नेताजी सांप्रदायिक राजनीति के धुर विरोधी थे। इसीलिए जब वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने, तो कांग्रेस में लीग या हिंदू महासभा की दोहरी सदस्यता रखने वालों को दोहरी सदस्यता छोड़ने तथा एकल सदस्यता अपनाने को कहा।
हालांकि कुछ लोग यह भी कहते हैं कि नेताजी हिंदू महासभा और संघ के नेताओं के संपर्क में रहते थे और कुछ-एक मौकों पर सावरकर से मुलाकात भी की थी। ऐसा कहकर के वे अपने नेताओं की अहमियत और स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी सहभागिता की वैधता को सुनिश्चित करना चाहते हैं। बंगाल में मुखर्जी के नेतृत्व में चलाई गई मीटिंगों का बोस द्वारा विरोध किए जाने की बात को वे नजरअंदाज कर जाते हैं।
बोस के लिए भारत की स्वतंत्रता सर्वोपरि थी, बाकी सब बाद में। उन्होंने जर्मनी के तानाशाह हिटलर से भी मिलना तय किया, क्योंकि उनको लगता था कि उसकी सहायता से वे अपने उद्देश्य को पाने में सफल होंगे। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हिटलर उनका आदर्श था।
इसी भावना के चलते ही उन्होंने 1939 में संघ के हेडगेवार से मिलना तय किया, क्योंकि सबके सहयोग से वे ब्रिटिश सत्ता को कड़ी चुनौती दे सकते थे। यहां भी उनका मुख्य उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने से था, कोई राजनीतिक सत्ता हासिल करना नहीं।
बोस ने हेमू हुद्दार (Hemu Hudedar), से हेडगेवार से मुलाकात कराने को कहा। बता दें कि हुड्डार आरएसएस के प्रारंभिक सदस्य और हेडगेवार के बहुत ही करीबी थे। ये संघ के पहले महासचिव भी रहे थे। लेकिन भारतीय स्वतंत्रता की चाहत ने उन्हें संघ से अलग कर दिया। संघ हिंदुत्व की सांस्कृतिक सर्वोच्चता की परिधि में ही सीमित था।
हुद्दार ने बोस के अनुरोध पर हेडगेवार से मिलने का फैसला किया। वे बोस के प्रति सद्भावना रखते थे। हुद्दार हेडगेवार के साथ अपने पुराने संबंधों के कारण इस भूमिका के लिए उपयुक्त थे। वे नागपुर पहुंचे, जहां हेडगेवार के सहयोगी एम.एन. घाटे ने उनका स्वागत किया। हुद्दार ने हेडगेवार के कमरे में प्रवेश किया, जहां वे कुछ युवा स्वयंसेवकों के साथ हंसते-बोलते मिले। हुद्दार ने बोस का संदेश दिया: “मैं सुभाष बाबू द्वारा भेजा गया हूं, जो आपसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक हैं।” लेकिन हेडगेवार ने कहाकि वे “बहुत बीमार” हैं और किसी से मिल नहीं सकते।
हुड्डार लिखते हैं कि वास्तव में, हेडगेवार स्वस्थ दिख रहे थे, लेकिन आरएसएस की नीति के अनुसार, वे संगठन को प्रत्यक्ष राजनीतिक आंदोलन से अलग रखना चाहते थे। हुद्दार ने बहुत अनुरोध किया, लेकिन हेडगेवार अडिग रहे। हुद्दार ने हेडगेवार से अनुरोध किया कि वे कम से कम बाहर इंतजार कर रहे एक अन्य व्यक्ति (शाह) को अपनी “शारीरिक बीमारी” के बारे में बताएं, ताकि बोस को संदेह न हो कि हुद्दार ने ही मिशन विफल कर दिया। हालांकि, हेडगेवार ने ऐसा नहीं किया। बाद में हुद्दार ने इस मुलाकात का ज़िक्र किया, जिससे तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य को समझा जा सकता है।
इस अनभई मुलाकात ने तमाम चीजों का खुलासा किया है। जहां नेताजी स्वतंत्रता के लिए किसी से भी मिलने को तैयार रहते थे, और वे यह मान के चलते थे संभव है इस मुलाकात से वे विरोधियों का हृदय परिवर्तन कर सकने में सफल होंगे। वहीं हेडगेवार किसी भी कीमत पर संघ को आंदोलन से दूर रखना चाहते थे। संघ का उद्देश्य हिंदू धर्म, संस्कृति की पुनर्स्थापना करना था।
