Sunday, August 14, 2022

उपचुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि मोदी सरकार के खिलाफ है देश का राजनीतिक मिजाज

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तेरह राज्यों की 29 विधानसभा और तीन लोकसभा सीटों के लिए उपचुनाव के नतीजों के आधार पर अगर देश के राजनीतिक मिजाज का आकलन किया जाए तो साफ दिखाई दे रहा है कि माहौल केंद्र की मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ है। भाजपा को विधानसभा की 30 में से महज सात और लोकसभा की तीन में से महज एक सीट हाथ लगी है। ये नतीजे कुछ हद तक कांग्रेस के लिए भी निराशाजनक ही रहे हैं और उसे विधानसभा की आठ और लोकसभा की एक सीट हासिल हुई है। लेकिन क्षेत्रीय दल अपने-अपने सूबे में अपना दबदबा बनाए रखने में कामयाब रहे हैं। ये नतीजे अगले कुछ महीनों बाद होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिहाज से भी एक संकेत है कि हवा का रुख क्या रहने वाला है।

भाजपा की उम्मीदों को सबसे तगड़ा झटका हिमाचल प्रदेश में लगा है। इस सूबे में न सिर्फ भाजपा की सरकार है, बल्कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का भी यह गृह राज्य है। यहां लोकसभा की एक और विधानसभा की तीन सीटों पर उपचुनाव हुआ था और सभी सीटों पर कांग्रेस ने सत्तारूढ़ भाजपा को करारी शिकस्त दी है। हिमाचल प्रदेश में विधानसभा की 68 और लोकसभा की चार सीटें हैं।

एक लोकसभा सीट के तहत 17 विधानसभा सीटें आती हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो इस सूबे में कुल 20 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुआ था और सभी सीटों पर कांग्रेस ने भाजपा के मुकाबले बढ़त हासिल की है। चूंकि ठीक एक साल बाद यहां विधानसभा का चुनाव होना है, लिहाजा उपचुनाव के नतीजे भाजपा के लिए बेहद निराशाजनक रहे हैं। उपचुनाव के नतीजे आने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री का जो बयान आया है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने भाजपा की हार के लिए महंगाई को जिम्मेदार ठहराया है। उनका यह बयान सीधे तौर पर केंद्र सरकार के कामकाज पर टिप्पणी है।

भाजपा को दूसरा बड़ा झटका पश्चिम बंगाल में लगा है, जहां कुछ महीनों पहले हुए विधानसभा चुनाव में उसका सत्ता पर काबिज होने का मंसूबा ध्वस्त हुआ था। यहां जिन चार सीटों के लिए उपचुनाव हुआ उनमें से दो तो भाजपा विधायकों के इस्तीफे से ही खाली हुई थीं, लेकिन उसे चारों सीटों पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के हाथों बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा। इन नतीजों से ममता बनर्जी ने दिखा दिया है कि बंगाल में उनका सियासी क़द बाक़ी दलों के नेताओं से कहीं बड़ा है।

हिमाचल और बंगाल की तरह राजस्थान में भी भाजपा की उम्मीदों को झटका लगा। इस सूबे में सत्तारूढ़ कांग्रेस अंदरुनी कलह से ग्रस्त है, जिसका लाभ उठा कर भाजपा भी उसकी सरकार गिराने की कोशिश कर चुकी है, लेकिन दो सीटों के उपचुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। इन दो में से एक सीट तो पहले भाजपा के पास ही थी, जिसे वह उपचुनाव में बरकरार नहीं रख पाई। इन दोनों सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करके जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में निकट भविष्य में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं पर फिलहाल विराम लगा दिया है, वहीं भाजपा नेतृत्व को भी संदेश मिल गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की कद्दावर नेता वसुंधरा राजे को हाशिए पर डालने का अंजाम क्या होता है।

भाजपा शासित कर्नाटक में मुक़ाबला बराबरी पर छूटा है। यहां भाजपा और कांग्रेस को एक-सीट पर जीत हासिल हुई है, लेकिन भाजपा के लिए सदमे वाली बात यह रही कि मुख्यमंत्री बोम्मई के गृह जिले वाली हंगल सीट पर उसे कांग्रेस के मुकाबले हार का सामना करना पड़ा है। जनता दल सेक्यूलर भी दोनों सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन दोनों पर उसे न सिर्फ हार का सामना करना पड़ा बल्कि दोनों सीटों पर वह बड़े अंतर से तीसरे नंबर पर रहा।

