Tuesday, August 9, 2022

किसान आंदोलन के चलते चौधरी चरण सिंह फिर बने चर्चा का केंद्र

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चौधरी चरण सिंह को ईमानदार, गांधीवादी विचारधारा में यकीन रखने वाले, किसानों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध राजनेता के तौर पर  जाना जाता है। उन्हें किसानों के मसीहा के तौर पर देखा और माना जाता है। उनका देहांत 29 मई 1987 को हुआ था लेकिन देश उन्हें किसान हितैषी के तौर पर 23 दिसंबर को याद करता है।

चौधरी चरण सिंह के किसानों की खुशहाली के लिए किए गए कार्यों के लिए 23 दिसंबर को 2001 से  ‘किसान दिवस’ मनाया जाता है। 

पाठकों को यह जानकारी होना चाहिए कि जिस तरह भारत में किसान दिवस 23 दिसंबर को मनाया जाता है, उसी तरह घाना में  दिसंबर माह के पहले शुक्रवार को किसान दिवस मनाते हैं। पाकिस्तान में 18 दिसंबर को, साउथ कोरिया में 11 नवंबर को, अमेरिका में 12 अक्टूबर को तथा जांबिया में अगस्त माह के पहले सोमवार को किसान दिवस मनाने का चलन है। सभी देशों में किसान दिवस किसानों के योगदान को लेकर मनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 16 अक्टूबर को विश्व खाद दिवस भी संयुक्त राष्ट्र संघ के आह्वान पर मनाया जाता है।

ऐसी शख्सियत जिनके जन्मदिवस को किसान दिवस के तौर पर मनाया जाता है 

उनके के बारे जानना जरूरी है ।

चौधरी चरण सिंह जी का जन्म 23 दिसंबर 1902 को हापुड़ जिले के नूरपुर गांव में (पूर्व में मेरठ जिला) में हुआ था। उन्होंने 21 वर्ष की उम्र में विज्ञान विषय में स्नातक की उपाधि प्राप्त की, 2 वर्ष बाद 1925 में कला संकाय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की तथा आगरा विश्वविद्यालय में विधि की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद गाजियाबाद में वकालत का कार्यभार संभाला। इनका विवाह गायत्री देवी से हुआ। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी करते हुए राजनीति में प्रवेश किया। बरेली की जेल में उन्होंने दो डायरियाँ लिखीं। स्वतंत्रता मिलने के बाद वे ग्रामीण सुधार आंदोलन में जुट गए।

1929 में लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस के पूर्ण स्वराज की घोषणा के बाद गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। 1930 में नमक कानून तोड़ने के आह्वान पर उन्होंने गाजियाबाद की हिण्डन नदी पर नमक बनाया। जिसके कारण उन्हें 6 महीने की जेल हुई। 1940 में वे फिर गिरफ्तार हुए। 1941 में जेल से रिहा होकर वे आंदोलन में शामिल रहे। 9 अगस्त 1942 को भूमिगत होकर उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारी कार्यवाहियां की।

मेरठ प्रशासन ने उन्हें देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए। बाद में वे गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें डेढ़ साल की सजा हुई। जेल में ही उन्होंने भारतीय संस्कृति और समाज के शिष्टाचार के नियमों को लेकर किताब लिखी। उन्हें किसानों का नेता इसलिए माना जाता है क्योंकि उन्होंने “जमींदारी उन्मूलन विधेयक” को 1952 में लागू करवा कर जमींदारी प्रथा को समाप्त कराया। 1954 में भूमि संरक्षण कानून पारित करवाया। 

वे सबसे पहले 1937 में छपरौली से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए । 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 17 अप्रैल 1968 को  उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। मध्यावधि चुनाव में उन्हें अच्छी सफलता मिली और 17 फरवरी 1970 को दुबारा मुख्यमंत्री बने। केंद्र सरकार में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979 में जब वे वित्त मंत्री और उप प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की।

28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के सहयोग से देश के पांचवें प्रधानमंत्री बने। तब उन्हें  इंदिरा गांधी का समर्थन प्राप्त था लेकिन 19 अगस्त 1979 में बिना बताए उनसे समर्थन वापस ले लिया। इंदिरा गांधी चाहती थीं कि जनता पार्टी ने उनके खिलाफ जो मुकदमे कायम किए हैं उन्हें वापस ले लिए जाएं। लेकिन चौधरी चरण सिंह ने सौदेबाजी करने की बजाय प्रधानमंत्री पद त्यागना बेहतर समझा।

हम यह भी जानते हैं कि चौधरी चरण सिंह गांधी टोपी लगाते थे। आजादी के आंदोलन के बाद अधिकतर कांग्रेसियों ने गांधी टोपी लगाना बंद कर दिया लेकिन चौधरी चरण सिंह जी आजीवन गांधी टोपी लगाते रहे। उन्होंने ‘एबोलिशन ऑफ जमींदारी’, ‘भारत की भयावह आर्थिक स्थिति: इसके कारण और निदान’ आदि कई किताबें लिखी।

