Monday, August 15, 2022

भारतीय गणतंत्र पर छाया संकट का घटाटोप

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भारतीय गणतंत्र की स्थापना का 73वां शुरू होने जा रहा है। किसी भी राष्ट्र या गणतंत्र के जीवन में सात दशक की अवधि अगर बहुत ज्यादा नहीं होती है तो बहुत कम भी नहीं होती। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय गणतंत्र ने अपने अब तक के सफर में कई उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन इसी अवधि में कई ऐसी चुनौतियां भी हमारे समक्ष आ खड़ी हुई हैं जो हमारे गणतंत्र की मजबूती या सफलता को संदेहास्पद बनाती हैं, उस पर सवालिया निशान लगाती हैं। 

गणतंत्र के 72वें वर्ष में देश की सीमाओं का पड़ोसी देश द्वारा अतिक्रमण और उस पर हमारी चुप्पी, संविधान पर सत्ता के नित नए हमले, देश की अर्थव्यवस्था का आधार मानी जाने वाली कृषि पर मंडराता संकट और उससे उबरने की बेचैनी के साथ किसानों का एक साल तक चला ऐतिहासिक आंदोलन, उस आंदोलन को बदनाम करने और उसका निर्ममतापूर्वक दमन करने के प्रयास और सत्ता के तत्वावधान में बना देशव्यापी सांप्रदायिक नफरत का माहौल जैसी बातें ऐसी हैं, जो बताती हैं कि भारतीय गणतंत्र इस वक्त अपने अब तक के सबसे नाजुक दौर से गुजर रहा है। 

यही वे बातें हैं, जो हमारे समक्ष सवाल खड़ा करती है कि अपने गणतंत्र के 73वें वर्ष में प्रवेश करते वक्त हमारे लिए सबसे बड़ी चिंता की बात क्या हो सकती है? क्या हमारे वे तमाम मूल्य और प्रेरणाएं सुरक्षित हैं, जिनके आधार पर आजादी की लंबी लड़ाई लड़ी गई थी और जो आजादी के बाद हमारे संविधान का मूल आधार बनी थीं? क्या आजादी के बाद हमारे व्यवस्था तंत्र और देश के आम आदमी के बीच उस तरह का सहज और संवेदनशील रिश्ता बन पाया है, जैसा कि एक व्यक्ति का अपने परिवार से होता है? आखिर स्वाधीनता हासिल करने और फिर संविधान की रचना के पीछे मूल भावना तो यही थी। 

भारत के संविधान में राज्य के लिए जो नीति-निर्देशक तत्व हैं, उनमें भारतीय राष्ट्र-राज्य का जो आंतरिक लक्ष्य निर्धारित किया गया है, वह महात्मा गांधी और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के अन्य नायकों के विचारों और सपनों का दिग्दर्शन कराता है। लेकिन हमारे संविधान और उसके आधार पर कल्पित तथा मौजूदा साकार गणतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जो कुछ नीति-निर्देशक तत्व में है, राज्य का आचरण कई मायनों में उसके विपरीत है। मसलन, प्राकृतिक संसाधनों का बंटवारा इस तरह करना था जिसमें स्थानीय लोगों का सामूहिक स्वामित्व बना रहता और किसी का एकाधिकार न होता तथा गांवों को धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया जाता। 

लेकिन हम गणतंत्र की 73वीं सालगिरह मनाते हुए देख सकते हैं कि जल, जंगल, जमीन, आदि तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर से स्थानीय निवासियों का स्वामित्व धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो गया है और सत्ता में बैठे राजनेताओं और नौकरशाहों से साठ गांठ कर औद्योगिक घराने उनका मनमाना उपयोग कर रहे हैं। देश के अन्नदाता की खेती जो कि पहले से ही चुनौतियों से घिरी है, उसे भी संकट से उबारने के नाम पर देश के चंद कारपोरेट घरानों के हवाले करने का रास्ता खोल दिया गया है। यही नहीं, देश की जनता की खून-पसीने की कमाई से खड़ी की गई और मुनाफा कमा रही तमाम बड़ी सरकारी कंपनियां भी देश के बड़े औद्योगिक घरानों को औने-पौने दामों में सौंपी जा रही हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में सर्वाधिक रोजगार देने वाली भारतीय रेल का भी तेजी से निजीकरण शुरू हो चुका है। राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्याएं कम की जा चुकी हैं और जो अभी अस्तित्व में हैं उन्हें भी निजी हाथों में सौंपे जाने का खतरा बना हुआ है। 

बेशक हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि आजाद भारत का पहला बजट 193 करोड़ रुपए का था और अब हमारा 2021-22 का बजट करीब 34,83,236  करोड़ रुपए का है। यह एक देश के तौर पर हमारी असाधारण उपलब्धि है। इसी प्रकार और भी कई उपलब्धियों की गुलाबी और चमचमाती तस्वीरें हम दिखा सकते हैं। मसलन, 1947 में देश की औसत आयु 32 वर्ष थी, अब यह 68 वर्ष हो गई है। उस समय जन्म लेने वाले 1000 शिशुओं में से 137 तत्काल मर जाते थे। आज केवल 53 मरते हैं। उस समय साक्षरता दर करीब 18 फीसदी थी जो आज 68 फीसदी से ज्यादा है। परमाणु और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी कई कामयाबियां हमारे खाते में दर्ज हैं। ऐसे और भी अनेक क्षेत्र हैं, जिनके आधार पर दुनिया भारतीय गणतंत्र के अभी तक के सफर की सराहना करती है। 

