए थे। लेकिन एक कटु तथ्य यह भी है कि, 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में, मुसलमानों ने उतने उत्साह से भाग नहीं लिया जितने उत्साह से उन्होंने दस साल पहले हुए असहयोग आंदोलन में भाग लिया था।

इसके कारण अनेक थे लेकिन सबसे बड़ा कारण था, खिलाफत आंदोलन जैसे लामबंद मकसद का अभाव। एक कारण, है,  हस्तनिर्मित कपड़े पहनने पर, गांधी का जोर देना। खद्दर, देसी और हस्तनिर्मित तो था, पर वह महंगा पड़ता था। मशीन से बुने कपड़ों की तुलना में खद्दर पहनना और उसका रख रखाव करना और भी महंगा पड़ता था। रामचंद्र गुहा की किताब, गांधी, द ईयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड में, लिखते हैं, “इस प्रकार, जैसा कि बंबई में एक साधारण मुसलमान ने गांधी को लिखा, ‘महात्माजी, आपका आग्रह और खद्दर महान तो है, लेकिन वर्तमान गंभीर परिस्थितियों में आपको अपनी शर्तों को थोड़ा शिथिल करना चाहिए और सभी को स्वतंत्रता के लिए अपने आंदोलन में शामिल होने देना चाहिए।  बंबई में बहुत से लोग जो राष्ट्रीय संघर्ष में भाग लेने के लिए मर रहे हैं, वे इतने गरीब हैं कि, शहरों में जिस कीमत पर खद्दर बेचा जा रहा था, उसे, वे खरीद नहीं पा रहे हैं।” 

सविनय अवज्ञा आंदोलन को लेकर, केवल अली बंधु ही नहीं, असहज थे, बल्कि मुहम्मद अली जिन्ना भी इस आंदोलन के साथ नहीं थे। हालांकि जिन्ना तो खिलाफत और असहयोग आंदोलन के समय भी, गांधी और अली बंधुओं के साथ नहीं थे। अली बंधुओं और जिन्ना में खटास थी और कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में तो यह मनमुटाव खुल कर सामने आ गया। साल, 1920 में, नागपुर कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की। कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेता इसमें शामिल हुए थे।

कांग्रेस के लिए यह अधिवेशन, इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस अधिवेशन में महात्मा गांधी को सर्वमान्य नेता के रूप में पहचान मिली। इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन की घोषणा की थी। इसी के बाद, केवल इंडियन नेशनल कांग्रेस के ही इतिहास में नहीं, बल्कि देश के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में, गांधी एक सर्वमान्य नेता के रूप में उभर गए थे। जिन्ना, गांधी के असहयोग और अन्य गांधीवादी कार्यक्रमों से, पहले से ही असहज थे। धीरे धीरे, उनकी दूरी, गांधी से बढ़ती गई और वो खुद को, मुस्लिम लीग की राजनीति तक ही सीमित करने लगे। 

नमक सत्याग्रह की सारी गहमागहमी के बीच, जिन्ना ने, भी वायसराय को, एक पत्र लिखकर उनसे, भारत को स्वायत्तता देने संबंधी, ब्रिटिश राज की नीति के संबंध में हुई, संवैधानिक प्रगति पर, एक सार्वजनिक बयान देने का आग्रह किया। जिन्ना ने अपने पत्र में कहा, “ऐसा लगता है, ब्रिटिश सरकार के सामने, देश में, इस समय, केवल एक ही पक्ष है, जिससे (ब्रिटिश सरकार द्वारा) बातचीत की जा रही है, और वह पक्ष है, कांग्रेस। जिसे सबसे अधिक प्रचार और एक हद तक, एकतरफा प्रचार मिल रहा है।

यह प्रचार इतना व्यापक चल रहा है कि, इसका असर एक बुखार की तरह संक्रामक हो चला है, लेकिन, अकेले सरकार ही, लोगों के सामने, इसका विकल्प रख सकती है और जितनी जल्दी, यह हो सके, यह उतना ही अच्छा है।” लॉर्ड इरविन ने, जिन्ना को, गांधी के आंदोलन के खिलाफ एक सार्वजनिक बयान देने के लिए कहा था। जिन्ना ने कहा कि “सविनय अवज्ञा के बारे में, उनकी (जिन्ना की) विपरीत धारणा और असहमति की बात, सबको अच्छी तरह से पता है, लेकिन अब वह जो भी बयान देंगे, वह तभी प्रभावी होगा जब, कांग्रेस की सोच का एक विकल्प, सामने आ जाय। मुझे, आप पर बहुत विश्वास है।” जिन्ना ने वायसराय को लिखा, “लेकिन, आपको, अब तेजी से आगे बढ़ना चाहिए।” 

गांधी के असहयोग और खिलाफत आंदोलन से तो जिन्ना पहले ही असहज थे और फिर जिस तरह से गांधी का जनता पर करिश्माई प्रभाव बढ़ता जा रहा था, उससे कांग्रेस के अन्य, बड़े और कद्दावर नेता भी, अप्रासंगिक होते जा रहे थे। इसका कारण जनता से गांधी का सीधे जुड़ाव, और जनता में जनता की ही तरह घुल जाना था। साथ ही सामाजिक कार्यक्रमों, और सत्य पर उनकी संकल्पशक्ति ने, लोगों में उन पर विश्वास था।