हरियाणा की एलनाबाद सीट पर इंडियन नेशनल लोकदल उम्मीदवार अभय चौटाला ने जीत हासिल की है। चौटाला ने कृषि क़ानूनों के विरोध में विधानसभा से इस्तीफ़ा दे दिया था। चौटाला ने भाजपा उम्मीदवार को हराया। कांग्रेस यहां तीसरे नंबर पर रही। इस इलाके में किसान आंदोलन के चलते भाजपा का जोरदार विरोध हो रहा था और किसानों ने भी भाजपा को हराने का आह्वान किया था। अपनी जीत के बाद अभय चौटाला ने कहा है कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।

भाजपा को सबसे बड़ी कामयाबी असम में मिली, जहां वह और उसकी सहयोगी पार्टी यूपीपीएल क्रमश: तीन और दो सीटें जीतने में कामयाब रही। कांग्रेस को यहां तगड़ा झटका लगा है और उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली है। उसने कुछ वक़्त पहले अपने सहयोगी दल एआईयूडीएफ़ के साथ गठबंधन तोड़ दिया था। असम के अलावा उत्तर पूर्व के दो अन्य राज्यों मेघालय और मिजोरम में भी कांग्रेस को निराशा हाथ लगी और वहां क्षेत्रीय पार्टियां जीतने में कामयाब रहीं। मेघालय में तीन सीटों के लिए हुए उपचुनाव में दो सीटें सरकार चला रही नेशनल पीपुल्स पार्टी ने जीतीं, जबकि एक सीट विपक्षी यूडीपी को मिली। मिज़ोरम में एक सीट के लिए उपचुनाव हुआ था, जिस पर सत्तारूढ़ मिज़ो नेशनल फ्रंट ने जीत हासिल की।

भाजपा की उम्मीदों को सहारा देने वाला दूसरा सूबा मध्य प्रदेश रहा है, जहां वह लोकसभा की एक सीट और विधानसभा की तीन में से दो सीटें जीतने में कामयाब रही। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भाजपा की कामयाबी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की हिकमत अमली का नतीजा है। उन्होंने साबित कर दिया है कि फिलहाल प्रदेश में उनके कद का कोई और नेता नहीं है। यहां कांग्रेस का निराशाजनक प्रदर्शन स्पष्ट रूप से मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व यानी पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की नेतृत्व और संगठन क्षमता पर सवालिया निशान लगाता है।

कहने को तो बिहार में दो सीटों के लिए हुए उपचुनाव में भी भाजपा के सहयोगी जनता दल (यू) को जीत हासिल हुई है, जिसे भाजपा अपनी जीत ही बता रही है। लेकिन हकीकत यह है कि यहां के नतीजे भी भाजपा के लिए किसी झटके से कम नहीं हैं, क्योंकि भाजपा ने अपने को इन चुनावों से न सिर्फ अलग रखा था बल्कि अंदर खाने यह कोशिश भी की थी कि जनता दल (यू) के उम्मीदवार जीत न पाएं। इस बार राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, लेकिन दोनों सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन काफ़ी निराशाजनक रहा।

भाजपा को महाराष्ट्र की एक विधानसभा सीट और दादरा-नगर हवेली की लोकसभा सीट पर भी बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा। महाराष्ट्र की देगलुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने भाजपा को हराया, जबकि दादरा-नगर हवेली सीट पर शिव सेना ने भाजपा को हरा कर जीत हासिल की। यह सीट निर्दलीय सांसद मोहन डेलकर के आत्महत्या कर लेने से खाली हुई थी। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में गुजरात के भाजपा नेता और अंडमान के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल को अपनी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

आंध्र प्रदेश और उससे विभाजित होकर बने तेलंगाना में भी विधानसभा की एक-एक सीट के लिए उपचुनाव हुआ था। आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस को जीत हासिल हुई, जबकि तेलंगाना में भाजपा ने टीआरएस की सीट जीत कर अपनी झोली में डाल ली।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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