Sunday, December 4, 2022

झारखंड से स्पेशल रिपोर्ट: मनरेगा में बच्चों के नाम से बने हैं जॉब कार्ड

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रांची/दुमका। झारखंड में मनरेगा में व्याप्त गड़बड़ियां व घोटालों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसको लेकर जनचौक ने कई खुलासे किए हैं।

हाल में दुमका जिले के काठीकुंड प्रखण्ड में इन गड़बड़ियों का एक मामला प्रकाश में आया है। जिले के बिछियापहरी पंचायत के निझोर गांव में मनरेगा योजनाओं में बिचौलिए और प्रखण्ड के अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत का आलम यह है कि फ़र्जी रोजगार कार्ड व फर्जी बैंक अकाउंट बनाकर पैसों का घोटाला किया जा रहा है। स्थिति यह है कि 4 से 9 वर्ष तक के कई बच्चों के नाम से रोजगार कार्ड निर्गत किये गए हैं। पावन कुंवर की 2 पुत्रियों 7 वर्षीय पृथ्वी कुमारी और 5 वर्षीय प्रिया कुमारी के नाम पर रोजगार कार्ड आवंटित है, वहीं शंकर देहरी के तीन बच्चे 9 वर्षीय पुत्री चमन कुमारी वर्ष, 4 वर्षीय पुत्री सुचन कुमारी व 7 वर्षीय पुत्र सचेन देहरी का नाम परिवार के रोजगार कार्ड में दर्ज है।

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योजनाओं में बिचौलिए हैं हावी

जंगला गांव कालाझर पंचायत में पड़ता है। यहां 60 फीसदी आदिवासी संताल परिवार निवास करते हैं, वहां ग्रामीणों ने एक बड़ी बैठक में बताया कि उनको मनरेगा योजनाओं के बारे किसी प्रकार की जानकारी नहीं है। जब उनको मनरेगा वेबसाइट के आधार पर स्वीकृत 44 योजनाओं की सूची जिनकी लागत करीब 30 लाख है, पढ़कर सुनाई गई, तो वे एक दूसरे का मुंह देखने लगे। सभी ने एक स्वर में कहा कि ये ग्राम सभा से नहीं बल्कि ठेकेदारों और पंचायत कर्मियों ने आपसी मिलीभगत से योजनायें पास की हैं। जिसकी ग्राम सभा को कोई जानकारी नहीं दी जाती है। बिचौलियों ने गांव के भोले – भाले आदिवासियों के नाम से गांव के ही मसी मुर्मू के डोभा में 18 मजदूरों के नाम से फर्जी काम डिमांड भी 4 से 17 अगस्त तक करा दिया था।

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जबकि इस सम्बन्ध में मजदूरों को कोई जानकारी नहीं है और न ही कार्यस्थल पर एक छटांक मिट्टी की खुदाई की गई है। गांव के 90 फीसदी से अधिक मजदूरों के बैंक खाते दुमका में स्थित आईसीआईसीआई बैंक में जॉब कार्ड के साथ लिंक कर दिए गए हैं। जबकि इन खातों को ग्रामीणों ने खुलवाया ही नहीं है। यदि बिछियापहरी के निझोर गांव की बात की जाए तो वहां 4 से 9 वर्ष तक के कई बच्चों के नाम से रोजगार कार्ड निर्गत किये गए हैं।

मंत्रालय के आदेश से श्रमिकों की बढ़ेंगी मुश्किलें

काठीकुंड प्रखण्ड अंतर्गत बिछियापहरी पंचायत है जिसमें कुल 25 गांव आते हैं l इसी प्रकार बड़ा चपुरिया पंचायत में कुल 30 गांव हैं। इन गांवों में आदिम आदिवासी पहाड़िया समुदाय के श्रमिक परिवार निवास करते हैं। सुखाड़ – अकाल के जो आसार दिख रहे हैं, उसके अनुसार निकट समय में प्रत्येक गांव में सभी मजदूरों को रोजगार चाहिए।

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नरेगा वॉच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज केन्द्र सरकार के हाल के आदेश पर कहते हैं – भारत सरकार के आदेश पत्रांक _J- 11017/39/2017-RE-VII (E-378816), दिनांक 16-07-2022  से मजदूरों के काम पाने के अधिकार को सीमित कर दिया गया है। नए आदेश के अनुसार किसी भी पंचायत में 20 से अधिक योजनायें चालू नहीं की जा सकती हैं।

ऐसे में सवाल पैदा होता है कि उन पंचायतों का क्या, जहां 20 से अधिक गांव / टोले हैं l झारखण्ड में ऐसी कई पंचायतें हैं जहां 20 से ज्यादा गांव हैं।सरकार को ऐसे गांवों को ध्यान में रखते हुए अपने हालिया आदेश को संशोधित करना चाहिए।

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मजदूरों ने किया प्रखण्ड कार्यालय का घेराव

बताते चलें कि अकाल व सुखाड़ का असर गांवों में दिखने लगा है। वर्षा जल के अभाव में कृषि कार्य संपन्न नहीं होने से ग्रामीण परिवारों को रोजी रोजगार और घर चलाने की चिंता सताने लगी है। स्थानीय प्रशासन और सरकार की बेरुखी से खिन्न होकर लोगों के सब्र का बाँध टूट रहा है। यही वजह है कि आजादी के अमृत महोत्सव के ठीक दूसरे दिन अर्थात 16 अगस्त को निझोर और जंगला गांव के सैकड़ों मजदूर काठीकुंड प्रखण्ड कार्यालय पहुंचे। सभी के हाथों में मनरेगा जॉब कार्ड था। 

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बेरोजगारी के विपरीत परिस्थिति में मनरेगा ही एकमात्र सहारा है जो ग्रामीण श्रमिकों के लिए जीवन रेखा साबित हुई है। पहले तो प्रखण्ड के मनरेगा कर्मी लोगों के काम के आवेदन लेने में आनाकानी की। लेकिन मजदूरों की जिद के आगे अंतत: प्रखण्ड कार्यक्रम पदाधिकारी को सभी के आवेदन लेने पड़े और मजदूरों को आवेदन की पावती भी निर्गत की गई। यह काठीकुंड के लिए पहला मौका था जब मजदूरों ने मनरेगा में काम के आवेदन सौंपे। बता दें कि कालाझर पंचायत अंतर्गत जंगला गांव से 64 मजदूर तथा बिछियापहरी पंचायत के निझोर गांव से 41 लोगों ने काम के आवेदन किये साथ ही 18 मजदूरों ने पंजीयन के लिए आवेदन सौंपे।

इस मामले में जब संबंधित अधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की गयी तो उन्होंने इस पर कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। साथ ही कहा कि मामले की जांच की जाएगी।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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