सन 1916 से 1930 तक इन चौदह सालों में, गोपाल कृष्ण गोखले और लोकमान्य बालगंगाधर तिलक को, यदि छोड़ भी दें तो, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, मुहम्मद अली जिन्ना, देशबंधु चितरंजन दास, गांधी जी के भारतीय स्वाधीनता संग्राम में शामिल होने से भी पहले, सक्रिय और कद्दावर नेता थे। वे अब धूमिल हो रहे थे, और गांधी धीरे-धीरे, एक विराट व्यक्तित्व का आकार ग्रहण करते जा रहे थे। जबकि ऐसा भी नहीं था कि, देश भर का स्वाधीनता आन्दोलन, गांधी के ही अहिंसा के मॉडल पर चल रहा था। पर गांधी, 1930 के नमक सत्याग्रह के बाद, स्वाधीनता संग्राम की मुख्य धारा में लगभग विकल्पहीन हो चले थे। अली बंधुओं और जिन्ना की, एक पीड़ा यह भी थी। 

इसी बीच गांधी जी को खबर मिली कि, बंगाल के समुद्रतटीय शहर चटगांव में, एक शस्त्रागार पर, क्रांतिकारियों ने हमला कर दिया। 18 अप्रैल 1930 को, क्रान्तिकारी सूर्य सेन के नेतृत्व में सशस्त्र स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा चटगांव में पुलिस और सहायक बलों के शस्त्रागार पर छापा मार कर उसे लूटने का प्रयास किया गया था। इसे, इतिहास में, चटगांव शस्त्रागार छापा या चटगांव विद्रोह के नाम से जाना जाता है। चटगांव  छापे की खबर ने उन्हें व्यथित कर दिया। उन्होंने एसोसिएटेड प्रेस से बात करते हुए कहा कि, “इससे पता चलता है कि, बंगाल में युवकों का एक प्रभावशाली समूह है जो, अहिंसा में विश्वास नहीं करता है। यह  चाहे वह एक नीति के रूप में हो या एक पंथ के रूप में, पूरे भारत में ऐसे लोग हैं, जैसा कि मैं समझता हूं, वे, अहिंसा को एक मौका जरूर देंगे।”

साल 1930 की अप्रैल के तीसरे सप्ताह में, साबरमती आश्रम से, महादेव देसाई और उनके सहयोगी स्वामी आनंद को गिरफ्तार कर लिया गया। देशभर में गिरफ्तारियों का दौर जारी था। तो देश के अन्य हिस्सों में सैकड़ों अन्य कांग्रेसी जगह-जगह से गिरफ्तार किए जा रहे थे। सरकार सत्याग्रह और सत्याग्रहियों पर सख्त थी, हालाँकि, गांधी जी को अभी भी गिरफ्तार नहीं किया गया था। गिरफ्तारी तो उनकी भी देर सबेर होनी थी, पर कब? इस सवाल का उत्तर केवल एक व्यक्ति के पास था, और वह थे लॉर्ड इरविन, जो भारत के वायसरॉय थे।

बॉम्बे के गवर्नर से लेकर लंदन तक, यह सवाल उठ रहा था कि, गांधी की गिरफ्तारी क्यों नहीं की जा रही है और उन्हें क्यों, स्वतंत्र छोड़ रखा गया है। गिरफ्तार तो गांधी भी हुए, पर फिलहाल तो वे आज़ाद हैं और सत्याग्रह तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन की तेज होती धार देख रहे हैं। देश में हर जगह एक नई ऊर्जा देखी जा रही थी। बम्बई के गवर्नर, साइक्स ने 23 मार्च,1930 को, जब दांडी यात्रा चल रही थी तभी, वायसरॉय लॉर्ड इरविन को भेजे एक नोट में अवगत करा दिया था कि, “दांडी यात्रा के दौरान,  गांधी जिन जिन जिलों से गुजर रहे हैं, वहां का माहौल बदल रहा है। खास कर बंबई में तो, स्पष्ट रूप से ‘सरकार विरोधी भावना की एक तगड़ी लहर’ महसूस की जा रही है।” साइक्स के इस नोट का उद्धरण, रामचंद्र गुहा की किताब, गांधी द ईयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड में पृ.350-351 पर उद्धरित है। 

26 अप्रैल 1930 को, गांधी ने एक सभा में कहा कि उन्होंने दांडी में जो कुछ किया है वह केवल ‘यहाँ-वहाँ से  नमक क़ानून तोड़ कर नमक बनाने का प्रतीकात्मक आंदोलन था। गांधी इसे बचकाना खेल बताते हुए कहते हैं कि, “अब’ इस ‘बचकाना खेल’ से आगे निकलने का समय आ गया है, और वे धरसाना, जहां सरकारी नमक बनाने का एक प्रमुख केंद्र है पर छापा मारने की घोषणा करते हैं। अब वे सत्याग्रह के दांडी जैसे प्रतीकात्मक अभियान के बजाय, ब्रिटिश कानून को, सामने से चुनौती देना चाहते हैं।

जब उन्हें, बम्बई, मद्रास, कलकत्ता, पेशावर, कानपुर सहित जगह जगह से, सत्याग्रह की खबरें मिलने लगीं, लोगों का उत्साह और जनता की एकजुटता का प्रबल आभास, होने लगा, जनसमूह निर्भीक होकर सड़कों पर विचरने लगा, तब उन्होंने भी अपनी रणनीति बदल दी और, धरसाना पर धरना देने का निश्चय कर लिया। गांधी ने कहा, “वह धरसाना के निवासियों को ‘मस्ती’ (सत्याग्रह को वे मस्ती कह रहे हैं) में शामिल होने के लिए आमंत्रित करेंगे”; उन्हें उम्मीद थी कि वे इसमें शामिल होंगे, भले ही इसका परिणाम, पुलिस की पिटाई ही क्यों न हो।”

क्रमशः…

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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