Monday, August 8, 2022

जेंडर और यौनिकताः बहस भी और संघर्ष भी

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दुनिया की सबसे विख्यात आंकी गई महिलाओं में से एक, विश्व सिनेमा की एक प्रमुख स्टार, और 11 साल की उम्र से हैरी पॉटर फिल्म ऋंखला में हरमाइनी ग्रैंगर का लोकप्रिय किरदार निभाती आई ब्रिटिश अदाकारा और एक्टिविस्ट एमा वॉटसन ने पिछले दिनों कहा कि यही समय है जब हमें जेंडर को विरोधी आदर्शों के दो सेट्स के रूप में न देखकर, एक स्पेक्ट्रम के तौर पर देखना चाहिए। एमा वॉटसन ने इस सिलसिले में कही जा रही पहले की बातों को अलग ढंग से ही बयान किया था और ये उस तमाम हंगामाखेज विवाद के बीच सबसे ताजा बयान है जो हैरी पॉटर उपन्यास ऋंखला की लेखिका जेके रोलिंग की ट्रांसजेंडरों को लेकर की गई एक टिप्पणी के बाद मचा था।

रोलिंग ने इस आशय का एक ट्वीट किया था कि “सेक्स की अवधारणा को मिटा देने से कई लोगों को अपनी ज़िंदगियों को मानीखेज रूप से बहस करने की योग्यता भी छिन जाएगी। सच कहने का मतलब नफ़रत करना नहीं है।” रोलिंग चौतरफा हमलों का शिकार बनीं। एलजीबीटीक्यू समुदायों ने उन्हें टर्फ यानी, ट्रांस एक्सक्लुश्नरी रेडिकल फेमेनिस्ट कह डाला। यानी एक ऐसी चरमपंथी नारीवादी जो ट्रांसजेंडर को दरकिनार करती हैं। नारीवाद के भीतर सिस्टरहुड यानी बहनापे की वैश्विक स्वीकृति के लिए भी ये विरोध एक बड़ा झटका था। इससे ये भी और स्पष्ट हुआ कि आधुनिक नारीवाद शुरुआत से ही जैविक (बायोलॉजिकल) और सांस्कृतिक विभेदों के बीच एक लाइन खींचता आया है। लेकिन “50 की कन्सेप्ट्स इन जेंडर स्टडीज” किताब में लेखक द्वय जेन पिल्चर और इमेल्डा वेह्लीहान ने जेंडर विमर्श में डिफरेंस की भूमिका के बारे में तफ़्सील से बताते हुए लिखा है कि जब स्त्री मुक्ति आंदोलन अपनी शैशवास्था में था तो सिस्टरहुड का विचार आशावाद का एक बड़ा प्रतीक बन गया था। लेकिन इस विचार के विकसित होने के साथ ही इसमें औरतों के बीच ही जातीय, वर्गीय, पारिवारिक, सेक्सुअल रुझान के अंतरों को भी एक महत्त्वपूर्ण रूप से आकार लेते अनुभव की तरह देखा गया। रोलिंग की दलील और उनके प्रति क्वीर समुदायों का आक्रोश इस पूरे विमर्श में टकराते आ रहे हैं और ये टकराव थ्योरिटिकल और फलसफाई प्लेटफॉर्मों तक ही सीमित नहीं रह गया है।

इसी साल अगस्त के शुरुआती दिनों में जब ओलम्पिक के उल्लास और कोरोना की दहशत से जापान की राजधानी टोक्यो में बेताबी और चिंता का मिलाजुला माहौल था, उसी दौरान महानगर के एक कोने से एक ऐसे हमलावर की खबर आई जो चाकू लहराता हुआ एक ट्रेन पर चढ़ गया और महिला यात्रियों पर चाकू से दनादन हमले करने लगा। 10-12 महिला यात्री जख्मी और कुछ बुरी तरह जख्मी बताई गई हैं। समाचार रिपोर्टों के मुताबिक हमलावर ने सरेंडर करने के बाद कहा कि वो औरतों को खुश नहीं देख सकता है और जहां कहीं भी उसे हंसती प्रसन्नचित्त औरतें दिखती हैं उसे उन्हें मारने का मन करने लगता है। औरत को खुश न देखने की उसकी चाहत को उस शख्स का मनोविकार बताया गया। लेकिन क्या यही रोग समाज में न जाने कितने लंबे समय से फैला नहीं हुआ है?

