Monday, August 8, 2022

जिन्ना प्रसंग: ऐतिहासिक शख्सियतों का स्वतंत्र मूल्यांकन बेहद जरूरी

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समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पाकिस्तान के संस्थापक कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में हरदोई में एक बयान क्या दे दिया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में हंगामा बरपा हुआ है। उन्होंने कहा था कि सरदार पटेल, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना ने एक ही संस्था से बैरिस्टरी पढ़ी। वे बैरिस्टर हुए और उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी। वे आजादी की लड़ाई से पीछे नहीं हटे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके इस बयान को तालिबानी बताया है और कहा है कि अखिलेश यादव सरदार पटेल से जिन्ना की तुलना करने के लिए माफी मांगें।

तो बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि उन्होंने यह बयान भाजपा से मिलीभगत के तहत दिया है। जबकि आल इंडिया मजलिस-ए-इतेहादुल मुसलमीन के अध्यक्ष असद्दुदीन ओवैसी ने कहा कि भारतीय मुसलमान बहुत पहले ही जिन्ना को ठुकरा चुका है। इसलिए वह उनकी किसी भी तरह की तारीफ सुनने को तैयार नहीं है। जबकि इस बयान पर विवाद बढ़ने पर अखिलेश यादव ने कहा है कि वे अपने बयान पर कायम हैं और जिन्हें आपत्ति है उन्हें इतिहास फिर से पढ़ना चाहिए।

अखिलेश यादव ने भारत के राष्ट्रनिर्माताओं के साथ जिन्ना को क्यों जोड़ा इसकी वजह तो वे ही बता सकते हैं लेकिन इससे जो बहस खड़ी हुई है उसमें विभिन्न दलों के नेताओं की और दिन रात धर्म आधारित द्विराष्ट्र के सिद्धांत पर बहस चलाने वाले चैनलों की प्रतिक्रिया देखने लायक है। भाजपा के नेताओं ने अखिलेश के बयान का विरोध इसलिए किया है क्योंकि उन्होंने जिन्ना के साथ सरदार पटेल को जोड़ दिया। यानी महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू को जिन्ना के साथ जोड़ने पर उन्हें आपत्ति नहीं है। क्योंकि हिंदुत्व के आख्यान में उसके सबसे बड़े विरोधी तो यही दोनों नेता हैं। महात्मा गांधी ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने के लिए अनशन किया और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपने जान की बाजी लगा दी। तो जवाहर लाल नेहरू ने एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना की। हालांकि सरदार पटेल भी हिंदुत्व के खांचे में फिट नहीं बैठते लेकिन संघ की राजनीति ने उनकी मूर्ति इस तरह गढ़ने की कोशिश की है कि वे उनके अपने लगें।

दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती अखिलेश की आलोचना में इसलिए उतर आई हैं क्योंकि इससे राजनीतिक ध्रुवीकरण होगा और इससे सपा और भाजपा को फायदा होगा। यहां यह बात ध्यान देने की है कि आंबेडकरवादी दर्शन पर चलने का दावा करने वाली इस पार्टी के आख्यान में स्वाधीनता संग्राम है ही नहीं। इसी कारण वह न तो महात्मा गांधी का आदर करने को तैयार है और न ही जवाहर लाल नेहरू। बल्कि वह महात्मा गांधी का निरादर तो कई बार कर भी चुकी है।

ओवैसी ने भी इस बयान की आलोचना की है। उनके बयान में यह सच्चाई जरूर है कि भारत के जो मुसलमान यहां रह गए हैं उन्होंने जिन्ना के नेतृत्व को खारिज किया था। लेकिन उनकी पार्टी का गठन तो हैदराबाद की स्वतंत्रता के लिए हुआ था न कि उसके भारत में विलय के लिए। उनकी हाल की राजनीति जिन्ना की तरह ही एक मुस्लिम मतदाता वर्ग तैयार करना है। एक प्रकार से वे और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यही भाजपा चाहती है कि हिंदू और मुसलमान अलग मतदाता मंडल के रूप में बंट जाएं ताकि उसकी हमेशा विजय होती रहे।

निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य के चुनाव में विभाजनकारी राजनीति और इतिहास को एक सनसनीखेज आख्यान बनाने पर आमादा चैनल अपना खेल खेलेंगे। पर यह उत्तर प्रदेश के जागरूक मतदाता पर निर्भर करता है कि वे इस प्रदेश के राजनीतिक विमर्श को तथ्य आधारित, वस्तुपरक और विद्वतापूर्ण विमर्श बनाना चाहेंगे या फेसबुक और व्हाटसएप की नफरत और पूर्वाग्रह आधारित विमर्श बनाकर रख देना चाहते हैं। इसी प्रदेश के एक कद्दावर नेता और कभी देश के प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर कहा करते थे कि हमें राजनीति में या तो देवता चाहिए या दैत्य। हमें मनुष्य नहीं चाहिए। यह स्थिति ठीक नहीं है।

इसी के साथ इतिहास के लेखन और उससे प्रेरित राजनीतिक विमर्श को भी चलाए जाने का सवाल है। वह विमर्श तभी चल सकता है जब हम उसके लिए एक उदार माहौल निर्मित करें। एक उदारवादी माहौल में ही तर्कशील भारतीय पैदा हो सकता है। वही तर्कशीलता जिसकी तारीफ करते हुए कभी लातिनी अमेरिकी क्रांतिकारी चे ग्वेरा ने कहा था कि भारत में दार्शनिक बहस विमर्श की प्राचीन परंपरा है इसीलिए वहां महात्मा गांधी जैसा अहिंसा का उपासक नेता पैदा हो सका। लातिनी अमेरिका में ऐसी परंपरा नहीं है इसलिए वहां हिंसक क्रांतियां हो रही हैं।

अखिलेश यादव ने जिन्ना के बारे में जो बयान दिया है उसका आधा हिस्सा सही है। मोहम्मद अली जिन्ना 1937 के बाद सांप्रदायिक हुए और 1940 में लाहौर में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में पाकिस्तान का प्रस्ताव पास होने के बाद तो लगातार सांप्रदायिकता को परवान चढ़ाते रहे। उन्होंने 1946 में डायरेक्ट एक्शन का आह्वान करके बंगाल, बिहार और पंजाब तक हिंसा करवाई। आखिर में वे द्विराष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर एक मुस्लिम राष्ट्र बनाने में सफल रहे। इस दौरान विभाजन की त्रासदी में दस लाख लोग मारे गए और आज भी दोनों देशों के बीच चार युद्ध हो चुके हैं और उनका विवाद शांत नहीं हुआ है। एक प्रकार से जिन्ना एक समस्याग्रस्त राष्ट्र के संस्थापक बने। जो भारत को सांप्रदायिक बनने के लिए प्रेरित कर रहा है।

लेकिन जिन्ना के जीवन का पूर्वार्ध हिंदू मुस्लिम एकता के आधार पर भारत की देशभक्ति और आजादी की लड़ाई से जुड़ा है। जिन्ना एक अच्छे और भारत के सबसे महंगे वकील थे इस तथ्य में कोई संदेह नहीं है। लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम से शुरू से जुड़े थे। 1906 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता करने जब दादा भाई नौरोजी आए तो जिन्ना उनके निजी सचिव थे। वे दादा भाई नौरोजी से बहुत प्रभावित थे और उन्हीं की तरह ब्रिटिश संसद के सदस्य बनना चाहते थे।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को हिंदू राष्ट्रवादी बताने वालों के लिए यह बात सदमे की तरह लगेगी कि मोहम्मद अली जिन्ना से उनकी गहरी दोस्ती थी। एजी नूरानी ने एक किताब लिखी है—जिन्ना एंड तिलकः कामरेड्स इन फ्रीडम स्ट्रगल। उन्होंने उन लोगों के साझा दोस्त काजी द्वारकादास के हवाले से लिखा है कि उस समय बांबे में दो राजनीतिक केंद्र थे। एक सरदार गृह था जहां तिलक रहते थे और दूसरा था हाई कोर्ट में जिन्ना का चैंबर। सारे राजनीतिक लोग सलाह और फैसलों के लिए इन्हीं जगहों पर जाते थे। लेकिन तिलक और जिन्ना सिर्फ लोगों को सलाह देकर दूर नहीं हो जाते थे। उन लोगों के दफ्तरों से हर हफ्ते हजारों पर्चे छपते थे और कलबा देवी और मांडवी ने हर पखवाड़े रात्रिभोज पर बैठक होती थी और उसके बाद शांताराम चाल, गिरगाम में सभाएं होती थीं।

