Thursday, August 18, 2022

दास्तान-ए-झारखंड पुलिसः एक साल बाद दर्ज हुई ब्रम्हदेव सिंह के हत्या में शामिल सुरक्षा बलों के खिलाफ प्राथमिकी

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12 जून, 2021 को झारखंड के लातेहार जिला अन्तर्गत गारू थाना क्षेत्र के पिरी गांव निवासी 24 वर्षीय ब्रम्हदेव सिंह (खरवार जनजाति) की हत्या नक्सल के नाम पर किये जा रहे सर्च अभियान पर निकले सुरक्षा बलों ने कर दी थी। ब्रम्हदेव सिंह की पत्नी जीरामनी देवी ने अपने पति की हत्या में शामिल सुरक्षा बलों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाने के लिए 29 जून 2021 को गारू थाना में आवेदन दिया था, लेकिन पुलिस ने मामले पर कोई संज्ञान नहीं लिया। उसके बाद जीरामनी देवी ने कोर्ट का शरण लिया। वहीं मामले को लेकर पुलिस के खिलाफ लगातार आंदोलन भी होता रहा। आन्दोलन और न्यायालय में परिवाद दायर किए जाने के परिणाम स्वरूप लगभग एक साल बाद पुलिस द्वारा गारू थाना में सुरक्षा बलों के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता 156 (3) के आधार पर उक्त पुलिस पदाधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गयी है।

पुलिस पदाधिकारियों में कोबरा 203, झारखंड जगुआर व जिला पुलिस के पदाधिकारी शांमिल हैं। जिन पुलिस पदाधिकारियों पर प्राथमिकी हुई है। उसमें कोबरा 203 बटालियन के डिप्टी कमांडेट किरण कुमार, डिप्टी कमांडेट टीम नंबर 15 राजपाल गुर्जर, झारखंड जगुआर एजी-22 के डिप्टी कमांडेट राजीव कुमार, अरविंद कुमार, डिप्टी कमांडेट ध्रमेंद्र कुमार राम, प्रकाश सोय, एसआई रूपलाल प्रसाद, व दिवाकर धोबी शमिल हैं। गारू थाना कांड संख्या 11/2022 भादवि की धारा 302, 201/ 34 (ए) के तहत तीन मई 2022 को दर्ज किया गया है।

उल्लेखनीय है कि गत 12 जून, 2021 को झारखंड के लातेहार जिलान्तर्गत गारू थाना क्षेत्र के पिरी गांव निवासी 24 वर्षीय ब्रम्हदेव सिंह (खरवार जनजाति) समेत कई आदिवासी पुरुष नेम सरहुल (आदिवासी समुदाय का एक त्योहार) मनाने की तैयारी के तहत शिकार के लिए गनईखाड़ जंगल में घुसे। तभी माओवादी सर्च अभियान पर निकले सुरक्षा बलों ने जंगल किनारे से उन पर गोली चलानी शुरू कर दी। वे लोग हाथ उठाकर चिल्लाये कि वे लोग पार्टी (माओवादी) के लोग नहीं हैं। वे लोग हाथ उठाए सुरक्षा बलों से गोली नहीं चलाने का अनुरोध करते रहे। लेकिन सुरक्षा बलों ने उनकी एक न सुनी और फायरिंग कर दी। सुरक्षा बलों की ओर से गोलियां चलती रहीं, नतीजतन दीनानाथ सिंह के हाथ में गोली लगी और ब्रम्हदेव सिंह की गोली लगने से मौत हो गयी। इस घटना का सबसे दुखद और लोमहर्षक पहलू यह रहा कि ब्रम्हदेव सिंह को पहली गोली लगने के बाद भी उन्हें सुरक्षा बलों द्वारा थोड़ी दूर ले जाकर फिर से गोली मारी गई और उनकी मौत सुनिश्चित की गयी।

बताते चलें कि इन लोगों के पास पारंपरिक भरठुआ बंदूक थी, जिसका इस्तेमाल वे ग्रामीण छोटे जानवरों के शिकार के लिए करते हैं।