यह सब फौरी तौर पर तो हमारे गणतंत्र की सफलता का प्रमाण है। लेकिन जब हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि आजाद भारत का हमारा लक्ष्य क्या था तो फिर सतह की इस चमचमाहट के पीछे गहरा स्याह अंधेरा नजर आता है। भयावह भ्रष्टाचार, भूख से मरते लोग, पानी को तरसते खेत, काम की तलाश करते करोड़ों हाथ, देश के विभिन्न इलाकों में सामाजिक और जातीय टकराव के चलते गृहयुद्ध जैसे बनते हालात, बेकाबू कानून-व्यवस्था और बढ़ते अपराध, चुनावी धांधली, विभिन्न राज्यों में आए दिन निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त के जरिए जनादेश का अपहरण, निर्वाचन आयोग का सत्ता के इशारे पर काम करना, न्यायपालिका के जनविरोधी फैसले और सत्ता की पैरोकारी, सत्ता से असहमति का निर्ममतापूर्वक दमन आदि बातें हमारे गणतंत्र की कामयाबी के दावों को मुंह चिढ़ाती हैं। 

सवाल है कि क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि हम एक असफल राष्ट्र बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं? समस्या और भी कई सारी हैं जो हमें इस सवाल पर सोचने पर मजबूर करती हैं। दरअसल, भारत की वास्तविक आजादी बड़े शहरों तक और उसमें भी सिर्फ उन खाए-अघाए तबकों तक सिमट कर रह गई है जिनके पास कोई राष्ट्रीय परिदृश्य नहीं है। इसीलिए शहरों का गांवों से नाता टूट गया है। सरकार को किसानों की चिंता हरित क्रांति तक ही थी, ताकि अन्न के मामले में देश आत्मनिर्भर हो जाए। वह लक्ष्य हासिल करने के बाद किसानों को देश के बेईमान और लालची औद्योगिक घरानों के हवाले कर दिया गया। यही वजह है कि पिछले दो दशक में छह लाख से भी ज्यादा किसानों के आत्महत्या कर लेने पर भी हमारा शासक वर्ग जरा भी विचलित नहीं हुआ। शासक वर्ग की यही निष्ठुरता साल 2020 में कोरोना महामारी के चलते महानगरों और बड़े शहरों से गांवों की भूखे-प्यासे पैदल पलायन करने वाले लाखों मजदूरों की बेबसी और बीते साल 2021 में महामारी की दूसरी लहर के दौरान मारे गए लोगों की गंगा नदी में तैरती लाशों के प्रति भी दिखी। यह स्थिति बताती है कि हमारा व्यवस्था तंत्र गांव, गरीब और किसान को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने में पूरी तरह विफल रहा है।

हालांकि गांवों को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए करीब तीन दशक पहले पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया था, मगर ग्रामीण इलाकों में निवेश नहीं बढ़ने से पंचायतें भी गांवों को कितना खुशहाल बना सकती हैं? इन्हीं सब कारणों के चलते हमारे संविधान की मंशा के अनुरूप गांव स्वावलंबन की ओर अग्रसर होने की बजाय अति परावलंबी और दुर्दशा के शिकार होते गए। गांव के लोगों को सामान्य जीवनयापन के लिए भी शहरों का रुख करना पड़ रहा है। खेती की जमीन पर सीमेंट के जंगल उग रहे हैं, जिसकी वजह से गांवों का क्षेत्रफल कितनी तेजी से सिकुड़ रहा है, इसका प्रमाण 2011 की जनगणना है।

इसमें पहली बार गांवों की तुलना में शहरों की आबादी बढ़ने की गति अब तक की जनगणनाओं में सबसे ज्यादा है। शहरों की आबादी 2001 के 27.81 फीसदी से बढ़कर 2011 की जनगणना के मुताबिक 31.16 फीसदी हो गई जबकि गांवों की आबादी 72.19 फीसदी से घटकर 68.84 फीसदी हो गई। इस प्रकार गांवों की कब्रगाह पर विस्तार ले रहे शहरीकरण की प्रवृत्ति हमारे संविधान की मूल भावना के एकदम विपरीत है। हमारा संविधान कहीं भी देहाती आबादी को खत्म करने की बात नहीं करता, पर विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के इशारे पर बनने वाली हमारी आर्थिक नीतियां वही भूमिका निभा रही है और इसी से गण और तंत्र के बीच की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। 

दरअसल, भारत की आजादी और भारतीय गणतंत्र की मुकम्मल कामयाबी की एक मात्र शर्त यही है कि जी-जान से अखिल भारतीयता की कद्र करने वाले क्षेत्रों और तबकों की अस्मिताओं और संवेदनाओं की कद्र की जाए। आखिर जो तबके हर तरह से वंचित होने के बाद भी शेषनाग की तरह भारत को अपनी पीठ पर टिकाए हुए है, उनकी स्वैच्छिक भागीदारी के बगैर क्या हमारी आजादी मुकम्मल हो सकती है और क्या हमारा गणतंत्र मजबूत हो सकता है? जो समाज स्थायी तौर पर विभाजित, निराश और नाराज हो, वह कैसे एक कामयाब गणतंत्र बन सकता है?

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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