उन सभाओं में तिलक, जिन्ना, खापरडे, एनसी केलकर और बांबे क्रानिकल के संपादक बीजी हार्नीमैन जाते थे व्याख्यान देने। जिन्ना गोपाल कृष्ण गोखले का भी बहुत आदर करते थे और कहते थे कि मैं मुस्लिम गोखले बनना चाहता हूं। यही कारण है कि बाद में गांधी और नेहरू के विरुद्ध कठोर टिप्पणियां करने वाले जिन्ना ने तिलक और गोखले के विरुद्ध कभी कुछ नहीं कहा। 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का जो लखनऊ में सम्मेलन हुआ उसे आयोजित करने में जिन्ना का बड़ा योगदान था। उसकी सभी ने तारीफ की। सरोजिनी नायडू ने तो जिन्ना को हिंदू मुस्लिम एकता का दूत बताया। तिलक के साथ जिन्ना का लगाव इस कदर था कि 1916 में जब तिलक पर तीसरी बार राजद्रोह का मुकदमा चला तो जिन्ना ने एक वकील के तौर पर अदालत में उनका बचाव किया और वह मुकदमा जीता भी। तिलक पर लगा आरोप खारिज कर दिया गया।

जिन्ना तो पहले कांग्रेस में ही थे और एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने के समर्थक थे। लेकिन वे कांग्रेस की ही योजना के तहत 1913 में मुस्लिम लीग में भेजे गए थे ताकि लीग को कांग्रेस के करीब लाया जा सके। एक दौर में उन्होंने यह भूमिका अच्छी तरह से निभाई भी। जीवन के पूर्वार्ध में जिन्ना की देशभक्ति का प्रमाण उस समय दिखता है जब वे 1929 में जेल में भगत सिंह के आमरण अनशन से विचलित होते हैं और सेंट्रल असेंबली में लाए जा रहे एक अन्यायपूर्ण बिल का जोरदार विरोध करते हैं। भगत सिंह जेल में आमरण अनशन कर रहे थे और उस अदालत के सामने जाने को तैयार नहीं थे जो सुनवाई का ढोंग कर रही थी और पहले से उन्हें सजा देने के लिए तैयार बैठी थी। आरोपी की मौजूदगी के बिना मुकदमा चलाने की व्यवस्था करने के लिए अंग्रेज सरकार सेंट्रल असेंबली में एक विधेयक लाई। जिन्ना असेंबली में बांबे सिटी के प्रतिनिधि थे। जिन्ना ने बिल का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह एक प्रकार का स्वांग है और न्याय का उपहास है। जिन्ना ने कहा, ` अगर उनकी अनुपस्थिति में सुनवाई हुई तो वे पहले ही दोषी मान लिए जाएंगे’।

भगत सिंह राजनीतिक कैदी हैं उनके साथ अपराधी जैसा बर्ताव नहीं होना चाहिए। आप अच्छी तरह से जानते हैं कि वे लोग मरने पर आमादा हैं। यह मजाक नहीं है। मैं माननीय विधि सदस्य से अनुरोध करता हूं कि आमरण अनशन करने वाले साधारण लोग नहीं हैं। थोड़ा आजमा के देखिए यह काम कितना कठिन है। जो अनशन कर रहा है उसके भीतर आत्मा है, वह उस आत्मा से प्रेरित है, वह अपने मकसद के साथ न्याय किए जाने में यकीन करते हैं। उन्होंने घिनौना और शैतानी अपराध नहीं किया है।’जिन्ना जब बोल ही रहे थे तभी असेंबली का सत्र समाप्त हो गया। तब वैचारिक रूप से उनसे गहरी भिन्नता रखने वाले मदन मोहन मालवीय ने सदन से अनुरोध किया कि जिन्ना का समय 15 मिनट बढ़ा दिया जाए। जिन्ना और उनके जैसे सदस्यों के कड़े विरोध के कारण सरकार वह बिल पास नहीं कर पाई। बाद में आरोपी के बिना मुकदमे की सुनवाई के लिए अध्यादेश लाया गया और उसके माध्यम से भगत सिंह को बिना सुनवाई के ही फांसी की सजा दी गई और उसे रात के अंधेरे में लागू भी किया गया। इस तरह अंग्रेजों ने न्याय का उपहास किया। जिन्ना ने यही तो कहा था।

