Saturday, October 1, 2022

संसद में मुद्दा न उठे इसलिए जरूरी है कि हंगामा जारी रहे

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इसे कहते हैं, बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभानअल्ला! कुछ ऐसा जताते हुए कि जैसे संसद के मानसून सत्र में विपक्ष द्वारा किया जा रहा हंगामा काफी न हो, गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी यानी सत्ता पक्ष के सांसद भी हंगामा करने पर उतर आये। उन्होंने इतना भी ध्यान नहीं रखा कि संसद में सार्थक विचार-विमर्श लायक व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी में सबसे बड़ा हिस्सा उनके ही पक्ष का है और कल तक वे ऐसे ही हंगामों के लिए विपक्ष को कोसते नहीं थक रहे थे! 

संसद के दोनों सदनों में सत्तापक्ष के हंगामे का सबब था-लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी द्वारा बुधवार को सोनिया गांधी से प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ के वक्त राजधानी में एक प्रदर्शन के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के लिए ‘राष्ट्रपत्नी’ शब्द का इस्तेमाल करना। दो महिला मंत्रियों निर्मला सीतारमण व स्मृति ईरानी की अगुआई में इसे मुद्दा बनाते हुए सत्तापक्ष मांग कर रहा था कि इसके लिए न सिर्फ चौधरी बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी माफी मांगनी चाहिए क्योंकि इससे उनकी पार्टी की आदिवासी और महिला विरोधी सोच का पता चलता है। 

सत्तापक्ष ने चौधरी द्वारा अपनी चूक मानकर दी गई यह सफाई भी गवारा नहीं की कि वे राष्ट्रपति के तौर पर द्रौपदी मुर्मू का बहुत सम्मान करते हैं और उनके मुंह से ‘राष्ट्रपति’ की जगह ‘राष्ट्रपत्नी’ निकल जाने के पीछे उनकी कोई गलत मंशा नहीं थी। यह भी नहीं माना कि पश्चिम बंगाल से आने वाले बंगला भाषी चौधरी की हिन्दी बहुत अच्छी नहीं है और इस कारण यह उनके अज्ञान या जुबान फिसल जाने का मामला भी हो सकता है। 

इस हंगामे में कई चीजें गौरतलब हैं। पहली तो यही कि पिछले कुछ वर्षों में सत्तापक्ष और विपक्ष जानबूझकर एक दूसरे के दुश्मन न बना दिये गये होते तो जैसा कि चौधरी कह रहे हैं, सत्तापक्ष द्वारा इसे यों राई को पहाड़ न बनाया जाता। तब इसे लेकर कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के बीच वह तीखी नोक-झोंक भी नहीं ही होती, जिसने घटित होकर सिर्फ यही दर्शाया कि इन दिनों सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों पुरानी सारी संसदीय मान्यताएं और परम्पराएं भूलकर परस्पर बदले की भावना से भरे हुए हैं। उन्हें ये परम्पराएं और मान्यताएं याद होतीं तो सारे मामले को हंसकर टाल दिया जाता। इस तथ्य के आलोक में सत्तापक्ष के नेताओं का विपक्षी महिला नेताओं के अपमान का रिकार्ड भी आसानी से तोड़े जाने लायक नहीं है। या फिर बहुत होता तो अधीर रंजन चौधरी पर थोड़ी दया प्रदर्शित कर दी जाती। यह दया प्रदर्शन भी उनके लिए सजा ही होता। 

दूसरी बात यह कि सत्तापक्ष के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि इस हंगामे से देश की जटिल होती जा रही समस्याओं की ओर से ध्यान हटाकर लोगों को भरमाने के सिवाय वह और कौन-सा संदेश देना चाहता है? 

उसके हंगामे को विपक्ष के हंगामों के साथ मिलाकर तो कतई नहीं देखा जा सकता। विपक्ष उसकी रीति-नीति के खिलाफ हंगामा करता है तो उसकी अपेक्षा होती है कि सत्तापक्ष उसकी सुने और अपने उन कदमों को वापस खींचे, जिनके कारण देश के लोग हलकान हैं और अपने वर्तमान व भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहे। वह सत्तापक्ष को यह डर भी दिखाता है कि उसने अपने कदम वापस नहीं खींचे तो देशवासी उसे सत्ता से बेदखल कर देंगे। यों, विपक्ष का हंगामा उसकी इस असहायता का भी प्रतीक होता है कि उसके हाथों में और कोई शक्ति नहीं होती, जबकि सत्तापक्ष के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती। देश में जहां कहीं भी जो कुछ भी गड़बड़ हो रहा हो, उसे ठीक करने के लिए उसे किसी हंगामे की नहीं, अपनी शक्तियों के इस्तेमाल की जरूरत होती है। 