चौधरी चरण सिंह ने पटवारियों के आतंक से मुक्ति के लिए 27,000 पटवारियों का त्याग पत्र लेकर लेखपाल पद का सृजन किया। यह उल्लेखनीय है कि लेखपाल की भर्ती में उन्होंने 18% स्थान दलितों के लिए आरक्षित किए थे। उन्होंने आजीवन किसानों को उपज का उचित दाम दिलवाने के लिए कार्य किया। उनका कहना था कि भारत का संपूर्ण विकास तब ही होगा, जब गांव के किसान खुशहाल होंगे। वे बार बार कहते थे असली भारत गांव में बसता है । वे अपने अनुयायियों से कहते थे

एक आंख दिल्ली की सत्ता पर और दूसरी हल पर रखो।

संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में 380 दिन तक चले किसान आंदोलन ने एक बार फिर पूरे देश और दुनिया का ध्यान किसानों की ओर खींचा है। किसान आंदोलन को जब भी कोई जानने और समझने की कोशिश करता है तब उसका ध्यान आवश्यक तौर पर चौधरी चरण सिंह की ओर जाता है।

आज फिर चौधरी साहेब चर्चा में हैं। उन्होंने आजादी के आंदोलन के दौरान और उसके बाद भी किसानों के मुद्दों को ना केवल राजनीतिक एजेंडे में लाने का प्रयास किया बल्कि किसानों के पक्ष में तमाम फैसले करके हलचल पैदा की।

किसान आंदोलन द्वारा आज एमएसपी के जिस सवाल को उठाया जा रहा है उसकी ओर चौधरी चरण सिंह आजीवन कृषि उत्पादों को उचित मूल्य देने के मुद्दे के तौर पर उठाते रहे हैं। भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा जिस मंडी व्यवस्था को खत्म करने का प्रयास कानून के माध्यम से किया जा रहा था उसे स्थापित करने में चौधरी चरण सिंह की विशेष भूमिका रही है।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के माध्यम से किसानों की जमीनों पर कारपोरेट का कब्जा जमाने की कोशिश आज की जा रही है, चौधरी चरण सिंह जी ने न केवल उसे चुनौती दी बल्कि जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कानून लाकर किसानों को जमीनें दिलवाने का काम किया। बाद में भू अधिग्रहण को लेकर भी किसानों की जमीनों को बचाने के लिए सतत प्रयास किये ।

जो लोग चौधरी चरण सिंह जी को जातिवादी कहते हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि चौधरी चरण सिंह अंतरजातीय विवाह के पक्षधर थे तथा इस संबंध में कानून बनाकर अंतरजातीय विवाह करने वालों को बढ़ावा देना चाहते थे। चौधरी चरण सिंह ने कभी जाट आरक्षण की बात नहीं कही। लेकिन वे किसानों के लिए 50% आरक्षण के सदा हिमायती रहे। यानी किसानों के बच्चों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के हिमायती थे।

उन्होंने गांव की पूंजी से शहर के विकास को आपत्तिजनक माना तथा लोक दल के अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने  ‘गांव का पैसा गांव में’,लोकदल की छांव में जैसा सटीक नारा दिया। जिस पर यदि अमल किया जाता तो गांव और शहर में ना केवल भेद को मिटाया जा सकता था बल्कि गांव की गरीबी दूर कर उन्हें समृद्ध भी बनाया जा सकता था। मूल तौर पर उन्होंने गांधीजी के अर्थशास्त्र को रेखांकित करते हुए देश के सामने लाने का काम किया परंतु जिस तरह आजादी के बाद शासकों द्वारा गांधी जी के अर्थशास्त्र की उपेक्षा की गई, उसी तरह चौधरी चरण सिंह के आर्थिक दर्शन को लखनऊ और दिल्ली के शासकों ने भी गंभीरता से नहीं लिया ।

आज चौधरी चरण सिंह जी के 119 वें जन्मदिवस पर जब राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष और चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी इगलास, अलीगढ़ में भाषण दे रहे थे तब उन्होंने सरकार बनने पर 5 साल में  1 करोड़  युवाओं को रोजगार देने का वायदा किया। उत्तर प्रदेश में सरकार बनने पर उन्होंने किसान सम्मान निधि को दुगनी करने की घोषणा की।

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस वायदे को पूरा करने के लिए यदि उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव में सपा गठबंधन की सरकार बनती है तो गांधी – लोहिया और चौधरी चरण सिंह जी के ग्रामीण अर्थव्यवस्था का उपयोग कर ही रोजगार पैदा किए जाएंगे। 

चौधरी चरण सिंह के भारतीय राजनीति में योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न देने की मांग आज सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा की गई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वह दिन जरूर आएगा जब भारत की राजनीति में किसानों को स्थान देने वाले चौधरी चरण सिंह जी को भारत रत्न  दिया जाएगा।

संभावना इसलिए भी दिखलाई पड़ रही है क्योंकि उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव में सपा और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन बढ़त लेता दिखलाई पड़ रहा है ।

जयंत चौधरी के पास चरण सिंह जी की पारिवारिक विरासत है और अखिलेश यादव

नेताजी के माध्यम से चौधरी साहेब की राजनीतिक और वैचारिक विरासत को लेकर  आगे बढ़ रहे हैं।

यदि उत्तर प्रदेश में कामयाबी मिलती है तो 2024 में भी सपा गठबंधन केंद्र सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

(डॉ. सुनीलम पूर्व विधायक और किसान नेता हैं।)

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