जिन्ना भारत विभाजन के खलनायक हैं, गुनहगार हैं लेकिन विभाजन के लिए किसी व्यक्ति को ही दोष देने की बजाय उन प्रवृत्तियों और शक्तियों को दोष देना चाहिए जिन्हें रोकना किसी एक व्यक्ति के बस की बात नहीं थी। उसके बारे में अगर डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भारत विभाजन के गुनहगार और नरेंद्र सिंह सरीला ने विभाजन की असली कहानी में कुछ संकेत दिए हैं और प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। लोहिया ने अगर एक हजार सालों से चले आ रहे हिंदू मुस्लिम समाज के भीतर तनाव और विभाजन को कारण बताया तो सरीला ने अंतरराष्ट्रीय शक्तियों को। द्विराष्ट्र का सिद्धांत विनायक दामोदर सावरकर ने जिन्ना से पहले ही शुरू कर दिया था। विभाजन के लिए अगर मुस्लिम अलगाववाद दोषी है तो हिंदू अलगाववाद कम दोषी नहीं है। इसलिए सावरकर को पूजने वालों को जिन्ना का नाम लेने पर भड़क जाने का हक नहीं बनता। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों में कुछ अच्छाइयां हैं और खतरनाक किस्म की सांप्रदायिक प्रवृत्तियां हैं।

लेकिन अमृत महोत्सव के इस मौके पर विवेकवान भारत का यह फर्ज बनता है कि विभाजन और उससे जुड़े तमाम पात्रों की भूमिका पर खुलकर बात करे। किसी एक टिप्पणी पर दूसरे का मुंह नोचने वाले नेताओं और उनके गोदी मीडिया ने संवाद का माहौल बिगाड़ा है। लोकतंत्र में बात को सुनने और उस पर बातचीत की गुंजाइश होनी चाहिए। इतिहास हर युग के अनुरूप लिखा जाता है। वह अतीत और वर्तमान के बीच और इतिहासकार और उसके तथ्यों के बीच चलने वाला निरंतर संवाद है। लेकिन इतिहास लेखन तब तक अधूरा और अपूर्ण है जब तक वह शासक और शासित के बीच, परस्पर विरोधी राष्ट्रों के बीच और पूरी दुनिया के बीच सर्वमान्य ना हो जाए।

वह इतिहास ही क्या जिसे भारत अलग तरीके से लिखे और पाकिस्तान अलग तरीके से। वह इतिहास ही क्या जिसमें पाकिस्तान अशोक को न पढ़ाए और भारत अकबर को छोड़ दे। अगर मानव जाति एक है और उसकी सभ्यता एक है तो उसका इतिहास भी एक होना चाहिए। जब घटनाएं एक हैं तो इतिहास एक ही होना चाहिए लेकिन वह लक्ष्य तभी हासिल हो सकता है जब इतिहास से खेलने की राजनीति बंद हो। उससे सबक लेकर उन गलतियों को न दोहराने का संकल्प लिया जाए। ऐसा तभी हो सकता है जब एक प्रकार की सहनशीलता हो और वस्तुपरक दृष्टि हो। जो राजनीति इतिहास की दृष्टि नहीं उसके प्रति प्रतिशोध की भावना से लैश होती है वह अतीत की गलतियां दोहराने को अभिशप्त होती है। जो पत्रकारिता इतिहास को मिथक और मिथक को इतिहास बनाकर सनसनी फैलाती है और घटनाओं और पात्रों में सिर्फ स्याह सफेद देखती है वह समय के समाज की भी कब्र खोदती है।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली मे रहते हैं।)

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