उन शक्तियों के इस्तेमाल के बजाय वह विपक्ष के खिलाफ हंगामा करता है तो उसे बताना चाहिए कि वह उसे कौन-सी सजा दिलाना चाहता है। देश की जनता तो उसे पहले ही सत्ता से बेदखली की सजा सुना चुकी है। अब वह उसे इससे कड़ी और कौन-सी सजा देगी? इस लिहाज से देखें तो अगर सत्तापक्ष को लगा कि चौधरी के राष्ट्रपत्नी कहने से राष्ट्रपति का अपमान हुआ है, तो भी उसे भूलना नहीं चाहिए था कि वह विपक्ष में नहीं सत्ता में और अपमान के कानूनी उपचार में समर्थ है।       

लेकिन सब कुछ भूलकर उसने खुद हंगामा बरपाने का रास्ता अपनाया तो निस्संदेह, इससे उसकी यह मंशा झलकती है कि पिछले कई सत्रों की तरह संसद का यह सत्र भी हंगामे में ही गुजर जाये। ताकि वह महंगाई और बेरोजगारी जैसी दीर्घकालिक समस्याओं के अलावा सेना में भर्ती की अग्निपथ योजना, महाराष्ट्र के महाभारत, सरकारी जांच एजेंसियों के विपक्षी नेताओं पर बढ़ते शिकंजे, सत्र से ठीक पहले सरकार की आलोचना में इस्तेमाल होने वाले अनेक शब्दों को असंसदीय करार दिये जाने और सदनों में तख्तियां या पर्चे वगैरह लहराने पर रोक लगाने आदि के मुद्दों पर जवाबदेही से बच जाये।  

जवाबदेही से बचने की प्रत्यक्ष व प्रच्छन्न सरकारी कवायदों का ही फल है कि मानसून सत्र के पहले दिन से ही सत्तापक्ष व विपक्ष के बीच गतिरोध कायम है। पहले तो सरकार ने महंगाई और जीएसटी जैसे ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा की विपक्ष की मांग न मानकर उसको हंगामे के लिए मजबूर किया, फिर नौबत लोकसभा और राज्यसभा से 27 सांसदों के निलम्बन तक ला दी गई। इनमें से किसी का कुसूर था पर्ची उछालना तो किसी का तख्तियां दिखाना। अकारण नहीं कि विपक्ष ने इन सांसदों के निलम्बन को लोकतंत्र का निलम्बन कहा है। 

कहां तो सत्तापक्ष को इस सबको लेकर इस विडम्बना पर चिंतित होना चाहिए था कि चर्चा और विमर्श के लिए बनी संसद में यही दो काम नहीं हो पा रहे हैं और कहां वह गुरुवार को खुद हंगामे पर उतर आया। विपक्ष को दुश्मन मानकर उसकी लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाइशों को तो वह पहले से ही खत्म करता आ रहा है। इसे यों समझ सकते हैं कि एक ओर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला कहते हैं कि देश की जनता चाहती है कि सदन चले, लेकिन दूसरी ओर सरकार को समझ में नहीं आ रहा कि जनता यह भी चाहती है कि जिन नेताओं को उसने सांसद बनाकर संसद में भेजा है, वे वहां उसकी समस्याओं को उठाएं और सरकार उन्हें जवाब दे। साथ ही देश में जिन वजहों से महंगाई और बेरोजगारी बढ़ रही है, उन पर चर्चा हो और कोई ऐसा हल निकाला जाये, जिससे पूरे देश को राहत मिल सके। इसके उलट सरकार इस बात को लेकर विपक्ष को ही कठघरे में खड़ी करने में लगी रहती है कि वह सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक में मिलजुल कर संसद का कामकाज चलने देने पर बनी सहमति का पालन नहीं कर रहा। 

सच्चाई यह है कि अगर सरकार पहले ही विपक्ष को बता देती कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के कोविड संक्रमण से उबर कर संसद लौटने के बाद महंगाई के मुद्दे पर बहस करायेगी, साथ ही प्रधानमंत्री व संबंधित मंत्रालयों के मंत्री विपक्षी सांसदों के सवालों के जवाब देने के लिए सदन में नियम से उपस्थित हुआ करते, तो मानसून सत्र का गतिरोध इतना लम्बा नहीं खिंचता। वह इसीलिए लम्बा खिंचता रहा कि सरकार की ओर से उसके खात्मे की कोई गंभीर पहल नहीं की गई, जबकि संसद की गरिमा का तकाजा था कि वह अपनी ओर से ऐसी पहल करे। अब खुद हंगामे पर उतरकर भी वह यही जता रही है कि संसद की चर्चा में देश के सरोकारों को प्राथमिकता उसके एजेंडे पर नहीं है और वह टकराव की राजनीति करके लाभ उठाना चाहता है। 

(कृष्ण प्रताप सिंह जनमोर्चा के संपादक हैं। और आजकल फैजाबाद में रहते हैं।)

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