और इसका कोई इलाज अभी तक नहीं मिल पाया है जहां न खुश औरतें समस्या हैं बल्कि एक ऐसा समुदाय भी निशाने पर आता जा रहा है जो औरत है न पुरुष, अन्य के हवाले से जिसे संबोधित किया या पहचाना जाता है। जो ट्रांसजेंडर हैं समलैंगिक है और क्वीर है। एलजीबीटीक्यू प्लस नाम है इस समुदाय का और इधर सामाजिक हलचलों और कानूनी पेचीदगियों और जटिलताओं के बीच जिसे अपना नया रास्ता बनाते देखा जा सकता है। और जिसका दमन, नई सामाजिक विडंबना और नई नाइंसाफ़ी की तरह उभरा है। अल्पसंख्यकों और दलितों और आदिवासियों और जंगल के मूल निवासियों पर चले आ रहे सदियों के दमन में समलैंगिकों और किन्नरों और जेंडर की बाइनरी से बाहर रहने वाले लोगों का दमन भी शामिल रहा है लेकिन उस पर कभी बहस या कार्रवाई नहीं हुई। इधर भारत जैसे देशों में ये दबीकुचली आवाज़ें इकट्ठा होने का साहस कर रही हैं और एक व्यापक हेजेमनी के खिलाफ प्रतिरोध का अपना ईकोसिस्टम निर्मित कर रही हैं। हालांकि है ये एक बहुत लंबी प्रक्रिया और उन लड़ाइयों का ही मानो एक जेनुइन विस्तार है जो स्त्रियों, दलितों और अल्पसंख्यक समुदायों के हकों के लिए सदियों से जारी है।

समानता एक बुर्जुआ मूल्य है

इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली के 15 मई 2021 के अंक में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी मेसाच्युसेट्स में रिसर्चर, रोशनी चक्रवर्ती ने अपने लेख में कोविड-19 के दौर में सामाजिक-आर्थिक धक्कों का सेक्स वर्करों और ट्रांसजेंडर समुदाय पर पड़े गंभीर असर की विवेचना की है। उनके लेख में बताया गया है कि कैसे पब्लिक स्पेसों में सेक्सुअल माइनरिटीज़ की उपस्थिति को सार्वजनिक गरिमा और नैतिकता के लिए खतरे की तरह देखा जाता है। महामारी ने समाज के इस रवैये को संवेदनशील बनाने के बजाय और कठोर और निर्मम बना दिया है। उनका राजनीतिक और सामाजिक बहिष्कार भी महामारी से बचाव का मुख्यधारा का एक हथियार बन जाता है। समाज में मुख्यधारा के पास अपनी बात कह लेने के लिए मंच जगह और डोमेन तो हैं ही वो जब चाहे आड़ भी ले सकता है और निशाने साधता रह सकता है। लेकिन संरचनात्मक गैर-बराबरी सिर्फ़ महामारी के दौरान उभर आया लक्षण नहीं है।

एक हेजेमनिक ढांचे में विन्यस्त समाज जातीय, नस्ली और लैंगिक और यौनिक भेदभाव बरतता ही आया है। “द स्टोरी ऑफ सेक्सुअल आइडेंटिटी- नैरेटिव पर्सपेक्टिव्स ऑन द गे एंड लेस्बियन लाइप कोर्स” (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2009) किताब की प्रस्तावना के अंत में जाने माने समाजशास्त्री केनेथ प्लमर ने क्वीर विमर्श में पारिभाषिक शब्दावलियों में इकहरेपन की समस्या की ओर इंगित करते हुए लेखक द्वय जॉन गैगनन और विलियम साइमन की एक निराली सी टिप्पणी कोट की हैः “अ होमोसेक्सुअल इज़ नॉट अ होमोसेक्सुअल इज़ नॉट अ होमोसेक्सुअल।” ये पेचीदा सी लगने वाली बात गौर की जाए तो विडंबना और कटाक्ष का एक मिला जुला भाव है जो इसके समकालीन यथार्थ को ही अभिव्यक्त करता प्रतीत होता है। और ये भी ध्यान रहे कि कथित बराबरी भी इस नयी आंदोलनात्मक चेतना का ध्येय नहीं है। “मार्क्स ने कहा था कि समानता एक बुर्जुआ मूल्य है।” (व्हाई मार्क्स वॉज राइट- टैरी इगलटन।) हमें इस कथित बराबरी के नारे को ध्यान से देखना चाहिए और इसके झांसे में आने से बचना चाहिए।

