Monday, October 3, 2022

उत्पीड़न देखकर डरने लगे हैं पत्रकारिता के पेशे में आने के इच्छुक छात्र

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इंडिया प्रेस फ्रीडम रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2021 में कुल छह पत्रकारों की हत्या हुई, 108 पत्रकारों के ऊपर हमले हुए, तो वहीं 13 मीडिया घरानों को तरह-तरह से टारगेट किया गया। पत्रकारों के ऊपर लगातार हुए हमलों से पत्रकारिता में अपना भविष्य तलाश रहे युवाओं के भीतर चिंताएं आम होने लगी हैं।

“आए दिन पत्रकारों को जान से मार देने की धमकियां मिलती रहती हैं। महिला पत्रकारों के साथ बलात्कार तक करने जैसी धमकियां सोशल मीडिया पर आम हैं। वहीं सरकार के खिलाफ़ मुखर होकर कोई बोल दे तो उसे यूएपीए जैसी धाराएं लगाकर सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है”। बिहार के गोपालगंज ज़िला में रहने वाली 23 वर्षीय सैय्यद शिफा पत्रकार तो बनना चाहती हैं पर उन्हें हालिया सालों में पत्रकारों के साथ हुई बर्बरता से डर लगता है। ऑल्ट न्यूज़ के पत्रकार मोहम्मद ज़ुबैर को चार साल पुराने ट्वीट को आधार बनाकर की गई गिरफ्तारी पर चिंता ज़ाहिर करते हुए वह आगे कहती हैं कि “सरकार अगर पत्रकारों को इस प्रकार प्रताड़ित करेगी तो कहीं न कहीं आने वाले वक्त में हम जैसे पत्रकारों के भीतर सच्चाई और साहस से काम करने का जज़्बा मद्धिम पड़ेगा”। 

3 मई, 2022 को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दस मानवाधिकार संगठनों ने भारत में पत्रकारों के ऊपर हुए हमले को लेकर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा था कि भारत का सरकारी तंत्र सरकार की नीतियों और कार्रवाइयों की आलोचना के लिए पत्रकारों और ऑनलाइन आलोचकों को अधिक निशाना बना रहा है, जिसमें आतंकवाद-निरोधी और राजद्रोह कानून के तहत मुकदमा चलाना शामिल है। इन समूहों ने कड़ी आलोचना करते हुए आगे कहा था कि सरकारी तंत्र द्वारा बड़े पैमाने पर असहमति को कुचलने के साथ-साथ पत्रकारों को निशाना बनाने की कार्रवाई ने हिंदू राष्ट्रवादियों को भारत सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों स्तरों पर बेखौफ होकर धमकाने, हैरान-परेशान करने और दुर्व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पॉलिटिकल साइंस में स्नातक की पढ़ाई करने वाले 22 वर्षीय प्रत्युष पत्रकारिता में अपना करियर बनाने की सोच रहे हैं, पर उन्हें भी पत्रकारों के साथ सरकारी एजेंसियों द्वारा बरते जा रहे रवैए से डर लगता है। मगर उन्हें भारत की न्यायिक व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के दायरे में रहकर अगर बोलने का अधिकार है तो बोलेंगे ज़रूर। प्रत्युष को फिर भी मन के किसी कोने में मोहम्मद ज़ुबैर व उनके जैसे कई अन्य पत्रकारों के साथ हुई कार्रवाई से डर ज़रूर लगता है। उनका कहना है कि परिवार में भी लोगों को इस क्षेत्र में भेजने में डर लगता है।

बता दें कि इसी साल रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूची में भारत 180 देशों की सूची में 150 वें स्थान पर है। इससे पहले साल 2021 की रैंकिंग में भारत 142 वें स्थान पर था। गौरतलब है कि भारत इस लिस्ट में नेपाल से भी पीछे है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की रैंकिंग गिरने के पीछे के कारणों की बात करें तो पत्रकारों के खिलाफ़ हिंसा, राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण मीडिया और मीडिया स्वामित्व की एकाग्रता इत्यादि शामिल है। बता दें कि रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर हर साल ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ जारी करता है। जिसमें अलग-अलग देशों में मीडिया काम करने में कितना आज़ाद है, उसकी स्थिति बताई जाती है।

बीते कुछ सालों में पत्रकारों के ऊपर सरकारी तंत्र ने गैर कानूनी गतिविधि रोक थाम अधिनियम (UAPA) का खूब इस्तेमाल किया है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से लगभग सभी पत्रकार सरकार के प्रति मुखर थे। इनमें से एक उदाहरण केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन का है जिन्हें उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलित लड़की के साथ हुई क्रूरता को कवर करने जाने के क्रम में बीच रास्ते से गिरफ्तार कर लिया गया। कप्पन अक्टूबर 2020 से अब तक जेल में हैं। 

उत्तर प्रदेश के एक सरकारी स्कूल में मिड डे मील में बच्चों को नमक रोटी दिए जाने पर रिपोर्ट करने वाले पत्रकार ‘पवन जायसवाल’ पर एफआईआर दर्ज कर दी गई, जो कि प्रदेश में मीडिया की आज़ादी की काली दास्तान बयान करती हुई नज़र आती है। मध्य प्रदेश के सीधी का एक मामला काफ़ी चर्चा में रहा, जिसमें सत्ताधारी दल के विधायक के खिलाफ़ न्यूज़ रिपोर्टिंग करने पर एक राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल के स्टिंग सहित आठ पत्रकारों को न केवल गिरफ्तार किया गया बल्कि बिना कपड़ों के फ़ोटो खींचकर वायरल भी किया गया।

 (रब्बानी अफज़ाल पत्रकारिता के छात्र हैं।)

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