चुनाव आयोग के इस दावे पर विवाद कि सुप्रीम कोर्ट ने नए फ़ॉर्म 6 डिक्लेरेशन को मंज़ूरी दी थी

स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (एसआईआर) प्रोसेस के दौरान फ़ॉर्म 6, जिसका इस्तेमाल नए मतदाताओं को शामिल करने के लिए किया जाता है, में किए गए बदलावों पर चुनाव आयोग के इस दावे कि एसआईआर के लिए फॉर्म ६ के साथ जोड़े गए डिक्लेरेशन फ़ॉर्म को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर से जुड़े अपने मई के फ़ैसले में मंज़ूरी दे दी थी, पर विवाद खड़ा हो गया है।

लाइव लॉ के अनुसार ग़ैर-एसआईआर अवधि के लिए, नियमों (मतदाता पंजीकरण नियम, 1960) के अनुसार लागू फ़ॉर्म का इस्तेमाल किया जाएगा।” इसका मतलब यह है कि नए फ़ॉर्म डिक्लेरेशन, जो अभी विवाद का विषय है, को सुप्रीम कोर्ट ने मंज़ूरी दी है। हालांकि, यह दावा पूरी तरह से सही नहीं हो सकता है, क्योंकि चुनाव आयोग द्वारा पेश किए गए इस खास डिक्लेरेशन फ़ॉर्म की सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर मामले में जांच नहीं की थी।

दरअसल फ़ॉर्म 6 का विवाद क्या है? कानूनी ढांचे के तहत वोटर लिस्ट में वोटर्स को शामिल करने से जुड़े 3 मुख्य फ़ॉर्म हैं – फ़ॉर्म 6, फ़ॉर्म 7 और फ़ॉर्म 8 जिनमें से फ़ॉर्म 6 वोटर लिस्ट में नए वोटर को शामिल करने से जुड़ा है, फ़ॉर्म 7 मौजूदा वोटर को शामिल करने/हटाने पर आपत्तियों से जुड़ा है और फ़ॉर्म 8 मौजूदा वोटर की एंट्री में सुधार से जुड़ा है।

24 जून 2025 को चुनाव आयोग ने बिहार राज्य में एसआईआर की घोषणा करते हुए एक आदेश जारी किया। इस आदेश के साथ ‘परिशिष्ट डी’ जुड़ा था, जिसमें डिक्लेरेशन फ़ॉर्म था जिसे नए मतदाता के तौर पर एनरोलमेंट/राज्य के बाहर से स्थलांतरित होने के लिए फ़ॉर्म 6/फ़ॉर्म 8 के साथ जमा करना था। इसके तहत आवेदक को अपनी उम्र, सामान्य निवास और नागरिकता के बारे में डिक्लेरेशन देना था। कोई भी गलत डिक्लेरेशन देने पर जन प्रतिनिधि अधिनियम की धारा 31 के तहत सज़ा हो सकती थी, जिसमें 1 साल तक की सज़ा का प्रावधान था।

इस साल मई में बिहार एसआईआर (विशेष मतदाता पुनरीक्षण) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद – खासकर मतदाता पात्रता साबित करने के लिए चुनाव आयोग द्वारा 11 दस्तावेज़ों की ज़रूरत बताने के मामले में – सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर कराने की चुनाव आयोग की शक्ति को सही ठहराया।

याचिकाकर्ताओं की इस दलील पर कि चुनाव आयोग ऐसा कोई ‘घोषणा-पत्र’ नहीं मांग सकता जो नियमों में नहीं बताया गया, कोर्ट ने कहा कि एसआईआर  प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग सिर्फ़ ‘फॉर्म 6’ तक ही सीमित नहीं है। उसके पास किसी खास एसआईआर प्रक्रिया के हिसाब से दस्तावेज़ों के ढांचे में बदलाव करने का अधिकार है। लेकिन कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा ढांचा बनाते समय चुनाव आयोग को कानूनी नियमों का ध्यान रखना चाहिए और किसी भी बदलाव का मकसद हासिल करने के तरीके से तार्किक संबंध होना चाहिए।