इधर पिछले कुछ दशकों से सेक्सुअल नागरिकता अकादमिक और जन-विमर्श में दाखिल हुआ है। लेकिन पारंपरिक, रिवायती और निर्धारित पैमानों वाले सेक्सुअल नॉर्म्स से बाहर रहने वाले समुदायों या व्यक्तियों को अपने इस रुख का नतीजा भुगतना ही पड़ता है। अपनी स्वतंत्र यौन पहचान का अधिकार हासिल करने की लड़ाई लंबी है और इसके रास्ते में अवरोध और पेचीदगियां बेशुमार हैं। एक बार ये रास्ता हासिल हो जाए तो उसके आखिर में कोई ज़रूरी नहीं कि वैसी आज़ादी और खुलापन मिल पाए जिसकी इच्छा, चाहत और उम्मीद की जाती है। कह सकते हैं कि हीटरोनौरमेटिविटी और हीटिरोसेक्सुअलिटी के विरोध में सेक्सुअल सिटीजनशिप की अवधारणा एक आलोचनात्मक नजरिए की तरह सामने आई है। यौनिकता लंबे समय से नियंत्रण की वस्तु रही है, जिस पर एकल विवाह, इतरलिंगी आकर्षण और पवित्रता या शुद्धता से जुड़ी सामाजिक रूढ़ियों का अनुपालन करने के लिए बाध्य किया जाता है। हीटरोनॉरमेटिविटी यानी विषमलैंगिकता यानी लैंगिक पहचान को सिर्फ स्त्री और पुरुष की बाइनरी में ही देखने की प्रवृत्ति रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ऐतिहासिक निर्णय में कहा था कि सहमति से सेक्स अपराध नहीं है। चाहे वो होमो सेक्सुअल हो या हीटरोसेक्सुअल, प्राइवेट स्पेस में सार्वजनिक गरिमा या नैतिकता को नुकसान नहीं करता है। फेमेनिस्ट और क्वीर सिद्धांतकार इसी प्राइवेट बनाम पब्लिक के नज़रिए को समस्या मानते हैं। सार्वजनिक शुचिता का चिन्हीकरण, निशानदेही या ऐलान जैसे राज्य का कार्यभार बन जाता है। लेकिन क्वीर आंदोलन का सवाल यही है कि भारत में यौन हाइआर्की विषमलैंगिकता को महत्त्व देती है और इस व्यापक मैनडेट के जरिए यौनिकता को नियंत्रित और उस पर शासन करती है। ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट 2019 को देखिए। जिसमें ट्रांसजेंडर को तीसरा जेंडर के तौर पर पहचान दी गई है लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक इसमें राज्य को एक तरह से अधिकार दिया गया है कि ट्रांस व्यक्तियों की देहों और अस्मिताओं पर उनका नियंत्रण होगा। ट्रांस लोगों को अपने आधिकारिक दस्तावेजों में अपनी जेंडर पहचान दिखाने के लिए कानून कहता है कि उक्त व्यक्ति को जेंडर सर्टिफिकेट में भी बदलाव करना होगा और सेक्स रिएसाइनमेंट सर्जरी का प्रमाण डीएम के पास जमा करना होगा। जो इस प्रमाणपत्र की वैधता और सत्यता को सुनिश्चित करेगा।

इस बीच केरल हाईकोर्ट ने अंडरग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा बोर्ड को मेडिकल की पाठ्यपुस्तकों को अपडेट करने और एलजीबीटीक्यू प्लस समुदाय के बारे में अमानवीय और पक्षपात भरे संदर्भों को हटाने के लिए फौरन कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। दिशा और क्वीरिद्म नाम के एनजीओ की याचिका पर ये आदेश आया। द सिटीज़न डॉट इन वेब पत्रिका में सितंबर में प्रकाशित श्रेया बंसल की इस चौंकाने वाली एक रिपोर्ट के मुताबिक मद्रास हाईकोर्ट ने भी इसी साल इसी तरह का आदेश मेडिकल पाठ्यपुस्तकों से “क्वीरफोबिक” सामग्री की समीक्षा किए जाने के बारे में दिया था। कथित रूप से मेडिकल पुस्तकों में होमोसेक्सुअलिटी यानी समलैंगिकता को यौन विकृति बताया गया है। इन किताबों में ये भी कहा गया है कि जो कुछ भी हीटरोनॉरमैटिव (यौनिक और लैंगिक पहचान की बाइनरी) नहीं है वो दिमागी खराबी है, “अनसाउंड माइंड।” रिपोर्ट में बताया गया है कि मेडिकल किताबों में समलैंगिकता का इलाज भी किए जाने की बात कही गई है।