इसलिए आज गांधी- नेहरू के मुकाबले जो सुभाष के प्रति सहानुभूति का दम भरते हैं, उन्हें अपने वैचारिक पुरखों के स्वतंत्रता आंदोलन से दूर रहने की नीति का तत्समय संदर्भों में मूल्यांकन भी करना चाहिए।
बोस सांप्रदायिक राजनीति के तौर-तरीके बखूबी जानते थे। 1940 में हिंदू महासभा के संदर्भ में उनका यह बयान देखें, जो आनंद बाज़ार पत्रिका में छपा था- “हिंदू महासभा ने त्रिशूलधारी संन्यासी और संन्यासिनों को वोट मांगने के लिए लगा दिया है। त्रिशूल और भगवा लबादा देखते ही हिंदू सम्मान में सिर झुका देते हैं। धर्म का फायदा उठाकर इसे अपवित्र करते हुए हिंदू महासभा ने राजनीति में प्रवेश किया है। सभी हिंदुओं का कर्तव्य है कि इसकी निंदा करे।”
बोस सांप्रदायिक सद्भाव के पक्षधर थे। उन्होंने अपनी आजाद हिंद फौज़ की ब्रिगेड के नाम झांसी की रानी, गांधी, नेहरू और आजाद के नाम पर रखे न कि मजहबी नेताओं के नाम पर।
बोस अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते थे। इसीलिए जब भी कोई स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य धारा से अलग हुआ, बोस उसकी तीव्र भर्त्सना करते हैं। 1 जनवरी 1943 को सिंगापुर में आज़ाद हिंद फौज के एक महत्वपूर्ण समारोह में नेताजी ने स्पष्ट कहा कि “जो भारतीय स्वतंत्रता के युद्ध में शरीक होने से इनकार करते हैं, वे देशद्रोही हैं।”
ध्यातव्य है कि इस दौरान जिन्ना और सावरकर दोनों ही भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध कर रहे थे।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी तो बंगाल में फजलुल हक़ की सहयोगी सरकार में वित्तमंत्री की हैसियत से, अंग्रेज गवर्नर को “भारत छोड़ो आंदोलन” को कुचलने की सलाह दे रहे थे।
नेताजी सावरकर और जिन्ना दोनों की राजनीति से खिन्न थे। ये दोनों ही सरकार के सहयोगी की भूमिका में थे।
जहां जिन्ना ने भारत छोड़ो आंदोलन को “मुस्लिम हितों के लिए हानिकारक” बताया, वहीं सावरकर ने भारत छोड़ो आंदोलन का खुला विरोध कर ब्रिटिश शासन से “सैन्य प्रशिक्षण” के नाम पर सहयोग का आह्वान किया था।
सावरकर के 1942 के पुणे के एक भाषण को देखें , जिसमें वे कहते हैं—“युवक ब्रिटिश सेना में भर्ती हों, ताकि वे सैन्य कौशल प्राप्त कर सकें और भविष्य में हिंदू राष्ट्र की रक्षा कर सकें।”
लेकिन विडंबना है कि तब नेताजी की बात न मानने वाले संगठन आज राजनीति की मुख्यधारा के नायक बनने की इच्छा से वर्तमान में उन्हींको अपनाने की बात कर रहे हैं।
हालांकि इसका यह मतलब कतई न निकाला जाय कि इन सांप्रदायिक संगठनों का हृदय परिवर्तन हो गया है। नेताजी, भगतसिंह और पटेल इनके लिए पॉलिटिकल टूल से ज्यादा नहीं। ये इन राष्ट्रनायकों का इस्तेमाल नेहरू पर निशाना साधने के लिए करते हैं। उनकी सांप्रदायिक राजनीति आज और ज्यादा घृणा के स्तर पर पहुंच गई है। अगर प्रधानमंत्री सुभाष या भगतसिंह बने होते तो वे भी आज इनके निशाने पर उसी तरह होते, जैसे आज नेहरू हैं। इसे गोडसे के अग्रणी अख़बार में छपे उस चित्र के जरिए समझा जा सकता है, जिसमें गांधी को दशानन के रूप में दिखाया गया है। रावण के दस सिरों में इनके चहते पटेल, नेहरू और सुभाष आदि भी शामिल हैं, जबकि सावरकर और मुखर्जी राम-लक्ष्मण की भूमिका में शर-संधान करते हुए दिख रहे हैं।
आज जिस तरह से नेहरू बनाम बोस, नेहरू बनाम पटेल और नेहरू बनाम भगतसिंह किया जाता है, उसके अपने निहितार्थ हैं।
बोस और भगतसिंह निःसंदेह अनमोल रत्न हैं। लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि ये फलां बनाम फलां की राजनीति करने वाले खुद बोस और भगतसिंह की विचारधारा के कितने नजदीक हैं।
(संजीव शुक्ल लेखक हैं।)