संस्कृति-समाज

स्मृति दिवस विशेष: फ़िक्र तौंसवी का लेखन, एक बेहतर समाज बनाने की फ़िक्र से निकला है

आम धारणा यह है कि उर्दू ज़बान मुसलमानों की भाषा है और यह ज़बान कहीं और से… Read More

“मैं क्यूं जाऊं अपने शहरः 1984 कुछ सवाल कुछ जवाब”: सिख जनसंहार पर आधारित पुस्तक पर चर्चा

नई दिल्ली। द वायर के मुख्य संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने कहा कि “1984 के कत्लेआम को… Read More

जन्मदिवस विशेष: थोड़े में बहुत कुछ कहने वाला अफसानानिगार राजिंदर सिंह बेदी

उर्दू अफ़्सानवी अदब बात हो, और वह राजिंदर सिंह बेदी के नाम के ज़िक्र के बिना ख़त्म… Read More

चाकू समय में हथेलियां: लोकतांत्रिक स्पेस तलाशती स्त्रियों की कहानियां

इन कहानियों में एक बेकरार दौर है। बेकरार दिल की बेकरार कहानियां हैं। लोकतांत्रिक स्‍पेस तलाशने की… Read More

पुस्तक समीक्षा: ‘अधूरे’ एक रूपक है, इंसानी ज़िंदगी के अधूरेपन का

‘अधूरे’ तेलुगु कहानी संग्रह है, जिसका हिंदी अनुवाद डॉ. एस.के. साबिरा ने किया है। संग्रह की सारी… Read More

आपातकाल की स्थितियों को समझने के लिए इतिहास को जानना जरूरी : ज्ञान प्रकाश

नई दिल्ली। सत्तर के दशक में आपातकाल लगाने के पीछे इंदिरा गांधी की सत्ता में बने रहने… Read More

‘जंगलनामा-बस्तरां दे जंगल बिच’: एक कम्युनिस्ट कार्यकर्ता का सफरनामा

जंगलनामा-बस्तरां दे जंगल बिच, यह इस किताब का पंजाबी शीर्षक है जो सन 2004 में छपी थी।… Read More