कुछ खबरें राहत वाली भी हैं। जैसे कि छत्तीसगढ़ सरकार ने पुलिस में बतौर सिपाही 13 ट्रांसजेंडरों की भर्ती की है। 2017 में छत्तीसगढ़ पुलिस ने अपनी भर्ती परीक्षा में ट्रांसजेंडरों को भी शामिल करने का फैसला किया था। इतनी बड़ी संख्या में ये पहली भर्ती है, हिंदुस्तान टाइम्स अखबार की मार्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अब तक सिर्फ दो ही राज्यों में ऐसी भर्तियां हुई थीं। एक तमिलनाडु में और एक राजस्थान में। इधर बिहार सरकार ने भी पुलिस फोर्स में ट्रांसजेंडरों की नियुक्ति का फैसला किया है। अच्छा है कि सरकारें अपनी भूमिकाओं में थोड़ा खुलती हुई दिख रही हैं लेकिन कथित तौर पर मुख्यधारा में शामिल करने के नारे और क्लीशे और मुख्यधारा की यथास्थिति में फंसकर ही न रह जाएं, ये सतर्कता और विवेक भी अपनी लड़ाई में एकजुट हो रहा क्वीर समुदाय बनाए रखे, ये ज़रूरी है। 

इकोनॉमिक टाइम्स समेत विभिन्न समाचार माध्यमों में प्रकाशित खबरों के मुताबिक केंद्र सरकार, ट्रांसजेंडरों को ओबीसी के तहत आरक्षण देने पर विचार कर रही है। शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। लेकिन क्या ये ट्रांसजेंडरों की मान्यता की लड़ाई में उनकी जीत है या ये ओबीसी में एक नये विभाजन और नये पसोपेश और आखिरकार एक नए अलगाव और नई खींचतान की ओर भी जा सकती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। नये सवालों के झंझावात में जो घिरे हैं वे उपेक्षित और वंचित तबके ही हैं- ट्रांसजेंडर जैसी अन्यथा कह दी गई कौमों की सच्ची फ़िक्र के अभी समाज ही नहीं बनें तो सरकारें कैसे बन पाएंगी। ये चलताऊ टिप्पणी नहीं है- वास्तविकताएं इसकी आधारभूमि हैं।

भारत जैसे देशों में इस बाबत मुख्यधारा की बहसें जब इस कदर उलझी हुईं और टकराव और नफ़रत के फंदे डालती हुई सी हैं तो उसी वक्त दुनिया के कई हिस्सों में नई त्वराएं नई भंगिमाएं नये आलोड़न उठ रहे हैं। स्विट्जरलैंड में अगर समलैंगिक विवाहों को मान्यता दी जा रही है तो जर्मनी में ट्रांसजेंडर संसद में चुनकर आ रहे हैं। भले ही ताजा चुनाव में दो ट्रांसजेंडर सांसद बने हैं और दोनों तीसरे सबसे बड़े दल ग्रीन्स पार्टी के सांसद हैं- तो ये घटना, राहत भी है और कुछ सवाल भी बाकी रखती है। टेस्सा गैंसरर और नाइके स्लाविक- दोनों देश के इतिहास में पहली ट्रांसजेंडर महिला सांसद होंगी। इस लेख में इस जिक्र के आने तक यूरोप के प्रमुख देश जर्मनी में वाम तेवरों वाले राजनीतिक दल, सोशल डेमोक्रेट्स की अगुवाई वाली सरकार में ग्रीन्स पार्टी की भूमिका निर्णायक हो सकती है। होमोफोबिया से जूझ रहे जर्मन समाज में ट्रांसजेंडर सांसद टेस्सा गैंसरर का कहना है कि ट्रांस लोगों के उत्थान के आंदोलन और पूरे क्वीर समाज के लिए भी ऐतिहासिक जीत है।

