सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार को कहा कि बार काउंसिलों को पेशेवर नैतिकता, सदाचार और क्षमता बनाए रखने में अपनी भूमिका पर आत्म-मंथन करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “चाहे सेंट्रल बार काउंसिल हो या स्टेट बार काउंसिल, उन्हें प्रोफेशनल नैतिकता, सदाचार और प्रोफेशनल काबिलियत बनाए रखने में अपनी भूमिका और महत्व पर आत्म-मंथन करना चाहिए। जब कोई बार काउंसिल अपने सदस्यों का सम्मान नहीं हासिल कर पाती, तो यह कानूनी पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं है।”
जस्टिस नागरत्ना ने 29 अगस्त, 2026 को नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के 13वें दीक्षांत समारोह में भाषण देते हुए ये बातें कहीं। इस मौके पर दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय (जो यूनिवर्सिटी के चांसलर भी हैं), दिल्ली हाई कोर्ट के जज और वाइस-चांसलर प्रो. जीएस बाजपेयी भी मौजूद थे।
उनकी ये बातें बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा से जुड़े विवाद के कुछ हफ़्तों बाद सामने आई हैं। मिश्रा ने स्टेट बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे नालसार हैदराबाद के 2026 बैच के ग्रेजुएट होने वाले छात्रों को एडवोकेट के तौर पर एनरोल न करें, क्योंकि उन छात्रों ने अपने दीक्षांत समारोह में भारत के चीफ जस्टिस सूर्य कांत को बुलाए जाने पर आपत्ति जताई थी।बाद में उन्होंने अपना यह आदेश वापस ले लिया था।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि भारत में बार (वकीलों के संगठन) को “एकजुट होकर यह बताना चाहिए कि वे भारत में न्याय व्यवस्था को कैसे बनाए रख सकते हैं,” क्योंकि सिस्टम में केस पेंडिंग होने, देरी, बढ़ती लागत और अनिश्चितता जैसी समस्याएं हैं।
उन्होंने कहा, “बार की आज़ादी वकीलों को उनके अपने फ़ायदे के लिए मिला कोई अधिकार नहीं है। यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि एक संवैधानिक लोकतंत्र को ऐसे पेशेवरों की ज़रूरत होती है जो सलाह दे सकें, बहस कर सकें, चुनौती दे सकें और प्रतिनिधित्व कर सकें, और ऐसा करने के लिए उन्हें सरकार, बाज़ार या अपने क्लाइंट से भी इजाज़त न लेनी पड़े।”
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि बार की किसी भी चूक या गलती का हमारे राजनीतिक और नागरिक जीवन पर गहरा असर पड़ेगा। उन्होंने वकीलों से अपील की कि वे “अपनी सोच बदलें और अपने क्लाइंट के लिए जन-सेवा की भावना से काम करें, वरना भविष्य में उनकी अहमियत खत्म हो सकती है।”
कानूनी पेशे के बारे में उन्होंने कहा, “यह पेशा सिर्फ़ कोई नौकरी या व्यापार नहीं, बल्कि भरोसे का काम है,” और एक वकील “सिर्फ़ ऐसा व्यक्ति नहीं हो सकता जो घंटे के हिसाब से कानूनी जानकारी बेचता हो।”
उन्होंने अपना भाषण यह कहते हुए खत्म किया कि ग्रेजुएट होने वाले बैच के सदस्य अब संस्थान से “कोर्ट के अधिकारी और संविधान के संरक्षक” के तौर पर निकल रहे हैं।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)