जुलाई में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने ‘फॉर्म 6 घोषणा-पत्र’ में बदलाव किए, जिसका इस्तेमाल दूसरे राज्यों में पिछली एसआईआर प्रक्रिया के दौरान किया गया। नए घोषणा-पत्र के अनुसार, आवेदकों को यह बताना था कि क्या वे या उनके माता-पिता/रिश्तेदार पिछली एसआईआर प्रक्रिया में शामिल थे।

यह कानूनी ‘फॉर्म 6’ और बिहार एसआईआर में इस्तेमाल किए गए घोषणा-पत्र, दोनों से अलग है। ज़ाहिर है, ऑनलाइन भरे जाने वाले ‘फॉर्म 6’ में घोषणा-पत्र को फॉर्म का ही हिस्सा बना दिया गया। हालांकि इसे अनिवार्य नहीं बताया गया, लेकिन आवेदक घोषणा-पत्र भरे बिना फॉर्म जमा करने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा सकता।

पिछले हफ़्ते, ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने रिपोर्ट दी कि दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) ने ‘फॉर्म 6 घोषणा-पत्र’ में बदलाव पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका तर्क था कि जब तक केंद्र सरकार नियमों में संशोधन नहीं करती, तब तक ये बदलाव नहीं किए जा सकते। गौरतलब है कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू के हवाले से यह भी कहा गया कि उन्होंने 13 अगस्त को ‘फॉर्म 6’ में किए गए बदलाव को “अनाधिकृत और गैर-कानूनी” बताया है।

फॉर्म 6 के साथ जुड़े नए घोषणा पत्र में क्या जानकारी देनी होती है? आवेदक की बुनियादी जानकारी (जैसे नाम, मोबाइल नंबर, पता, नागरिकता की स्थिति) के अलावा, घोषणा पत्र में आवेदक या उनके रिश्तेदार की पिछली एसआईआर (विशेष पुनरीक्षण) के अनुसार जानकारी मांगी जाती है। जहां आवेदक की पिछली एसआईआर के अनुसार जानकारी केवल लागू होने पर ही देनी होती है, वहीं रिश्तेदार की पिछली एसआईआर की जानकारी देना ज़रूरी लगता है।

इन जानकारियों में नाम, एपिक नंबर (यदि उपलब्ध हो), रिश्तेदार का नाम, रिश्ता, ज़िला, राज्य, विधानसभा क्षेत्र का नाम, विधानसभा क्षेत्र का नंबर, भाग संख्या और क्रम संख्या शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि बूथ लेवल अधिकारियों को घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करके यह पुष्टि करनी होती है कि उन्होंने पिछली एसआईआर रोल से दी गई जानकारी की जांच कर ली है।

चुनाव आयोग का यह भी कहना है कि ईआरओ उन आवेदकों को नोटिस जारी करेंगे जिनकी पिछली एसआईआर जानकारी, जो घोषणा पत्र में दी गई है, उपलब्ध नहीं है या डेटाबेस से मेल नहीं खाती है।

फॉर्म 6 भरने के लिए चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों के अनुसार, घोषणा पत्र वाले हिस्से में कोई भी गलत बयान देना जन प्रतिनिध अधिनियम के तहत अपराध माना जाता है। इसके लिए 1 साल तक की जेल (या जुर्माना, या दोनों) हो सकती है। इसलिए पिछली एसआईआर में रिश्तेदार के नामांकन की जानकारी देने में कोई भी गलती कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकती है।

फॉर्म 6 के साथ जुड़े इन दिशानिर्देशों में कहा गया: “घोषणा पत्र: “घोषणा पत्र” वाले हिस्से में सभी जानकारी पूरी तरह से भरी जानी चाहिए। कृपया ध्यान दें कि घोषणा पत्र वाले हिस्से में कोई भी गलत बयान देना ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ की धारा 31 के तहत दंडनीय अपराध है, जिसके लिए एक साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।”

बिहार एसआईआर फ़ैसले ने एसआईआर आयोजित करने और व्यापक एसआईआर ढांचे के संबंध में चुनाव आयोग का अधिकार बरकरार रखा। यह देखते हुए कि फॉर्म 6 के लिए दस्तावेज़ीकरण ढांचे को एसआईआर प्रक्रिया पर “शब्दशः” लागू करने की आवश्यकता नहीं है, कोर्ट ने चुनाव आयोग के पास कुछ हद तक बचे हुए अधिकार को मान्यता दी, जिससे वह किसी विशेष एसआईआर के अनुकूल दस्तावेज़ीकरण ढांचा तैयार कर सके।