दुनिया के नात्सियों और मैकार्थियों के ख़िलाफ़

नात्सियों के लिए यौनिकता की सही भूमिका सत्ता, नियंत्रण और प्रजनन में निहित है। उन्होंने बर्लिन के धड़कते हुए तत्कालीन गे पब्लिक सेक्सुअल कल्चर को बंद कर डाला, तहस-नहस कर डाला। 1933 में सत्ता में अपने शुरुआती दिनों में मैग्नस हर्शफील्ड के इन्स्टीट्यूट फॉर सेक्सुअल साइंस में रखी किताबें और दूसरे सामान नष्ट कर दिए गए। लेकिन ये सिर्फ नात्सियों की समस्या नहीं थी, उनसे युद्धरत अमेरिका का सत्ता और सैन्य तंत्र भी अपने इन अजनबी समुदायों के प्रति उतना ही निरंकुश, क्रूर और आततायी था। चार्ली चैप्लिन के सिनेमा में भी, छिटपुट ही सही, उस दौर की यौनिक विकटताओं और क्रूरताओं पर विडंबना और हास्य की मिली-जुली प्रकट-प्रछन्न सांकेतिक अभिव्यक्तियां देखी जा सकती हैं। 1940 से 1950 के दशकों में यौनिक पहचानों की दबी छिपी अभिव्यक्तियों, लेस्बियन और गे समुदायों के क्वीर अनुभवों की कहानियां बाहर आने लगीं। आंदोलनों की एक सुगबुगाहट निर्मित होने लगी जो धीरे-धीरे व्यापक होती चली गई। सत्ताओं और समाजों के दमन और घृणा ने उसे और गाढ़ा बना दिया।

समाजशास्त्री पीटर नार्डी के मुताबिक निजी सदस्यता और व्यापक मैक्रोसमुदायों और आंदोलनों के बीच संपर्कों से तैयार गठजोड़ के रूप में मित्रताएं अक्सर काम करती हैं। हैरी है का अमेरिका में तैयार पहला गे राइट्स संगठन, मैट्टाशीन सोसायटी बना। वो पूर्व कम्युनिस्ट थे और सांगठनिक कार्यप्रणाली में दक्ष थे। अपने नये ग्रुप के लिए उनका मैनिफिस्टो था- “हम दुनिया के एन्ड्रजाइन्स यानी उभयलिंगियों ने जिम्मेदार कारपोरेट संस्था बनाई है- ये दिखाने के लिए हमारी शारीरिक और मनोवैज्ञानिक कमियां, दुनिया की दस प्रतिशत आबादी के उस एकीकरण में बाधा नहीं बन सकती हैं जो इंसान की रचनात्मक सामाजिक प्रगति को ओर लक्षित है।”

इस आंदोलन और उसके पहले के कठिन संघर्षों की झलक हमें शिलर और रोजेनबर्ग की 1985 में बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म- “द मेकिंग ऑफ अ गे एंड लेस्बियन कम्युनिटी” में देखने को मिलती है। उस फिल्म को दिए साक्षात्कार में हैरी हे ने कहा थाः “उस समय हम नहीं जानते थे कि दुनिया में कहीं भी किसी भी किस्म का कोई गे संगठन है या नहीं। या था या नहीं। कोई जानकारी नहीं थी। हमें लगा कि हम जो भी करते हैं उस बारे में हमें बहुत ज्यादा सावधानी रखनी होगी। वरना हमसे गलती हो सकती है। गलत वजहों से अखबार में आ सकते हैं। आने वाले समय के लिए आंदोलन के विचार और साख पर बट्टा लग सका है। हमें हर तरह के डर थे।”

1955 में ही डेल मार्टिन और फिलिस ल्योन ने सैन फ्रांसिस्को में द डॉटर्स ऑफ बिलिटिस नाम से संगठन बनाया। उसी ने द लैर नाम से अमेरिका में लेस्बियनों के लिए पहली पत्रिका निकाली। हैरी हे मेटाशीन संगठन की ही एक पत्रिका “वन” लॉस एंजिलिस से 1952 में निकलना शुरू हुई थी। इसके पहले पाठकों में अमेरिकी कवि एलन गिन्सबर्ग भी थे। उन्मुक्त ख्याल वाले गिन्सबर्ग खुद भी होमोसेक्सुअल थे और बीट आंदोलन के नेता के रूप में गिन्सबर्ग ने उस चर्चित डॉक्यूमेंट्री में कहा था कि “दुनिया के नात्सियों और मैकार्थियों से हम डरने वाले नहीं जो जिंदगी के बारे में यूं भी कुछ नही जानते हैं।” लॉस एंजिलिस टाइम्स में गैरी गोल्डस्टाइन की जुलाई 2019 में छपी रिपोर्ट के मुताबिक 1984 की उस चर्चित डॉक्युमेंट्री को स्टोनवॉल दंगों की 50वीं बरसी के मौके पर फिर से से रिलीज किया गया था। ये फिल्म दुनिया में एलजीबीटीक्यू के 20वीं सदी के प्रारंभिक इतिहास से लेकर 1969 में आधुनिक गे अधिकार आंदोलन तक का एक इतिवृत्त है।

(शिवप्रसाद जोशी वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं।)

जारी…..

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