Friday, August 12, 2022

नगालैंड हत्याकांड से नंगा हो गया ‘भारतीय गणराज्य’ का असली चेहरा

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अभी पिछले 4 दिसंबर 2021 दिन शनिवार को नगालैंड राज्य के भारत-म्यांमार के एक सीमावर्ती जिले मोन के ओटिंग गांव में 21असम पैरा मिलिट्री स्पेशल फोर्स के जवानों ने अफस्पा यानी आर्म्ड फोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट के तहत मिले अकथ्य अधिकार के तहत शाम को 4.10 बजे एक खुली महिन्द्रा पिकअप ट्रक में अपने घर को लौट रहे 8 निर्दोष कोयला खनिक मजदूरों पर आतंकी होने के शक के आधार पर गोली चला दिए, जिससे उनमें से 6 निर्दोष कोयला खनिक मजदूरों की तो घटनास्थल पर ही तत्काल मौत हो गई 2 मजदूर संयोग से बच गए, अगले दिन  दिनांक 5-12-2021 को सुबह वहाँ के गाँव के लोगों ने देखा कि सेना के जवान उन 6 मरे हुए कोयला खनिक मजदूरों के शवों को तिरपाल में लपेटकर छिपाने की कोशिश कर रहे थे, जिसका ग्रामीणों ने जबरदस्त विरोध किया और सेना के जवानों से हाथापाई व उनके भवनों में आगजनी तक करने लगे, जिससे तनाव इतना बढ़ा कि इस पर सेना के जवानों ने फिर से फायरिंग शुरू कर दी,जिससे 7 और विरोध करने वाले निर्दोष ग्रामीणों की मौत हो गई और एक सेना के जवान की भी दर्दनाक मौत हो गई, इस प्रकार कुल 14 लोग इस दुःखद घटना में अपनी जान से हाथ धो बैठे। भारतीय संसद में इस देश के गृह मंत्री अमित शाह के दिए गए एक भोथरे बयान के मुताबिक ‘शनिवार शाम को जब एक वाहन वहां पहुंचा, तब उसे रुकने का इशारा किया गया, लेकिन वह वाहन रुकने के बजाय भागने की कोशिश की, ऐसे में सेना ने संदिग्ध होने की आशंका में फायरिंग की, जिसमें 6 लोग मारे गये और 2 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। ‘

अफस्पा को भारत सरकार द्वारा 1 सितंबर 1958 को भारत के लगभग सभी पूर्वोत्तर राज्यों मसलन असम,मणिपुर,मेघालय,अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम और नगालैंड में तथा 1990 से जम्मू और कश्मीर में भी लागू कर दिया गया है । इस कानून के अंतर्गत सेना और अर्धसैनिक बलों को असीमित अधिकार प्रदान किया गया है, इस कानून के तहत यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति अशांति फैलाता है और चेतावनी देने के बाद भी वह नहीं मानता है तो इस स्थिति में सेना या अर्धसैनिक बलों के जवान उसे सीधे गोली मारकर उसे मौत के घाट उतार सकते हैं। इसके अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को बगैर वारंट गिरफ्तार कर जेल में डाला जा सकता है,किसी भी वाहन को रोककर उसकी तलाशी ली जा सकती है।

अब नगालैंड राज्य के आदिवासी समुदाय के शीर्ष निकाय संस्था कोन्याक यूनियन ने सुरक्षाबलों से यह अनुरोध किया है कि अगले 7 दिनों के लिए शोक सभा रखी जाएगी, इस समयावधि में कृपा करके इस क्षेत्र में सुरक्षाबल अपनी रूटीन गश्त न करें, अगर वे इस विनम्र निवेदन का पालन करना सुनिश्चित नहीं करते हैं, तो भविष्य में इससे होने वाली किसी भी अप्रिय घटना के लिए वे खुद जिम्मेदार होंगे। उन्होंने सोमवार को भारतीय राष्ट्र राज्य के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से तुरंत एक विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित करने का विनम्र निवेदन भी किया, जिसमें ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गेनाइजेशन यानी ईएनपीओ के दो सदस्य भी शामिल हों, जो इस दुःखद घटना को अंजाम देने वाले और शामिल सैन्यकर्मियों की पहचान करके उनके खिलाफ की गई कार्यवाही को 30 दिनों के भीतर सार्वजनिक करें।

इसके साथ ही नगालैंड राज्य के आदिवासी समुदाय के शीर्ष निकाय संस्था कोन्याक यूनियन ने यह भी मांग की है कि असम रायफल फोर्स को नगालैंड के नागरिकों की रक्षा करने में विफल रहने के कारण मोन जिले से तुरंत खाली कर देना चाहिए, इसके अतिरिक्त अफस्पा कानून को पूरे पूर्वोत्तर राज्यों से तुरंत हटाया जाना चाहिए, पिछले हफ्ते 4और 5 दिसम्बर 2021को सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए 14 नगालैंड के नागरिकों का मोन जिले में अश्रुपूरित अंतिम संस्कार कर दिया गया है। इस कार्यक्रम में वहां के मुख्यमंत्री, उनके मंत्रिमंडल के अन्य मंत्रीगण और तमाम आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधि आदि भी शामिल हुए।

भारतीय संसद में भारत के गृहमंत्री अमित शाह के दिए बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए नगालैंड राज्य के आदिवासी समुदाय के इस शीर्ष निकाय संस्था कोन्याक यूनियन के प्रवक्ता ने कहा कि ‘हम अभी शाह के बयान की समीक्षा करने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन यह दुःखद घटना सैन्य खुफिया एजेंसी की पूर्ण विफलता का ही परिणाम है, इसे गलत पहचान का मामला बिल्कुल ही नहीं माना जा सकता, क्योंकि जिन निर्दोष कोयला खनन मजदूरों की निर्मम हत्या की गई है, वे किसी भी दृष्टिकोण से भारतीय राष्ट्रराज्य के लिए खतरनाक नहीं थे। यह तर्क से परे सिर्फ बर्बर और निरंकुश दमन और अत्याचार का मामला है। कोई भी स्पष्टीकरण मानवता के खिलाफ जानबूझकर किए गए इस घोर आपराधिक कुकृत्य को सही नहीं ठहरा सकते। निर्दोष नागरिकों की हत्या के दोषी इस जघन्यतम् कुकृत्य के लिए भारतीय सेना के उच्चतम् रैंक के अधिकारियों पर भी जघन्यतम् हत्या का मामला दर्ज किया जाय और उन्हें दीवानी अदालत की खुली कोर्ट में मुकदमा चलाकर कठोरतम सजा दी जाय। ‘

इन हत्याओं से नगालैंड सहित लगभग पूर्वोत्तर के सभी राज्य बहुत आक्रोशित हैं व गुस्से में उबल रहे हैं। जिस तरह से पूर्वोत्तर को हमेशा से दोयम दर्जे का क्षेत्र समझा जाता रहा है। इस घटना से एक बार फिर उसकी पुष्टि हुई है। दिलचस्प बात यह है कि इसको लेकर राष्ट्रीय स्तर पर जितना तीखा आक्रोश दिखना चाहिए था वह नदारद है। ऐसे में अगर पूर्वोत्तर के लोगों का भारतीय गणराज्य में भरोसा कम होता दिखता है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

(निर्मल कुमार शर्मा लेखक हैं और आजकल गाजियाबाद में रहते हैं।)

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