संस्कृति-समाज

पुस्तक समीक्षा: अपने समय के सच को उजागर करती मारक विमर्श की कविताएं

पुस्तक समीक्षा:  कवि पंकज चौधरी समाज की वर्तमान अवस्था पर पैनी नज़र रखने वाले विलक्षण कवि हैं।… Read More

‘मेरी आवाज़ में है तू शामिल’: बेबाक ग़ज़ल, सच्ची नज़्में

मेरे हाथ में जब ‘गुलमोहर किताब’ प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित कवि/शाइर/पत्रकार और जनवादी लेखक मुकुल सरल की… Read More

लोकरंग महोत्सव: लोक संस्कृति को बचाने के लिए साझा आंदोलन समय की मांग

कुशीनगर। लोक संस्कृति पर हो रहे सांस्कृतिक हमले के खिलाफ साझा आंदोलन की जरूरत महसूस की जा… Read More

लोकरंग महोत्सव की पहली शाम: गीत व नृत्य में दिखी विलुप्त हो रही भारतीय साझा संस्कृति 

कुशीनगर। सांस्कृतिक भड़ैती व फूहड़फन के खिलाफ जनसंस्कृति को स्थापति करने के संकल्प के साथ 15 अप्रैल… Read More

जयंती पर विशेष: ‘हरिऔध’, जिन्होंने रचा खड़ी बोली का पहला महाकाव्य

कोई पूछे कि खड़ी बोली में रचा गया हिन्दी का पहला महाकाव्य कौन-सा है, तो हिंदी साहित्य… Read More

जन्मदिन पर विशेष: सफ़दर का रंगकर्म जनता को जागरूक करने का जरिया था

12 अप्रैल, कलाकार और रंग निर्देशक सफ़दर हाशमी का जन्मदिन, हर साल ‘राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस’ के… Read More

प्रगतिशील लेखक संघ: सामाजिक बदलाव का क्षण साहित्य की निगाहों से चूकना नहीं चाहिए

इंदौर। प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की 87वीं वर्षगांठ एवं हरिशंकर परसाई की जन्म शताब्दी के अवसर… Read More