कोर्ट ने कहा: “यह सच है कि ‘मतदाता पंजीकरण नियम, 1960’ के तहत बताया गया ‘फॉर्म 6’ डॉक्यूमेंटेशन का एक ढांचा तय करता है; लेकिन, यह जन प्रतिनिधि अधिनियम की धारा 21(2) के तहत सोची गई रिविज़न प्रक्रिया के हिसाब से बनाया गया और हो सकता है कि हर स्थिति में इसे इस तरह के काम के लिए हूबहू लागू न किया जा सके। इसलिए आयोग के पास ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ की ज़रूरतों के हिसाब से डॉक्यूमेंटेशन का सही ढांचा बनाने का कुछ बचा हुआ अधिकार होता है।”

हालांकि, साथ ही कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चुनाव आयोग का यह अधिकार “असीमित” नहीं है। अगर चुनाव आयोग कानून में तय ढांचे से हटकर कुछ करता है तो उस बदलाव का उस मकसद से “तार्किक संबंध” होना चाहिए जिसे हासिल करना है।

कोर्ट ने कहा डॉक्यूमेंटेशन सिस्टम बनाते समय कानूनी ढांचे का इस्तेमाल करते हुए एक सही संतुलन बनाना चाहिए और ज़रूरत पड़ने पर उसे इस तरह बदलना चाहिए कि वोटर लिस्ट की सटीकता और ईमानदारी सुनिश्चित करने का मकसद पूरा हो सके।”

इस तरह कोर्ट ने चुनाव आयोग  के ‘फॉर्म 6’ के अलावा अतिरिक्त डॉक्यूमेंट्स तय करने के अधिकार को तो माना, लेकिन यह भी कहा कि मौजूदा नियम ही प्रक्रिया का मार्गदर्शन करेंगे। अगर नियमों से हटकर कुछ किया जाता है, तो उस बदलाव का मकसद से तार्किक संबंध दिखाकर उसे समझाना होगा।

उल्लेखनीय है कि इस मामले में कोर्ट के सामने चुनाव आयोग का रुख यह था कि उसका डॉक्यूमेंटेशन फ़्रेमवर्क (जिसमें उस समय संबंधित डिक्लेरेशन फ़ॉर्म शामिल नहीं था) पहले की प्रक्रियाओं की तुलना में ज़्यादा “व्यापक” और “सुविधाजनक” था। चुनाव आयोग का अब वोटरों से लगभग 25 साल पुरानी वोटर लिस्ट के आधार पर अपने माता-पिता/दादा-दादी की जानकारी खोजने और देने के लिए कहना अजीब लगता है।

चुनाव आयोग का दावा है कि एसआईआर के लिए फ़ॉर्म 6 के साथ जुड़े डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट ने “मंज़ूरी” दी थी, लेकिन वह इस बात को नज़रअंदाज़ कर देता है कि वह डिक्लेरेशन उस डिक्लेरेशन फ़ॉर्म से अलग है, जिसे कथित तौर पर जुलाई में पेश किया गया और जो अभी चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर के बारे में जून, 2025 के चुनाव आयोग आदेश के परिशिष्ट डी में शामिल डिक्लेरेशन को मंज़ूरी दी थी। मौजूदा डिक्लेरेशन इस मायने में अलग है कि इसमें आवेदक-वोटर को पिछले एसआईआर में अपने रिश्तेदार के एनरोलमेंट की जानकारी देनी होती है।

‘रेशनल नेक्सस टेस्ट’ के अलावा, चुनाव आयोग के इस कदम को ‘रीज़नेबल डिफरेंशिया टेस्ट’ (उचित अंतर की कसौटी) से भी गुज़रना पड़ सकता है, क्योंकि नया डिक्लेरेशन पेश करने के लिए जुलाई का समय चुना गया, जबकि 13 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में वोटर बिना रिश्तेदारों के पिछले एसआईआर की जानकारी देने की मुश्किल शर्त के ही एसआईआर प्रक्रिया से गुज़रे थे।

(जनचौक ब्यूरो)

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