इस घटना के बाद इस कांड के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई न करके मृत ब्रम्हदेव सिंह समेत छः लोगों पर ही विभिन्न धाराओं के अंतर्गत प्राथमिकी (Garu P.S. Case No. 24/2021 dated 13/06/21) दर्ज कर दी। इस प्राथमिकी में पुलिस ने घटना की गलत जानकारी लिखी और पीड़ितों को ही प्रताड़ित किया गया। सुरक्षा बल व पुलिस द्वारा इस मामले को एक मुठभेड़ का जामा पहनाने की कोशिश की जाती रही है। पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी में भी तथ्यों के विपरीत बातें दर्ज की गई हैं। साथ ही मृत ब्रम्हदेव सिंह समेत छः पीड़ित आदिवासियों पर आर्म्स एक्ट समेत कई धाराओं के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज कर दी गयी है।

उक्त घटना के बाद ब्रम्हदेव सिंह की पत्नी जीरामनी देवी ने अपने पति की हत्या के लिए जिम्मेवार सुरक्षा बलों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करवाने के लिए 29 जून 2021 को गारू थाना में आवेदन दिया। लेकिन जीरामनी के आवेदन पर पुलिस ने कोई ध्यान नहीं दिया। पुलिस की इस उपेक्षा के खिलाफ गांव के लोगों सहित कई जनसंगठनों आन्दोलन छेड़ा।

वहीं मरहूम ब्रम्हदेव सिंह की पत्नी जीरामनी देवी ने अपने पति की सुरक्षा बलों द्वारा हत्या के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज न होने की शिकायत अक्टूबर 2021 में लातेहार के जिला कोर्ट में की। उसके बाद 20 नवंबर को जीरामनी ने झारखंड उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करके निम्न मांग की।

1) मामले की स्वतंत्र जांच के लिए उच्च न्यायलय के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में SIT का गठन हो।

2) लातेहार के लीड मजिस्ट्रेट को निदेश दें कि तुरंत प्राथमिकी दर्ज की जाए।

3) आवेदक व गवाहों को सुरक्षा दी जाए।

4) तुरंत 10 लाख रु का मुआवजा दिया जाए।

बता दें कि उक्त मामले को लेकर झारखंड जनाधिकार महासभा का एक प्रतिनिधि मंडल 17 जून को ग्रामीणों व पीड़ित परिवार से मिलकर घटना की जानकारी ली और अपनी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में बताया कि पुलिस की दमनकारी नीति के कारण ब्रह्मदेव सिंह की हत्या हुई है। पुलिस के द्वारा ब्रह्मदेव सिंह को उसके घर के कुछ दूरी पर मारा गया है और पुलिस उसके शव को टांग कर जंगल की ओर ले गई, ताकि इसे मुठभेड़ का रूप दिया जा सके।

उक्त घटना को लेकर अखिल झारखंड खरवार जनजाति विकास परिषद के केंद्रीय महासचिव लालमोहन सिंह ने सूचना के अधिकार के तहत गारू थाना से 13 जुलाई को जीरामनी देवी के आवेदन पर की गयी कार्यवाही की जानकारी मांगी थी।

द्वितीय अपील के बाद 11 अक्टूबर को गारू थाना प्रभारी द्वारा RTI जवाब में कहा गया है कि जीरामनी देवी के आवेदन को मामले के अनुसंधानकर्ता पुलिस अधीक्षक, बरवाडीह अंचल को जांच-पड़ताल कर आवश्यक कार्यवाही के लिए दी गयी है। यह गौर करने की बात है कि प्राथमिकी दर्ज करने की जिम्मेवारी गारू थाना की है न कि अनुसंधानकर्ता की। यह स्पष्ट है कि पुलिस न्यायसंगत कार्यवाही नहीं कर रही थी और दोषी सुरक्षा बलों को बचा रही थी।

जवाब में फिर से इस मामले को एक मुठभेड़ कहा गया जो कि सच्चाई से परे था। साथ ही, पुलिस द्वारा गलत कहानी गढ़ने की कोशिश उजागर होती रही। एक तरफ प्राथमिकी में सुरक्षा बलों द्वारा गोलीबारी में ब्रम्हदेव सिंह को गोली लगने का ज़िक्र तक नहीं थी और यह लिखा गया कि मुठभेड़ के बाद खोजबीन के दौरान मृत ब्रम्हदेव का शव जंगल किनारे मिला। दूसरी ओर RTI जवाब में कहा गया कि ब्रम्हदेव सिंह की पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु हो गयी। पुलिस द्वारा सच्चाई को छुपाने के लिए अलग-अलग कहानियां गढ़ी जाती रही।

यहां तक कि अखिल झारखंड खरवार जनजाति विकास परिषद हेमंत सोरेन सरकार को भी पत्र भेजकर न्याय की मांग की थी, लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ।

इस मामले पर एक जन संगठन झारखंड जनाधिकार महासभा ने विस्तृत तथ्यान्वेषण किया था और लगातार न्याय के लिए संघर्षरत रहा। दोषी सुरक्षा बल के विरुद्ध प्राथमिकी व कार्यवाही एवं पीड़ितों के परिवार के लिए मुआवज़ा की मांग ग्रामीणों व महासभा ने पिछले एक वर्ष में पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री तक कई बार अपील की है, साथ ही कई बार इसके विरुद्ध धरना व प्रदर्शन किया गया। स्थानीय पुलिस द्वारा कई बार ग्रामीणों पर मामला दर्ज न करने का दबाव बनाया गया था। प्राथमिकी न दर्ज होने के विरुद्ध जीरामनी देवी ने स्थानीय कोर्ट में कंप्लेंट केस दायर किया था। साथ ही झारखंड उच्च न्यायालय में भी मामला दर्ज किया था। कानूनी लड़ाई में झारखंड पीयूसीएल (PUCL) ने सहयोग किया।

इस मामले में पीयूसीएल ने राज्य सरकार की आदिवासियों के मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने के प्रति प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इससे बड़ी प्रशासनिक असंवेदनशीलता और क्या हो सकती है कि एक आदिवासी महिला को उसके पति की हत्या के विरुद्ध महज़ प्राथमिकी दर्ज करवाने में एक साल लगा, वो भी लगातार संघर्ष के बाद। अभी तक उन्हें किसी प्रकार का मुआवज़ा नहीं दिया गया है।

बता दें कि 23 फरवरी 2022 उसी क्षेत्र के आदिवासी अनिल सिंह को पुलिस ने माओवादियों का मदद करने के आरोप में गैर-क़ानूनी तरीके से तीन दिनों तक थाने में रखा और उसकी अमानवीय तरीके से शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना की। लेकिन घटना के तीन महीने बाद भी अनिल के आवेदन पर दोषी पुलिस पदाधिकारियों पर प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है।

उक्त घटनाओं पर जन संगठन झारखंड जनाधिकार महासभा और खरवार जनजाति के सामाजिक संगठन अखिल झारखंड खरवार जनजाति विकास परिषद ने झारखंड सरकार से मांग की है कि – ब्रम्हदेव सिंह की हत्या की प्राथमिकी पर ससमय न्यायसंगत कार्यवाही हो एवं हत्या के लिए ज़िम्मेवार सुरक्षा बल के जवानों व पदाधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

पुलिस द्वारा ब्रम्हदेव समेत छः आदिवासियों पर दर्ज प्राथमिकी को रद्द किया जाए।

ब्रम्हदेव की पत्नी को कम-से-कम 10 लाख रुपये मुआवज़ा दिया जाए और उनके बेटे की परवरिश, शिक्षा व रोज़गार की पूरी जिम्मेवारी ली जाए। साथ ही, बाकी पांचों पीड़ितों को पुलिस द्वारा उत्पीड़न के लिए मुआवज़ा दिया जाए।

अनिल सिंह (कुकू गाँव, बरवाडीह प्रखंड, लातेहार) पर हिरासत में किए गए हिंसा के लिए दोषी पुलिस पदाधिकारियों पर प्राथमिकी दर्ज हो, दंडात्मक कार्रवाई हो एवं अनिल को मुआवज़ा दिया जाए। नक्सल विरोधी अभियानों की आड़ में सुरक्षा बलों द्वारा लोगों को परेशान न किया जाए।

लोगों पर फ़र्ज़ी आरोपों पर मामला दर्ज करना पूर्णतः बंद हों। स्थानीय पुलिस को स्पष्ट निर्देश हो कि पीड़ितों द्वारा दोषियों पर प्राथमिकी दर्ज करने में किसी प्रकार की परेशानी न हो।

पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में किसी भी गांव की सीमा में सर्च अभियान चलाने से पहले ग्राम सभा व पारंपरिक ग्राम प्रधानों की सहमति ली जाए।

स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बलों को आदिवासी भाषा, रीति-रिवाज, संस्कृति और उनके जीवन-मूल्यों के बारे में प्रशिक्षित किया जाए और संवेदनशील बनाया जाए।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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